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मणिपुर में बीजेपी की 'लोकप्रिय सरकार' के बहाल होने से क्यों नाराज़ है कुकी जनजाति?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
छह फ़रवरी को मणिपुर के चुराचांदपुर शहर के 'वॉल ऑफ रिमेंबरेंस' मेमोरियल के सामने सैकड़ों युवाओं की भीड़ जमा हुई और फिर थोड़ी ही देर में तीन पुतलो में आग लगा दी गई.
चुराचांदपुर का 'वॉल ऑफ रिमेंबरेंस' मेमोरियल वो जगह है जहां साल 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा में मारे गए सभी कुकी-ज़ो लोगों की तस्वीरें लगी हैं.
इसी जगह विरोध प्रदर्शन करने जमा हुए युवाओं के हाथों में प्लेकार्ड पर "न्याय नहीं तो सरकार नहीं", "ग़द्दार हम पर शासन नहीं कर सकते", "लोकप्रिय सरकार कुकी-ज़ो के लिए मौत का जाल है" और "राष्ट्रपति शासन बहाल करो" जैसे नारे लिखे थे.
इन नारों पर ध्यान से गौर करें तो यह समझना आसान हो जाता है कि हिंसा के कारण अपने सैकड़ों लोगों को गंवा चुके कुकी-ज़ो जनजाति के लोग इतने ग़ुस्से में क्यों हैं?
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यह नाराज़गी केवल कुकी-ज़ो समुदाय से राज्य में गठन हुई सरकार में शामिल उन तीन विधायकों तक सीमित नहीं दिखती.
पिछले 32 महीनों से हिंसक जातीय संघर्ष से जूझ रहे मणिपुर में करीब एक साल तक राष्ट्रपति शासन के बाद बीती 4 फरवरी को मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन किया गया है.
नई सरकार में कुकी-ज़ो जनजाति से आने वाले बीजेपी के तीन विधायक शामिल हुए हैं. इन लोगों में चुराचांदपुर के विधायक एल.एम. खौटे, तिपाईमुख के विधायक नगुरसंगलुर सनाटे और कांगपोकपी की विधायक और नई सरकार की उप-मुख्यमंत्री नेमचा किपगेन शामिल हैं.
''वॉल ऑफ रिमेंबरेंस'' के सामने छह फ़रवरी को प्रदर्शनकारी जिन तीन लोगों के पुतले जला रहे थे, वे इन्हीं तीनों विधायकों के पुतले थे.
कुकी-ज़ो जनजाति के प्रमुख संगठनों ने नई सरकार के गठन के तुरंत बाद ही इस राजनीतिक घटनाक्रम पर हैरानी जताते हुए अपने विधायकों के ख़िलाफ़ विरोध जताना शुरू कर दिया था. कुकी-ज़ो काउंसिल ने 5 फ़रवरी को इन तीनों विधायकों का 'सोशल बॉयकॉट' करने का एलान कर दिया. अगले दिन इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम और कुकी विमेन ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के सदस्यों ने एक रैली निकाली और तीनों विधायकों के पुतले फूंके.
कुकी बहुल चुराचांदपुर और कांगपोकपी शहरों में बंद रखा गया. कुकी-ज़ो जनजाति के करीब सभी नागरिक संगठनों ने प्रेस में बयान जारी कर विधायकों के नई सरकार में शामिल होने की निंदा की. लेकिन अपने समुदाय के इन तीन विधायकों को लेकर जो ग़ुस्सा और नाराज़गी कुकी-ज़ो जनजाति के लोग दिखा रहे हैं, क्या यह बात वहीं तक सीमित है?
क्या यह नाराजगी कुकी-ज़ो विधायकों तक सीमित है?
मणिपुर में नई सरकार के गठन के बाद से विरोध कर रहे कुकी-ज़ो आदिवासी संगठनों की इस नाराज़गी के पीछे हिंसा के दौरान उनके साथ हुए कथित अन्याय की बात लगातार सामने आती रही है.
इसके अलावा ऐसे कई राजनीतिक निर्णयों का विरोध किया गया है जिसकी वजह से दोनों समुदाय सामाजिक और भौगोलिक तौर पर बंट गए हैं.
