ख़ार्ग द्वीप पर अमेरिका किस 'प्लान' के ज़रिए क़ब्ज़ा कर सकता है?

    • Author, फ़्रैंक गार्डनर
    • पदनाम, सुरक्षा संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह उत्तरी खाड़ी में ईरान के अहम तेल निर्यात टर्मिनल, ख़ार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा करने के लिए सैनिक भेज सकते हैं.

तो इसके पीछे क्या वजह है, यह कैसे काम करेगा और इसके क्या जोखिम हैं?

दरअसल ख़ार्ग द्वीप लंबे समय से ईरान के तेल निर्यात का मुख्य रास्ता रहा है. यह द्वीप समुद्र के किनारे स्थित है, जहां पानी इतना गहरा है कि बहुत बड़े टैंकर, जिन्हें वेरी लार्ज क्रूड कैरियर्स (वीएलसीसी) कहा जाता है, उन पर तेल लोड किया जा सकता है.

ये टैंकर लगभग 20 लाख बैरल तक तेल ले जा सकते हैं. ईरान के क़रीब 90% तेल निर्यात इसी ख़ार्ग द्वीप से होकर गुज़रता है.

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1980 के दशक में ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान इस पर इराक़ी वायु सेना ने बार-बार बमबारी की थी और इस साल 13 मार्च को अमेरिका ने यहां 90 सैन्य ठिकानों पर हमले करने का दावा किया था.

हालांकि उसने तेल ढांचे को नुक़सान नहीं पहुंचाया.

अगर अमेरिका ख़ार्ग द्वीप पर हमला करने का फ़ैसला करता है, तो यह संभवतः एक अस्थायी क़दम होगा, जिसका मक़सद ईरान के ईंधन निर्यात को रोककर उस पर दबाव बनाना होगा, ताकि वह होर्मुज़ स्ट्रेट पर अपनी पकड़ ढीली करे और वॉशिंगटन की मांगों को माने.

यह दुनिया के सबसे व्यस्ततम तेल मार्गों में से एक है.

ईरानी शासन की मज़बूती और विरोध को देखते हुए यह काफ़ी संदिग्ध है कि यह रणनीति सफल होगी या नहीं.

ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाग़र ग़ालिबाफ़ ने चेतावनी दी है कि उनके देश की सेनाएं किसी भी अमेरिकी हमले पर 'आग बरसाएंगी'.

अमेरिका की संभावित रणनीति

माना जा रहा है कि ईरान ने इस द्वीप पर अपनी सुरक्षा को और मज़बूत किया है, जिसमें सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी शामिल हैं.

ईरान ने ये कहते हुए अमेरिका पर दोहरे रवैये का आरोप भी लगाया है कि एक तरफ़ तो वह शांति वार्ता की बात कर रहा है जबकि दूसरी तरफ़ क्षेत्र में सैनिक भेज रहा है.

इन बलों में क़रीब 5000 अमेरिकी मरीन और 82वीं एयरबोर्न डिविज़न के लगभग 2000 पैराट्रूपर्स शामिल हैं.

इससे ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिकी मरीन और पैराट्रूपर्स- इन दोनों बलों का इस्तेमाल ख़ार्ग पर क़ब्ज़ा करने और उसे बनाए रखने के लिए किया जा सकता है.

सैद्धांतिक रूप से पैराट्रूपर्स रात में हवाई हमला कर सकते हैं ताकि 20 वर्ग किलोमीटर के इस छोटे से द्वीप के अहम ठिकानों पर क़ब्ज़ा किया जा सके.

एंफिबियंस लैंडिंग के लिए अमेरिकी मरीन को जहाज़ों से तैनात किया जाएगा, जिनमें ऑस्प्रे टिल्ट-रोटर विमान और लैंडिंग क्राफ़्ट एयर कुशन्ड (एलसीएसी) जैसे समुद्री रास्ते से उतरने वाले उपकरणों का इस्तेमाल हो सकता है.

लेकिन इससे पहले इन जहाज़ों को ईरान के नियंत्रण वाले होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रना होगा और खाड़ी में आगे बढ़ते हुए छिपे हुए ईरानी ड्रोन और मिसाइल लॉन्च साइट्स के ख़तरे का सामना करना होगा.

