असम के चुनाव पर 'दिल के टुकड़े' की मौत का साया, ज़ुबिन गर्ग के लिए इंसाफ़ की गुहार किस पर पड़ेगी भारी?

ज़ुबिन गर्ग
इमेज कैप्शन, असम में ज़ुबिन की दीवानगी के निशान हर सड़क और गली-मोहल्ले में दिखती है.
    • Author, प्रेरणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

ये असम की मेरी पहली यात्रा थी. बीते 20 मार्च को जब मैं गुवाहाटी एयरपोर्ट से अपने होटल के रास्ते जा रही थी, तब रास्ते में कैब के ड्राइवर से बात शुरू हुई. मैंने पूछा, कैसा काम किया है आपके मुख्यमंत्री ने?

जवाब में कैब ड्राइवर ने कहा, ''काम तो मैडम ठीक किया है. सड़क, पुल-पुलिया सब बनाया है लेकिन ज़ुबिन दा को न्याय नहीं देने से हमलोगों में गुस्सा है. इसी सरकार ने कहा था कि हम ज़ुबिन को न्याय देंगे लेकिन अब कहते हैं न्याय कोर्ट करेगा.''

तब अंदाज़ा नहीं था कि अगले दस दिनों की मेरी असम यात्रा के दौरान यही बात मुझे हर दूसरे शख़्स से सुनने को मिलेगी.

चित्राली हज़ारिका गुवाहाटी के उसी कॉलेज में पढ़ती हैं, जहां से ज़ुबिन ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी. वो कहती हैं, ''ज़ुबिन दा एक इमोशन हैं, मैं उनको भगवान की तरह मानती हूं. हमें हिमंत से उम्मीद है कि वो जल्द ही ज़ुबिन को न्याय दिलाएंगे लेकिन ये न्याय चुनाव से पहले होता तो हमें बहुत खुशी होती.''

वहीं बोडोलैंड की रहने वाली कावेयी इन्तिपी का कहना है, ''ज़ुबिन को अगर न्याय नहीं मिला, तो हम कभी वोट नहीं करेंगे. अगर ज़ुबिन को न्याय देते तो हम हिमंत बिस्वा सरमा को ही वोट देते.''

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें

असम में चुनाव हो रहे हैं और मुझे उम्मीद थी कि हर तरफ़ पॉलिटिकल बैनर्स और उम्मीदवारों के पोस्टर्स लगे होंगे. और तमाम चर्चाएं इन्हीं के इर्द-गिर्द होंगी.

लेकिन असम में ज़ुबिन एक स्थायी चरित्र हैं.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

असम की सड़कें हमें जहां ले गईं, जिस भी गली से हम गुज़रे, जिन चौराहों पर मुड़े, वहां ज़ुबिन मौजूद रहे. कभी किसी दीवार की पेंटिंग में, कभी गिटार लिए होर्डिंग में, कभी किसी रेस्तरां में लगे टीवी की स्क्रीन पर, तो कभी धार्मिक आयोजनों में.

''ज़ुबिन मतलब असम, असम मतलब ज़ुबिन''

ये बात जोरहाट के जेबी कॉलेज में पढ़ने वाली एक स्टूडेंट ने मुझसे कही थी और ये बात मेरे ज़हन में बैठ गई.

ज़ुबिन के पीछे असम के लोगों की दीवानगी हमारे-आपके समझ से परे है. यह किसी उम्र, धर्म, समुदाय तक नहीं सीमित.

असम के जोरहाट में बीते तीस साल से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नोबोज्योति बरुआ कहते हैं, ''जैसे शंकरदेव और भूपेन हज़ारिका के बिना असम समाज संपूर्ण नहीं है, वैसे ही अब ज़ुबिन के बिना ये पूरा नहीं हो सकता.''

धुबरी के रहने वाले अब्दुल हुसैन रुंधे हुए गले से कहते हैं, ''मैं मुसलमान हूं और ज़ुबिन हिंदू था पर क्या उसने कभी ऐसा सोचा. उसने अपने गाने में भी कहा कि मेरी कोई जाति नहीं, मेरा कोई धर्म नहीं. ज़ुबिन इन सबसे ऊपर था.''