कुकी-ज़ो संगठनों के जो बयान सामने आए हैं, उनमें पूछा गया है कि अपराधियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने से पहले लोकप्रिय सरकार क्यों बनाई गई?
कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के वरिष्ठ नेता मांग खोंगसाई कहते हैं, "हम उस राजनीति और सरकार के ख़िलाफ़ हैं जो समस्याओं का समाधान नहीं कर सकी है. यह कैसे एक लोकप्रिय सरकार हो सकती है जहां लोग इतना विरोध कर रहे हैं.सरकार की मंशा जबरन शांति स्थापित करने की है जो स्वीकार्य नहीं है."
छात्र नेता मांग कहते हैं, "कुकी समुदाय से नई सरकार में एक उप-मुख्यमंत्री दिया गया है. लेकिन लोकप्रिय सरकार के नाम पर यह कैसी शांति लाई जा रही है जहां कुकी उप-मुख्यमंत्री को नई दिल्ली में बैठकर वर्चुअली शपथ लेनी पड़ रही है. शायद आज़ादी के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ होगा जब एक उप-मुख्यमंत्री को वर्चुअली शपथ लेनी पड़ी हो. इससे आम लोगों में सुरक्षा और विश्वास की भावना कैसे आएगी? अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव है और यह सारे घटनाक्रम केवल बीजेपी की इज़्ज़त बचाने की एक कोशिश है."
कुकी-ज़ो लोगों की मांग से जुड़े एक सवाल के जवाब में छात्र नेता कहते हैं, "कुकी लोग संविधान के दायरे में रहकर अपनी मांग रख रहे हैं. जबकि मणिपुर में सक्रिय कई चरमपंथी संगठन भारत सरकार से संप्रभुता की मांग कर रहे हैं. कुकी-ज़ो जनजाति के चरमपंथी संगठन सस्पेंशन ऑफ़ ऑपरेशन के तहत बातचीत में हैं. सरकार ने पहाड़ी ज़िलों में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम लगा रखा है लेकिन वैली में यह लागू नहीं है."
"मणिपुर में अनुसूचित जनजाति की इतनी बड़ी आबादी है लेकिन भारतीय संविधान की छठी अनुसूची राज्य के पहाड़ी आदिवासी इलाकों पर लागू नहीं होती है. इस तरह की व्यवस्था में आदिवासी पहचान और ज़मीन के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? इन मुद्दों पर बिना बात किए जबरन शांति थोपना नागरिकों के साथ बेईमानी है."
कुकी-ज़ो और तांगखुल नगा के बीच नया टकराव
अभी हाल ही में कुकी-ज़ो और तांगखुल नगा जनजाति समूह के बीच भी नई तनातनी सामने आई है, जिससे राज्य में फिर से अशांति और मुश्किलें पैदा हो गई हैं.
रविवार को राज्य के उखरूल ज़िले में कथित तौर पर ग्रामीणों के घरों में आग लगा दी गई जिससे इलाके़ में तनाव फैल गया. इस घटना के बाद ज़िला प्रशासन को इलाके़ में कर्फ्यू लगाना पड़ा और इंटरनेट बंद करना पड़ा.
मांग खोंगसाई सवाल खड़ा करते हैं, "जिन लोगों के हाथ में नई सरकार की कमान दी गई है उनके मंत्री रहते हुए सारी समस्याएं हुई हैं. अगर यह लोग समस्या को हल करने में सक्षम थे, तो उन्हें मुख्यमंत्री बनने और समस्या को हल करने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए था. सरकार शांति लाने की बात कर रही है लेकिन कुकी और तांगखुल नगा के बीच फिर से वही समस्या हो रही है. अगर लीडरशिप इतनी मज़बूत है तो उखरूल की घटना क्यों हुई है?"
मणिपुर से लेकर नई दिल्ली तक कुकी लोगों के विरोध पर कुकी-ज़ो काउंसिल के इन्फ़ोर्मेशन और पब्लिसिटी सचिव गिन्ज़ा वुअलज़ोंग कहते हैं, "कुकी ज़ो विधायकों के सरकार में शामिल होने को लेकर लोगों में गहरी पीड़ा, गुस्सा और सामूहिक अस्वीकृति है. इन विधायकों ने लोगों की भावनाओं की अनदेखी करते हुए मणिपुर सरकार बनाने में शामिल होने का फै़सला किया है."
