न्यूयॉर्क के तहख़ाने में रखे अपने कई टन सोने को वापस क्यों लाना चाहते हैं यूरोप के देश

यह तिजोरी 90 टन के स्टील सिलेंडर से सिक्योर है

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इमेज कैप्शन, अमेरिका के केंद्रीय बैंक (फ़ेडरल रिज़र्व) के दफ़्तर के तहख़ाने में कई टन सोना जमा है.
    • Author, गुइलेर्मो डी. ओल्मो
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

न्यूयॉर्क में लिबर्टी स्ट्रीट पर ज़मीन से 25 मीटर नीचे अमेरिका का फ़ेडरल रिज़र्व अपने मुख्यालय के तहख़ाने में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों, सरकारों और संस्थानों के स्वामित्व वाले पांच लाख से ज़्यादा सोने के बिस्किट की सुरक्षा करता है.

फ़ेडरल रिज़र्व, जिसे अक्सर 'फ़ेड' भी कहा जाता है अमेरिका का केंद्रीय बैंक है.

फ़ेडरल रिज़र्व की यह तिजोरी 90 टन के स्टील सिलेंडर से सिक्योर है और एक बार बंद हो जाने के बाद इसके विशाल ताले को अगले दिन तक खोला नहीं जा सकता है.

यह फ़ेडरल रिज़र्व का गोल्ड वॉल्ट है, जो दुनिया का सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार है. इसमें लगभग 6,300 टन सोने की सिल्लियों के ढेर रखे हुए हैं, जिनका वर्तमान मूल्य एक ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा है.

ये अमेरिका की जीडीपी का लगभग चार फीसदी है.

ये गोल्ड वॉल्ट ग्लोबल फाइनेंस सिस्टम की स्थिरता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. क्योंकि कई देश अपने सोने को यहां स्टोर करते हैं.

ये सोना उनकी करेंसी को सपोर्ट करने और मुश्किल हालात से निपटने के लिए आखिरी सिक्योर प्रॉपर्टी है.

सोने को वित्तीय उथल-पुथल या भू-राजनीतिक अस्थिरता और मुद्रास्फीति के कारण पूंजी मूल्य में होने वाली हानि के समय एक सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है. इसलिए यह कीमती मेटल दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों खासकर यूरोपीय बैंकों के रिज़र्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

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अमेरिका की बर्कले यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल मॉनेटरी सिस्टम के एक्सपर्ट बैरी आइचेंग्रीन ने बीबीसी मुंडो को बताया, "यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक है क्योंकि प्रतिकूल भू-राजनीतिक घटनाओं के सामने यह उन्हें बैंकों और कंपनियों के लिए अंतिम ऋणदाता के रूप में काम करने और विदेशी मुद्रा बाज़ारों में हस्तक्षेप करने की अनुमति देता है."

दशकों तक अमेरिका और उसके फ़ेडरल रिज़र्व को इस तरह की ज़रूरी संपत्ति के सबसे भरोसेमंद संरक्षक के रूप में देखा जाता था.

खासकर कई यूरोपीय देश जो सोवियत संघ की ताक़त से ख़तरा महसूस करते थे और वहां बड़ी मात्रा में सोने को रिज़र्व करते थे.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद से यूरोपीय राजनेताओं और एक्सपर्ट्स ने वहां मौजूद अपने सोने को वापस लाने की संभावना जताई है.

हाल के महीनों में डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय सहयोगियों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं. ट्रंप की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की अवहेलना, टैरिफ, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क की संप्रभुता, या हाल ही में ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध जैसे मुद्दे शामिल हैं.

इन मतभेदों ने अमेरिका में रखे यूरोपीय सोने की सुरक्षा के बारे में चिंता पैदा कर दी है.

यूरोप का सोना अमेरिका कैसे पहुँचा?

सोवियत खतरे के डर से यूरोपीय देशों ने 1950 के दशक से ही अपना सोना अमेरिका में जमा करना शुरू कर दिया था

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इमेज कैप्शन, सोवियत ख़तरे के डर से यूरोपीय देशों ने 1950 के दशक से ही अपना सोना अमेरिका में जमा करना शुरू कर दिया था

रूस का केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिज़र्व को अपने ही क्षेत्र में रखता है, जिससे यह पश्चिमी प्रतिबंधों के संभावित प्रभाव से सुरक्षित रहता है. लेकिन कई यूरोपीय देश अभी भी अपना गोल्ड रिज़र्व विदेशों में रखते हैं.

इनमें से कई देशों ने अपना सोना न्यूयॉर्क गोल्ड वॉल्ट में रखा है.

1950 के दशक से ही वहां यूरोपीय सोना जमा होना शुरू हो गया था. आइचेंग्रीन के मुताबिक़, "उस दौर में जर्मनी और अन्य यूरोपीय देश तेज़ी से अमेरिका को निर्यात कर रहे थे. उन्हें सोने और डॉलर में भुगतान हो रहा था."

"सोने को जहाज़ या विमान पर लादने और शिपमेंट की सुरक्षा के लिए बीमा कराने में पैसा लगता है, इसलिए इन देशों ने सोचा कि इसे फ़ेडरल रिज़र्व वॉल्ट में रखना बेहतर होगा क्योंकि वहाँ रखने के लिए कोई शुल्क भी नहीं लगता है."

1944 में ब्रेटन वुड्स में तैयार किए गए सिस्टम ने डॉलर के लिए सोने से जुड़ा एक फिक्स एक्सचेंज रेट स्थापित किया, इसलिए सोना और डॉलर सबसे विश्वसनीय संपत्ति बन गए.

युद्ध के बाद कमज़ोर यूरोपीय शक्तियों ने अमेरिका के फ़ेडरल रिज़र्व की देखरेख में बिना किसी लागत के इन्हें जमा करने का फ़ायदा उठाया. दूसरी ओर सोवियत ख़तरे को देखते हुए, अमेरिकी संरक्षण ही सबसे अच्छी गारंटी थी.

डोनाल्ड ट्रंप की वापसी

फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल (दाएं) पर ट्रंप के साथ

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इमेज कैप्शन, फ़ेडरल रिज़र्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल (दाएं) ट्रंप के साथ

लेकिन अब सोवियत संघ का विघटन हो चुका है. ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच दशकों से चले आ रहे सद्भाव को बाधित कर दिया है.

जर्मनी के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का भंडार है. ये अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. जर्मनी संभावित जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील देशों में से एक है और वहां कई चेतावनी भरी आवाज़ें उठी हैं.

बुंडेसबैंक के मुख्य शोधकर्ता रहे अर्थशास्त्री इमानुएल मॉन्च ने न्यूयॉर्क में जर्मन केंद्रीय बैंक के रखे गए सोने की वापसी की मांग की.

जर्मन मीडिया के अनुमानों के मुताबिक़, फ़ेडरल रिज़र्व के पास जर्मनी का लगभग 1,200 टन सोना है जिसकी क़ीमत लगभग 200 अरब अमेरिकी डॉलर होगी.

मॉन्च मानते हैं कि इसे दोबारा हासिल करने से जर्मनी को ज़्यादा रणनीतिक स्वतंत्रता मिलेगी.

वो कहते हैं, "मौजूदा भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए अमेरिका में इतनी मात्रा में सोना रखना जोखिम भरा प्रतीत होता है."

इसी तरह जर्मन टैक्सपेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष माइकल जैगर ने कहा, "ट्रंप अप्रत्याशित हैं और राजस्व जुटाने के लिए कुछ भी करने में सक्षम हैं. इसीलिए हमारा सोना अब फ़ेडरल रिज़र्व के ख़ज़ाने में सुरक्षित नहीं है."

"अगर ग्रीनलैंड को लेकर उकसावा जारी रहता है तो क्या होगा? इससे यह जोखिम बढ़ जाता है कि बुंडेसबैंक अपने सोने तक पहुंच नहीं पाएगा. इसलिए उसे अपने रिज़र्व को वापस अपने देश में लाना होगा."

यह चिंता सीडीयू के सदस्यों, चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की पार्टी और अन्य राजनीतिक ताकतों ने भी ज़ाहिर की है.

'चिंता की कोई बात नहीं'

एक तिजोरी में वह सोना रखा जाता है जिसे अन्य देश अमेरिकी फेडरल रिजर्व को सौंपते हैं

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इमेज कैप्शन, इस तिजोरी में कई यूरोपीय देशों का सोना जमा है

लेकिन बुंडेसबैंक के अध्यक्ष जोआखिम नागल ने इन आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की है. उन्होंने बीते साल अमेरिका में हुई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक बैठक में कहा था, "चिंता की कोई बात नहीं है."

फरवरी में, उन्हें एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर फिर से बात करनी पड़ी. उन्होंने कहा, "यह बात मुझे रात को सोने नहीं देती. हालांकि मुझे अमेरिकी केंद्रीय बैंक में अपने सहयोगियों पर पूरा भरोसा है."

लेकिन न तो फ़ेडरल रिज़र्व और न ही ट्रंप प्रशासन ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है. विश्लेषक आइचेंग्रीन ने कहा, "मुझे कोई आश्वस्त करने वाली बात सुनने को नहीं मिली है और मुझे लगता है कि यह समय पर होगा."

बीबीसी मुंडो ने फ़ेडरल रिज़र्व से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. संस्था की चुप्पी उसके अध्यक्ष जेरोम पॉवेल और सरकार के बीच संबंधों में तनावपूर्ण क्षण के साथ मेल खाती है.

ट्रंप ने ब्याज दरों को कम करने से इनकार करने के लिए उन पर बार-बार हमला किया है. न्याय विभाग ने पॉवेल के खिलाफ एक आपराधिक जांच शुरू की है.

उन्होंने फ़ेडरल रिज़र्व की स्वतंत्रता को समाप्त करने और इसे "राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं का पालन करने" के लिए मजबूर करने के लिए कार्यपालिका की "धमकियों और दबाव" के हिस्से के रूप में निंदा की है.

1960 के दशक में क्या हुआ था

1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर की सोने में कन्वर्टिबिलिटी को खत्म कर दिया

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इमेज कैप्शन, 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर की सोने में कन्वर्टिबिलिटी को ख़त्म कर दिया था

जर्मनी एकमात्र यूरोपीय देश नहीं है जिसका सोना न्यूयॉर्क में जमा है. इटली और स्विट्ज़रलैंड का सोना भी फ़ेडरल रिज़र्व के पास है.

नीदरलैंड्स ने 2014 में फ़ेडरल रिज़र्व में जमा अपने भंडार का प्रतिशत 51 फीसदी से घटाकर 31 फीसदी कर दिया.

उस समय जर्मनी ने अपने कुछ सोने के बिस्किट वापस स्वदेश भेज दिए थे, लेकिन उनमें से अधिकांश गोल्ड वॉल्ट में ही रह गए थे.

आइचेंग्रीन बताते हैं, "यह ग्रीक ऋण संकट और यूरो संकट का समय था. यूरोपीय लोग यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनकी करेंसी और बैंक डिपोज़िट किसी ठोस चीज़ से समर्थित हों."

कई साल पहले 1960 के दशक में फ़्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने डॉलर के अचानक अवमूल्यन के डर से फ़ेडरल रिज़र्व में अपने देश के रखे गए सोने के बिस्किट वापस ले लिए थे.

समय ने उन्हें सही साबित किया. 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर की सोने में कन्वर्टिबिलिटी को ख़त्म कर दिया. इससे दूसरे विश्व युद्ध के अंत में तैयार किया गया इंटरनेशनल मॉनेटरी सिस्टम कमज़ोर हो गया.

इससे न्यूयॉर्क में रखे सोने के बिस्किट का डॉलर मूल्य रातों-रात काफ़ी कम हो गया था.

एक महंगी वापसी

जर्मनी यूरोप का वह देश है जिसके पास सोने का सबसे बड़ा भंडार है

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इमेज कैप्शन, जर्मनी के पास सोने का सबसे बड़ा भंडार है

फ़ेडरल रिज़र्व के गोल्ड वॉल्ट में अब पहले की तुलना में कम सोना है. फ़ेडरल रिज़र्व के आंकड़ों के मुताबिक़, न्यूयॉर्क के वॉल्ट में जमा अंतरराष्ट्रीय सोने के रिज़र्व की मात्रा में 1973 से लगातार गिरावट आई है. उस वक्त ये 12 हज़ार टन से ज़्यादा तक पहुंच गई थी.

लेकिन यूरोपीय लोग सोने को वहीं रखने के विचार के अभी भी समर्थक हैं.

जर्मनी में आईएफओ इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के क्लेमेंस फ्यूस्ट ने ब्रितानी अख़बार 'द गार्जियन' को बताया कि सोने को वापस लाना मौजूदा स्थिति में आग में घी डालने जैसा होगा और इसके अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं.

यूरोपीय सोने के संरक्षक के रूप में अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे संदेह दशकों से चली आ रही विश्व व्यवस्था में एक और दरार पैदा करने की चेतावनी दे रहे हैं.

आइचेंग्रीन के मुताबिक़, "इसके हटने से अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय परिणाम नहीं होंगे. सोने की सुरक्षा में अमेरिका ने मुफ्त में योगदान दिया है. ठीक उसी तरह जैसे नेटो का सुरक्षा कवच या वैश्विक मुद्रा के रूप में डॉलर."

"यह सरकार इस बात पर विश्वास नहीं करती कि अमेरिका को सेवाएं मुफ्त में देनी चाहिए. कोई भी ऐसी चीज़ जो अमेरिका में अपनी जमा राशि की सुरक्षा के बारे में सहयोगियों के संदेह को बढ़ाती है, देश के प्रति उनकी सद्भावना को और कम करती है, जो कि तब आवश्यक है जब आपको मध्य पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति में उनकी मदद की आवश्यकता होती है."

अभी तक ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि किसी यूरोपीय देश ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अपना सोना वापस अपने देश लाने का फैसला किया हो.

लेकिन शायद ईसीबी की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड के पिछले साल दिए गए भाषण के शब्द इसके कुछ नेताओं के मन में गूंज रहे होंगे, "इंटरनेशनल मॉनेटरी सिस्टम के इतिहास में ऐसे समय भी आते हैं जब अडिग दिखने वाली नींव भी हिलने लगती है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.