आप यहां किसी भी धर्म, जाति, समुदाय, उम्र या तबीयत के लोगों से बात करेंगे, आपको ज़ुबिन को लेकर एक जैसी मोहब्बत, एक जैसा अपनापन, एक जैसी नज़दीकी महसूस होगी. साथ ही सुनाई देंगी एक जैसी चिंता और एक जैसे सवाल - कि आख़िर ज़ुबिन को न्याय, कब मिलेगा?

'ज़ुबिन को न्याय कब मिलेगा'

ज़ुबिन गर्ग को न्याय देने की मांग करती एक लड़की.
इमेज कैप्शन, ज़ुबिन गर्ग को न्याय देने की मांग करती एक लड़की

बीते 19 सिंतबर को सिंगापुर के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे ज़ुबिन गर्ग की वहां के सेंट जॉन्स आइलैंड में तैरते वक़्त मौत हो गई थी. वह 52 साल के थे.

सिंगापुर पुलिस फ़ोर्स और हाल में सिंगापुर की कोर्ट ने इसे एक एक्सीडेंटल डेथ यानी दुर्घटना में हुई मौत करार दिया है. पर असम पुलिस की गठित एसआईटी ने मामले में कार्यक्रम के आयोजक, ज़ुबिन के मैनेजर समेत सात लोगों को हत्या, ग़ैरइरादतन हत्या, साज़िश और लापरवाही जैसी धाराओं में गिरफ़्तार किया है.

1200 पन्ने की चार्जशीट दाखिल होने के बाद गुवाहाटी कोर्ट में मामले की सुनवाई भी शुरू हुई लेकिन रफ़्तार धीमी होने के आरोप लगे.

हाल में असम चुनाव की घोषणा के ठीक तीन दिन बाद राज्य सरकार ने इस मामले में एक स्पेशल फास्ट ट्रैक सेशंस कोर्ट के गठन का आदेश जारी किया ताकि केस की रोज़ाना सुनवाई हो सके. सुनवाई शुरू भी हो चुकी है पर ज़ुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया का कहना है कि उन्हें जल्द से जल्द जवाब चाहिए.

हमसे बात करते हुए उन्होंने कहा, ''हमें कम से कम जवाब चाहिए कि उस दिन आख़िर हुआ क्या था. हमें अब तक कुछ नहीं पता. हम अब भी अंधेरे में हैं. इसलिए लोग बेचैन हैं.''

राजनीति तेज़

गौरव गोगोई

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, कांग्रेस ने अपने मेनिफ़ेस्टो में ज़ुबिन गर्ग को न्याय दिलाने की बात कही है

चुनाव के बीच ज़ुबिन के न्याय का मुद्दा हावी है. कांग्रेस ने अपने मैनिफेस्टो में ज़ुबिन को सौ दिनों के भीतर न्याय दिलाने का वादा किया है.

असम कांग्रेस के अध्यक्ष और जोरहाट से सांसद गौरव गोगोई ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, ''ज़ुबिन गर्ग को जिस प्रकार से न्याय मिलना चाहिए, जो सच्चाई उभरनी चाहिए वो आज हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीति के कारण नहीं उभरी. तो जो सच्चाई है, जो इंसाफ़ है वो हम दिलाने का दावा करते हैं.''

वहीं असम में कांग्रेस के चुनाव प्रभारी और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरोप लगाया है कि हिमंत बिस्वा सरमा के रहते ज़ुबिन गर्ग को कभी न्याय नहीं मिल सकता. उन्होंने दावा किया कि ज़ुबिन को न्याय कांग्रेस सरकार दिलाएगी.

उधर हिमंत ने कांग्रेस पर ज़ुबिन के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाया है.

हिमंत ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, ''कांग्रेस ने अपने मेनिफ़ेस्टो में ज़ुबिन गर्ग का विषय उठाकर पाप किया है. ज़ुबिन गर्ग हमारे दिल का टुकड़ा है. वोट के लिए ज़ुबिन गर्ग का इस्तेमाल करना एक बहुत दुख की बात है. मामला न्यायालय में है और मुझे लगता है तीन महीने नहीं, इसी महीने अच्छी ख़बर आने वाली है. कल मैंने जो कुछ कोर्ट में हुआ और जिस तरह से सुनवाई चल रही है...मुझे लगता है कि ज़ुबिन का फ़ैसला आने में सौ दिन का समय भी नहीं लगेगा.''