गिन्ज़ा वुअलज़ोंग कहते हैं, "मैतेई और कुकी-ज़ो लोगों के बीच संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है. क्योंकि अभी तक झगड़े की असली वजह को सुलझाने या कुकी-ज़ो लोगों की सुरक्षा की गारंटी देने के लिए कोई राजनीतिक समाधान नहीं हुआ है. अब तक ना ही कोई औपचारिक समझौता हुआ है और ना ही कोई आपसी सहमति वाला बयान आया है."
"नई सरकार जिन लोगों के हाथ में है, उन्हीं के लोगों ने हमारे भाई-बेटियों को क्रूरता से मारा है. ज़मीन पर हालात अब भी नाजुक, तनावपूर्ण और अप्रत्याशित बने हुए हैं. लिहाज़ा हमने कुकी ज़ो समुदाय के उन सभी लोगों को सलाह और चेतावनी दी है, जो लोग राज्य और केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं या फिर प्राइवेट काम करते है कि वे इस समय मैतेई बहुल इलाकों में ना यात्रा करें और ना ही किसी तरह की पोस्टिंग स्वीकार करें."
कुकी-ज़ो और मैतेई समुदाय दोनों में सुरक्षा का डर कायम
39 साल के जे. हाओकिप कुकी-ज़ो जनजाति से हैं. 2023 में राज्य में हिंसा फैलने के बाद वे अपना गांव बी. वेंगनोम छोड़कर सुरक्षा के लिए मिज़ोरम के कोलासिब में शरण लेने चले गए थे. बी. वेंगनोम मणिपुर के तुइबोंग तहसील में आने वाला एक छोटा सा गांव है जहां हिंसा भड़की थी. लेकिन अब हाओकिप पिछले कुछ महीनों से अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ चुराचांदपुर में रह रहे हैं.
नई सरकार के गठन के बाद मैतेई बहुल इलाकों में जाने को लेकर हाओकिप कहते हैं, "इस समय इंफाल या फिर किसी मैतेई इलाके में जाना बहुत जोखिम भरा होगा. मैतेई लोग भी कुकी-ज़ो बहुल इलाकों में नहीं आ रहे हैं."
"मैं डर के मारे तीन साल से अपने गांव नहीं गया हूं, ऐसे में सरकार का होना और नहीं होना बराबर है. क्योंकि हालात बिलकुल नहीं बदले हैं. दोनों समुदाय के इलाकों में बफ़र ज़ोन बने हैं. जब तक दोनों समुदाय में भरोसा कायम नहीं हो जाता, अपने इलाके से बाहर निकलना ख़तरनाक होगा."
इंफाल में विस्थापित लोगों की एक कॉलोनी में रहने वाले मैतेई समुदाय के संतोष मैतेई भी सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसा ही कहते हैं.
उनका कहना है, "मुझे नहीं लगता, मैं कभी अपने घर चुराचांदपुर जा पाऊंगा. सरकार तो पहले भी थी लेकिन परिवार के साथ गांव छोड़कर भागना पड़ा. नहीं भागते तो मारे जाते. कुछ नहीं बदला है. सरकार की बात पर भरोसा कर हम अपनी जान फिर से जोखिम में नहीं डाल सकते.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस विभाग में पढ़ाने वाले थोंगखोलाल हाओकिप कुकी-ज़ो जनजाति से हैं.
मणिपुर में नई सरकार और राज्य में शांति कायम करने को लेकर थोंगखोलाल हाओकिप कहते हैं, "मणिपुर में जो हिंसा हुई है वो कोई सीधे कुकी-मैतेई के बीच हुई सामान्य लड़ाई नहीं है. उस समय की सरकार में बैठे लोग और उनके मिलिशिया ग्रुप ने इस हिंसा की बहुत पहले योजना बनाई थी. फिर से मैतेई-प्रभुत्व वाली सरकार ही बनी है. लेकिन संघर्ष के दौरान राज्य की सत्ता के घोर दुरुपयोग के लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई. इससे दोनों समुदाय के बीच रिश्तों में गहरी दरार पड़ गई है. विश्वास पूरी तरह खत्म हो गया है. लिहाज़ा मणिपुर के मसले को बेहद गंभीरता से संभालने की ज़रूरत है."