हवाई या समुद्री किसी भी तरह की लैंडिंग के दौरान सैनिकों को एंटी-पर्सनल माइंस और ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ सकता है.

इन मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट्स (एमईयू) की ताक़त इतनी अधिक है कि अमेरिकी सेना के सफल होने की संभावना ज़्यादा है, लेकिन यह भारी संख्या में जान-माल के नुक़सान की क़ीमत पर हो सकता है.

इसके बाद अमेरिका के सामने उस इलाक़े को लंबे समय तक अपने नियंत्रण में बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि ईरान की मुख्य भूमि से लगातार हमलों का ख़तरा बना रहेगा.

इसका एक उदाहरण, ब्लैक सी में यूक्रेन का स्नेक द्वीप है, जिसे रूस ने फ़रवरी 2022 में अपने हमले के शुरुआती दौर में क़ब्ज़ा कर लिया था, लेकिन बाद में यूक्रेन की ओर से लगातार हमलों के कारण उसे वहां से हटना पड़ा.

ईरान के किसी भी हिस्से पर लंबे समय तक अमेरिकी क़ब्ज़ा अमेरिका के भीतर भी अलोकप्रिय हो सकता है, ख़ासकर उन समर्थकों के बीच जिन्होंने ट्रंप को इस वादे पर चुना था कि वह ऐसे संघर्षों में अमेरिका को नहीं उलझाएंगे.

ध्यान भटकाने की रणनीति?

आख़िर में, यह भी संभव है कि ख़ार्ग पर संभावित हमले की इतनी चर्चा किसी भटकाने वाली रणनीति का हिस्सा हो.

ईरान और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर के लिए इसका रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है.

लेकिन खाड़ी में कुछ और द्वीप भी हैं जो अमेरिका की नज़र में हो सकते हैं. इनमें लारक द्वीप शामिल है, जो बंदर अब्बास के क़रीब स्थित है और होर्मुज़ स्ट्रेट के ठीक किनारे है.

ईरान फ़िलहाल सभी टैंकरों को जांच के लिए इस द्वीप के पास से गुज़रने के लिए मजबूर कर रहा है और रिपोर्ट के मुताबिक़ उनसे लगभग 20 लाख डॉलर तक वसूले जा रहे हैं.

इसके अलावा क़ेशम द्वीप है, जो खाड़ी का सबसे बड़ा द्वीप है और ख़ार्ग से 75 गुना बड़ा है, जहां ईरान के भूमिगत मिसाइल और ड्रोन ठिकाने होने की आशंका है.

इसके अलावा अबू मूसा और ग्रेटर और लेसर तुंब जैसे तीन द्वीप हैं, जिन पर ईरान और यूएई दोनों दावा करते हैं, लेकिन फ़िलहाल इन पर ईरान का क़ब्ज़ा है.

इन सभी द्वीपों को मिलाकर यह एक सुरक्षा घेरा बनता है, जो ईरान को समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और भौगोलिक बढ़त देता है, जिससे वह अमेरिका की सैन्य ताक़त का मुक़ाबला कर सकता है.

हालांकि यह भी संभव है कि इनमें से कुछ भी न हो.

इसी दौरान, क्षेत्र में और सैनिक भेजने और ज़मीनी कार्रवाई की संभावना जताने के साथ-साथ ट्रंप ने सोमवार को फिर कहा कि अमेरिका ईरान के साथ 'गंभीर बातचीत' कर रहा है, जिससे 'हमारे सैन्य अभियान ख़त्म हो सकते हैं.'

जैसे-जैसे युद्ध पांचवें हफ़्ते में पहुंच रहा है, ट्रंप के सार्वजनिक बयान यह साफ़ नहीं करते कि उनका अगला बड़ा क़दम क्या होगा.

लेकिन एक 'समझौता', जिसे लेकर कई लोगों का मानना है कि ट्रंप ईरान से ज़्यादा बेताब हैं, तभी संभव होगा जब अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा मतभेदों की खाई को कम किया जाए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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