हिमंत बिस्वा सरमा

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि कांग्रेस ने अपने मेनिफ़ेस्टो में ज़ुबिन का ज़िक्र करके पाप किया है

हिमंत बिस्वा सरमा इससे पहले अलग-अलग मौकों पर ये कह चुके हैं कि न्याय दिलाना न्यायपालिका का काम है, सरकार का नहीं. ज़ुबिन के मामले में सरकार ने अपना काम कर दिया है. पर एक बड़ा तबका है जो हिमंत से जवाब चाहता है.

इस वर्ग का आरोप है कि जब न्याय न्यायालय से ही मिलना था तो हिमंत ने आगे बढ़कर ये क्यों कहा कि उनकी सरकार ज़ुबिन को न्याय दिलाएगी.

बीते साल अक्तूबर महीने में दिए अपने एक बयान में हिमंत बिस्वा सरमा ने ये भी कहा था कि अगर उनकी सरकार ज़ुबिन को न्याय दिलाने में विफल रही, तो साल 2026 में असम के लोग चाहें तो उन्हें सत्ता से बेदखल कर दें.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनाव में पार्टी को इसका ख़ामियाजा उठाना पड़ सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार नोबोज्योति बरुआ का मानना है कि ज़ुबिन से जुड़ी भावनाएं इस चुनाव में असर डाल सकती हैं.

वो कहते हैं, ''शुरुआत में ज़ुबिन को लेकर मुख्यमंत्री ने कहा था कि उनकी हत्या हुई है, ज़ुबिन को न्याय दिलाने के लिए पूरे असम में विरोध प्रदर्शन हुए. मुख्यमंत्री ने कहा कि ज़ुबिन को न्याय हम देंगे. लेकिन असम के लोग ख़ासकर जो युवा पीढ़ी है और जो ज़ुबिन गर्गग जो न्याय की मांग कर रही थी...वो न्याय उन्हें अब तक नहीं मिला है इसलिए इस बार के चुनाव में ज़ुबिन को न्याय दिलाने का जो मुद्दा है, वो पूरी तरह से उठेगा.''

हालांकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता और गुवाहाटी से पार्टी के उम्मीदवार विजय गुप्ता का कहना है कि पार्टी को किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं होने जा रहा. सरकार ने ज़ुबिन के मामले में अपना काम ईमानदारी से किया है.

ज़ुबिन की मौत के बाद का असम

छह महीने पहले जब असम में ये ख़बर फैली की उनके 'मोनोर टुकड़ा' यानी 'दिल के टुकड़े' का देहांत हो चुका है, तब जोरहाट के चाय बग़ान में काम करने वाले लोगों ने सात दिनों तक अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाया.

ज़ुबिन की अंतिम यात्रा में लाखों लोगों की भीड़ थी. दूर-दूर से लोग अपने छोटे बच्चे, पालतू जानवरों के साथ उन्हें विदाई देने पहुंचे थे. उस वक़्त के असम का दृश्य हज़ार किलोमीटर दूर बैठे लोगों को भी भावुक कर देने वाला था.

धुबरी की ज्योत्सना बेग़म ने हमसे कहा कि ज़ुबिन की मौत के बाद वह दो महीने तक ठीक से न खा पाईं और न ही सो पाईं.

ये कहते हुए उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं कि रात के दो बजे तक वह अब भी ज़ुबिन के गाने सुनती हैं.

वह कहती हैं, ''उसके लिए मैं अल्लाह से, भगवान से दुआ करती हूं कि उसे जन्नत नसीब हो.''

दीवानगी का कारण

विशाल कालीता ने अपने घर में ज़ुबिन की याद में एक म्यूज़ियम बनाया है.
इमेज कैप्शन, विशाल कालीता ने अपने घर में ज़ुबिन की याद में एक म्यूज़ियम बनाया है.