अलग प्रशासन व्यवस्था की मांग अब भी कायम
कुकी-ज़ो जनजाति के मौजूदा विरोध पर थोंगखोलाल कहते हैं, "हिंसा में कुकी लोगों ने महिला, बच्चों समेत 200 से ज़्यादा लोगों को खोया है. यह बेहद गहरा घाव है और ऐसी स्थिति में वापस उन्हीं लोगों के साथ जाकर फिर से रहना कैसे मुमकिन है. अगर-अलग प्रशासन व्यवस्था नहीं की जाती है तो दोनों समुदाय का शांति से रहना बेहद मुश्किल होगा. राजनीति से लेकर अगर हर क्षेत्र में एक बहुसंख्यक समुदाय का दबदबा रहेगा तो समस्याएं खत्म नहीं होगी. नई सरकार को लेकर कुकी लोगों का ताज़ा विरोध इसी का नतीजा है."
हालांकि, मणिपुर के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फंजौबाम कुकी-ज़ो समुदाय की अलग प्रशासन की मांग को सही नहीं ठहराते.
वो कहते हैं, "मणिपुर की सरकार में कुकी समुदाय के प्रतिनिधि को हमेशा जगह मिली है. लेकिन कुछ कुकी संगठनों के नेताओं को लग रहा है कि अगर उनके विधायक नई सरकार में शामिल हो जाएंगे तो उनका काम ख़त्म हो जाएगा. किसी भी समस्या के स्थाई समाधान के लिए राजनीतिक संवाद का होना ज़रूरी होगा."
एक सवाल का जवाब देते हुए मैतेई समुदाय से आने वाले पत्रकार प्रदीप कहते हैं, "नई सरकार को प्रशासनिक व्यवस्था सामान्य करने के साथ ही दोनों समुदाय के बीच भरोसा कायम करने पर ज़ोर देने की ज़रूरत है. लेकिन यह आरोप लगाना कि मैतेई लोगों के हर क्षेत्र में दबदबे के कारण कुकी लोगों का विकास रुक गया है तो यह साफ झूठ होगा."
"राजधानी इंफाल की तुलना में अगर राज्य में किसी दूसरे बड़े शहर की बात करें तो चुराचांदपुर है. कुकी बहुल चुराचांदपुर की तुलना मैतेई बहुल विष्णुपुर या फिर नागा बहुल उखरूल से करेंगे तो अंतर साफ समझ में आएगा. इसके अलावा दोनों ही तरफ दोनों समुदाय के लोग रहते हैं. लिहाज़ा दोनों तरफ के लोगों को अपनी धारणाओं से बाहर निकल कर बातचीत शुरू करनी होगी. तभी कोई समाधान निकलेगा."
4 फरवरी को सीएम का चार्ज संभालने वाले खेमचंद ने कुकी विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे से मिलकर उन्हें इंफाल से नई दिल्ली एयरलिफ्ट करने में मदद की है.
नए सीएम ने कुकी विधायक वाल्टे की हालत बिगड़ने पर उन्हें लाने के लिए इंफाल से चुराचांदपुर में लाइफ सपोर्ट सुविधाओं वाली एक एम्बुलेंस भेजी थी. खेमचंद का यह भरोसा कुकी-ज़ो काउंसिल की उस अपील के जवाब में आया है जिसमें सभी कुकी लोगों से मैतेई इलाकों में नहीं जाने की बात कही गई थी. विधायक वाल्टे 3 मई 2023 को इंफाल में भड़की हिंसा में गंभीर रूप से घायल हो गए थे और तब से उन्हें इलाज के लिए दिल्ली जाना पड़ता है.
हालांकि, मैतेई समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता के.ओनिल का मानना है कि केंद्र सरकार को ईमानदारी से मणिपुर की चिंता करनी होगी.
वो कहते हैं, "शांति का मतलब सिर्फ़ हिंसा का न होना नहीं है. इसके लिए भरोसा, न्याय और राजनीतिक ईमानदारी की ज़रूरत है. जब तक लोगों की समस्याओं को गंभीरता से सुना नहीं जाएगा यह नाराज़गी दूर नहीं होगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.