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आधी सदी बाद नासा को अब चांद पर क्यों जाना पड़ रहा है?
- Author, रेबेका मोरेल
- पदनाम, साइंस एडिटर
- Author, एलिसन फ़्रांसिस
- पदनाम, सीनियर साइंस जर्नलिस्ट
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अगले कुछ दिनों में नासा आर्टेमिस 2 मिशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है, जिसके तहत चार अंतरिक्ष यात्रियों को चांद की ओर रवाना किया जाएगा.
अंतरिक्ष में मौजूद हमारे सबसे नज़दीकी पड़ोसी के चारों ओर उनकी यह यात्रा आगे चलकर चंद्रमा पर उतरने और आख़िरकार वहां एक बेस बनाने का रास्ता तैयार करेगी.
नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम में कई सालों की मेहनत लगी है, हज़ारों लोग इससे जुड़े रहे हैं और अब तक इस पर क़रीब 93 अरब डॉलर ख़र्च हो चुके हैं.
लेकिन कुछ लोगों को यह सब देखकर यह एहसास होता है- 'इसमें नया क्या है?'
पचास साल से भी पहले, अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इतिहास रचा था, जब पहली बार इंसान ने चंद्रमा की सतह पर क़दम रखा था.
कुल छह लैंडिंग्स के बाद ऐसा लगने लगा था कि अंतरिक्ष में 'किए जाने वाले कामों की लिस्ट' से चांद वाला नाम कट गया है.
तो फिर अमेरिका इतनी ज़्यादा मेहनत, समय और पैसा क्यों लगा रहा है, और चंद्रमा पर दोबारा लौटने की होड़ में क्यों है?
क़ीमती संसाधन
चांद की ज़मीन देखने में भले ही सूखी, धूल भरी और बंजर लगती हो, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है.
नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम की ग्रह वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सारा रसेल कहती हैं, "चांद में वही तत्व मौजूद हैं जो हमें धरती पर मिलते हैं."
"मिसाल के तौर पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ धातुएं), जो धरती पर बहुत कम पाए जाते हैं, चांद के कुछ हिस्सों में शायद इतनी मात्रा में मौजूद हों कि उन्हें निकाला जा सके."
इनमें लोहे और टाइटेनियम जैसी धातुएं भी हैं, और हीलियम भी- जिसका इस्तेमाल सुपरकंडक्टर से लेकर मेडिकल उपकरणों तक, कई चीज़ों में होता है.
लेकिन जिस संसाधन ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा है, वह सबसे हैरान करने वाला भी है- पानी.
रसेल कहती हैं, "चांद के कुछ खनिजों में पानी फंसा हुआ है, और ध्रुवों पर भी पानी की अच्छी ख़ासी मात्रा मौजूद है."
वह कहती हैं कि वहां ऐसे गड्ढे हैं जो हमेशा छाया में रहते हैं, जहां बर्फ़ जमा हो सकती है.
अगर आप चांद पर रहना चाहते हैं, तो पानी तक पहुंचना बेहद ज़रूरी है. यह न सिर्फ़ पीने के काम आता है, बल्कि इसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सांस लेने की हवा तैयार की जा सकती है, और यहां तक कि अंतरिक्ष यानों के लिए ईंधन भी बनाया जा सकता है.
अंतरिक्ष में वर्चस्व की दौड़
1960 और 1970 के दशक में अमेरिका के अपोलो मिशन सोवियत संघ के साथ अंतरिक्ष में वर्चस्व की दौड़ से प्रेरित थे.
इस बार मुक़ाबले में चीन है.
चीन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. वह चांद पर रोबोट और रोवर सफलतापूर्वक उतार चुका है, और उसका कहना है कि वह 2030 तक इंसानों को भी वहां पहुंचा देगा.
चांद की धूल में सबसे पहले अपना झंडा गाड़ने का गौरव आज भी मायने रखता है. लेकिन अब यह और भी अहम हो गया है कि आप झंडा कहां गाड़ते हैं.
अमेरिका और चीन, दोनों ही, उन इलाक़ों तक पहुंच चाहते हैं जहां संसाधन सबसे ज़्यादा हैं, यानी चांद की सबसे क़ीमती ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाना.
संयुक्त राष्ट्र की 1967 की आउटर स्पेस संधि कहती है कि कोई भी देश चांद का मालिक नहीं बन सकता. लेकिन चांद पर जो कुछ पाया जाता है, उसके मामले में चीज़ें इतनी सीधी नहीं हैं.
ब्रिटेन की पहली अंतरिक्ष यात्री डॉक्टर हेलेन शरमन कहती हैं, "संयुक्त राष्ट्र की संधि के तहत आप ज़मीन के किसी टुकड़े के मालिक तो नहीं बन सकते, लेकिन असल में आप उस ज़मीन पर बिना किसी दख़ल के काम कर सकते हैं."
"तो इस वक्त सबसे बड़ी बात यही है कि आप अपनी ज़मीन का हिस्सा किसी तरह घेर लें. आप उसके मालिक नहीं बन सकते, लेकिन उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. और एक बार अगर आप वहां पहुंच गए, तो जब तक चाहें, वह हिस्सा आपके पास ही रहता है."
मंगल ग्रह की राह तैयार करना
नासा की नज़र अब मंगल ग्रह पर टिकी है और वह 2030 के दशक तक इंसानों को वहां भेजना चाहता है. लेकिन उसे जिन तकनीकी चुनौतियों से पार पाना है, उन्हें देखते हुए यह समयसीमा काफ़ी महत्वाकांक्षी कही जा सकती है.
लेकिन कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही होती है, और अमेरिका ने तय किया है कि वह शुरुआत चांद से करेगा.
साइंस म्यूज़ियम में अंतरिक्ष विभाग की प्रमुख लिबी जैक्सन कहती हैं, "चांद पर जाना और लंबे समय तक वहां रुकना, किसी दूसरे ग्रह पर रहने और काम करने के तरीक़े सीखने के लिए कहीं ज़्यादा सुरक्षित, सस्ता और आसान परीक्षण स्थल है."
चांद पर बनने वाले बेस पर नासा उन तकनीकों को बेहतर बना सकता है, जिनसे अंतरिक्ष यात्रियों को ज़रूरी हवा और पानी उपलब्ध कराया जा सके. उन्हें यह भी तय करना होगा कि ऊर्जा कैसे पैदा की जाए और ऐसे ठिकाने कैसे बनाए जाएं, जो इंसानों को बहुत ज़्यादा तापमान के साथ साथ ख़तरनाक अंतरिक्ष विकिरण से भी बचा सकें.
जैक्सन कहती हैं, "ये सारी ऐसी तकनीकें हैं कि अगर आप इन्हें पहली बार मंगल ग्रह पर आज़माएं और वहां कुछ ग़लत हो जाए, तो हालात बहुत विनाशकारी हो सकते हैं. इन्हें चांद पर आज़माना कहीं ज़्यादा सुरक्षित और आसान है."
वो रहस्य, जिनसे पर्दा उठना अभी बाकी है
वैज्ञानिक चांद से मिलने वाले सामान पर हाथ डालने के लिए बेचैन हैं (बेशक दस्ताने पहनकर).
अपोलो मिशनों के दौरान धरती पर लाई गई चट्टानों ने हमारे इस खगोलीय पड़ोसी को लेकर हमारी समझ ही बदल दी थी.
प्रोफ़ेसर सारा रसेल कहती हैं, "इन चट्टानों ने हमें बताया कि चांद एक बेहद नाटकीय घटना के बाद बना था, जब मंगल के आकार का एक पिंड धरती से टकराया तो उससे टूटे हिस्सों से चांद बना. हमें यह सब अपोलो मिशनों से लाई गई चट्टानों की वजह से पता चला."
लेकिन उनका कहना है कि अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है.
क्योंकि चांद कभी धरती का ही हिस्सा था, इसलिए उसमें हमारे ग्रह के 4.5 अरब साल के इतिहास का रिकॉर्ड मौजूद है. और टेक्टॉनिक प्लेट्स, हवा या बारिश जैसी कोई चीज़ न होने की वजह से, इस रिकॉर्ड को मिटाने वाला कुछ नहीं है. इसलिए चांद एक बेहतरीन 'टाइम कैप्सूल' है.
रसेल कहती हैं, "चांद धरती का एक शानदार संग्रहालय है. चांद के किसी और हिस्से से लाई गई चट्टानों का नया भंडार वाक़ई अद्भुत होगा."
नई पीढ़ी को प्रेरणा
अपोलो मिशनों से भेजी गई धब्बेदार, काली सफ़ेद तस्वीरों ने अंतरिक्ष के सपने को हक़ीक़त में बदल दिया था.
और भले ही देखने वालों में से सिर्फ़ गिने-चुने लोग ही आगे चलकर ख़ुद अंतरिक्ष यात्री बन पाए, लेकिन बहुत से लोगों ने विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना करियर चुना.
उम्मीद है कि आर्टेमिस मिशन, जिसे लाइव और 4के रेज़्योल्यूशन में दिखाया जाएगा, वो एक नई पीढ़ी को प्रेरित करेगा.
लिबी जैक्सन कहती हैं, "हम तकनीक से भरी दुनिया में रहते हैं. हमें वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और गणितज्ञों की ज़रूरत है- और अंतरिक्ष में लोगों को इन विषयों के लिए उत्साहित करने की ज़बरदस्त ताक़त है."
नए रोज़गार और फलती-फूलती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, अमेरिका को आर्टेमिस पर झोंके गए अरबों डॉलर वसूल करवाएंगे. इसके साथ ही, इन मिशनों के लिए विकसित की गई तकनीक से निकली चीज़ें भी धरती पर काम आ सकेंगी.
लेकिन हेलेन शरमन कहती हैं कि चांद पर वापसी दुनिया को एक और बहुत ज़रूरी उम्मीद देगी.
वह कहती हैं, "अगर हम सच में एकजुट होकर काम करें, तो हम इंसानियत के लिए बहुत फ़ायदेमंद काम कर सकते हैं."
"यह हमें दिखाएगा कि इंसान क्या क्या कर सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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