विशाल कलीता ज़ुबिन के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक हैं. उनके घर का एक हिस्सा ज़ुबिन म्यूज़ियम के रूप में जाना जाता है. उन्होंने ज़ुबिन के गाए 38 हज़ार से भी ज़्यादा गानों के कलेक्शन्स इकट्ठा किए हुए हैं. सिंगापुर निकलने से दो दिन पहले ज़ुबिन उनसे मिलने और उनके म्यूज़ियम का उद्घाटन करने उनके घर पहुंचे थे.

वह कहते हैं, ''दादा केवल गाना नहीं गाता था. वो हर सुख-दुख में लोग के साथ रहता था. किसी के हॉस्पिटल का ख़र्चा हो, किसी के स्कूल का...दादा जितना कमाता था, उतना लोगों में बांट देता था.''

वरिष्ठ पत्रकार रत्ना तलुकदार भी ज़ुबिन से जुड़ा एक किस्सा सुनाती हैं. वह याद करती हैं, ''एक बार ज़ुबिन किसी कार्यक्रम से लौट रहे थे. रास्ते में उन्हें कहीं से प्रार्थना की आवाज़ सुनाई दी. वो उतरे, उन्होंने देखा ये आवाज़ एक अनाथालय से आ रही है. उन्होंने बिना सोचे समझे कार्यक्रम से मिले दस लाख रुपए वहां डोनेट कर दिए.''

1972 में मेघालय के तुरा में जन्मे और असम के जोरहाट में पले-बढ़े ज़ुबिन 1990 के दशक की शुरुआत में अपने पहले एल्बम अनामिका से प्रसिद्धि के शिखर पहुंच गए थे.

उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में 38, 000 से भी ज़्यादा गाने गाए.

मानस ज्योति बोरा
इमेज कैप्शन, मानस ज्योति बोरा ज़ुबिन से जुड़े कई क़िस्से सुनाते हैं

ज़ुबिन के बचपन के दोस्त मानस ज्योति बोरा के पास ज़ुबिन से जुड़े कई किस्से हैं. इन्हें हमें सुनाते हुए वह कई बार फूट-फूटकर रो पड़े.

उन्होंने कहा, ''आजकल मैं किसी भगवान को नहीं मानता. ज़ुबिन के सामने ही प्रार्थना करता हूं. जो प्यार उसके लिए असम के लोगों में है, वो केवल भगवान को मिल सकता है...इंंसान को नहीं. ज़ुबिन भी असम से, यहां के लोगों से बहुत प्यार करता था. यहां कुछ भी बुरा होता तो उसे बहुत तकलीफ़ होती. एक बार मुबंई में 'या अली' की रिकॉर्डिंग के वक़्त उसने रात में फ़ुटपाथ से गुज़रते हुए मुझसे कहा था कि मुझे चार्ली चैपलिन जैसा बनना है. फ़ुटपाथ पर सोना है, इनलोगों के साथ रहना है. वह वाकई में फ़ुटपाथ के लोगों का ज़ुबिन था.''

"जिस दिन उसका शव आया उस दिन मुझे उससे की एक बात बहुत याद आई."

"मैंने एक बार ज़ुबिन से कहा था - तुम अब अपना परिवार बढ़ाओ. एक बच्चा कर लो. पर उस दिन जब असम के छोटे-छोटे बच्चों को उसके लिए रोते देखा तो मुझे महसूस हुआ कि मैं किस आदमी को बच्चे के लिए कह रहा था, उसे जिसे असम का हर बच्चा ज़ुबिन कहता है. असम का हर बच्चा ही जिसका बच्चा है.''

लोग बताते हैं कि ज़ुबिन बहुत आवेग में आकर फ़ैसले लेते थे. उन्हें कोई नियंत्रित नहीं कर सकता.

अपनी मर्ज़ी के मालिक, अपनी धुन में रहने वाला, बेफ़िक्र, दिलदार और राजनीति से दूर रहने की बात करने वाला एक ऐसा गायक, अभिनेता, निर्देशक, कंपोज़र जो अब इस दुनिया में तो नहीं है लेकिन इस बार असम की राजनीति के केंद्र में ज़रूर है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित