होर्मुज़ बंद होने से खाना, दवाइयों और स्मार्टफ़ोन पर असर, जानिए कैसे

- Author, बेन चु
- पदनाम, बीबीसी वेरिफ़ाई
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
अमेरिका-इसराइल और ईरान के युद्ध के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आने वाली तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो गई है. इससे दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतों में तेज़ उछाल आया है.
पेट्रोल पहले ही महंगा हो चुका है और ब्रिटेन में घरेलू हीटिंग बिल का बढ़ना भी लगभग तय है.
लेकिन इस जंग का असर सिर्फ़ ईंधन तक सीमित नहीं है. कई अहम रसायन, सामान्यतः अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आने वाली गैसें और अन्य उत्पाद भी अब प्रभावित हो रहे हैं.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने पाया है कि खाद्य पदार्थों से लेकर स्मार्टफ़ोन और दवाइयों तक कई वस्तुओं की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि युद्ध से पहले जहां रोज़ाना 100 से ज़्यादा जहाज़ इस जलडमरूमध्य से गुज़रते थे, अब उनकी संख्या घटकर मुट्ठीभर रह गई है.
यहां देखें किन चीज़ों पर असर पड़ सकता है
खाद (खाद्य पदार्थ)

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तेल और गैस से पेट्रोकेमिकल्स निकलते हैं और खाड़ी देशों में निर्यात के उद्देश्य के लिए इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है. इनमें सबसे अहम है खाद (फ़र्टिलाइज़र), जो वैश्विक कृषि उत्पादन के लिए ज़रूरी है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया की लगभग एक-तिहाई खाद- जैसे कि यूरिया, पोटाश, अमोनिया और फ़ॉस्फ़ेट- सामान्यतः होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर जाती है. विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से इस मार्ग से खाद-संबंधी उत्पादों की शिपमेंट लगभग ठप हो गई है.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इस समय खाद की कमी कृषि उत्पादन को नुक़सान पहुंचा सकती है, क्योंकि मार्च और अप्रैल उत्तरी गोलार्ध में बुआई का मौसम है. किसान अगर अभी कम खाद इस्तेमाल करेंगे तो साल के आगे के महीनों में होने वाली पैदावार पर असर पड़ेगा.
किएल इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के अनुसार, "आपूर्ति थोड़े समय के लिए भी बंद होने से पूरा फ़सल चक्र बिगड़ सकता है, और जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने के बाद भी खाद्य सुरक्षा पर इसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं."
इंस्टीट्यूट के अध्ययन से पता चलता है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो जाए तो गेहूं की वैश्विक कीमतें 4.2% और फल-सब्ज़ियों की कीमतें 5.2% तक बढ़ सकती हैं. अनुमान है कि खाद्य कीमतों में कुल बढ़ोतरी से सबसे ज़्यादा प्रभावित देश होंगे- ज़ाम्बिया (31%), श्रीलंका (15%), ताइवान (12%) और पाकिस्तान (11%).
रूस सामान्यतः दुनिया की खाद का लगभग पांचवां हिस्सा निर्यात करता है और विश्लेषकों का कहना है कि वह उत्पादन बढ़ाकर इस कमी को पूरा कर सकता है. व्लादिमीर पुतिन के विशेष दूत, किरिल दिमित्रिएव ने कहा है कि खाद जैसी कमोडिटी का बड़ा उत्पादक रूस 'बेहतर स्थिति' में है.
हीलियम (माइक्रोचिप्स)

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दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम गैस की शिपमेंट सामान्यतः क़तर से होती है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है. यह प्राकृतिक गैस उत्पादन से निकलने वाला उप-उत्पाद है और इसका इस्तेमाल सेमीकंडक्टर वेफ़र्स बनाने में होता है. इन्हें आगे प्रोसेस करके कंप्यूटर, गाड़ियों और घरेलू उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले माइक्रोचिप्स बनाए जाते हैं.
हीलियम का इस्तेमाल अस्पतालों में मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) स्कैनर के मैग्नेट को ठंडा रखने के लिए भी होता है.
ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद यह गैस बनाने वाला, क़तर का विशाल रास लाफ़ान प्लांट उत्पादन बंद कर चुका है. क़तर सरकार ने चेतावनी दी है कि इस नुक़सान की मरम्मत में तीन से पांच साल लग सकते हैं, जिससे आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है.
2023 में अमेरिकी सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एसोसिएशन ने चेतावनी दी थी कि अगर वैश्विक हीलियम आपूर्ति बाधित हुई तो 'कीमतों में तेज़ उछाल' आ सकता है.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि होर्मुज़ की रुकावट का असर स्मार्टफ़ोन से लेकर डेटा सेंटर्स तक कई अत्याधुनिक तकनीकों की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिख सकता है.
और काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस में वैश्विक स्वास्थ्य के वरिष्ठ फ़ेलो, प्रशांत यादव ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक हीलियम की कमी से एमआरआई की कीमतें बढ़ सकती हैं.
उन्होंने बीबीसी वेरिफ़ाई को बताया, "एमआरआई मशीनों को मैग्नेट ठंडा रखने के लिए लगभग 1,500 से 2,000 लीटर हीलियम चाहिए होती है. हर बार स्कैन करने पर उसका थोड़ा हिस्सा उबलकर या वाष्प बनकर ख़त्म हो जाता है. लोग अक्सर सोचते हैं कि हीलियम का मुख्य इस्तेमाल डेटा सेंटर्स, सेमीकंडक्टर्स और एआई व डेटा इंडस्ट्री की कूलिंग में होता है. लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि हीलियम एमआरआई और अन्य चिकित्सीय उपयोगों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है."
पेट्रोकेमिकल्स से निकलने वाले पदार्थ (दवाइयां)

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पेट्रोकेमिकल्स से निकलने वाले पदार्थ, जैसे मेथनॉल और एथिलीन, वैश्विक स्तर पर दवाइयों के उत्पादन में अहम सामग्री हैं, जिनमें दर्दनिवारक, एंटीबायोटिक्स और वैक्सीन शामिल हैं.
गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल के देशों- सऊदी अरब, क़तर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन- के पास वैश्विक पेट्रोकेमिकल उत्पादन क्षमता का लगभग 6% हिस्सा है. ये देश मुख्य रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करके इन रसायनों का निर्यात करते हैं, जिनमें से लगभग आधे एशिया जाते हैं.
भारत दुनिया के जेनेरिक (गैर-ब्रांडेड) दवाइयों के निर्यात का पांचवां हिस्सा बनाता है, जिनमें से कई अमेरिका और यूरोप भेजी जाती हैं. इनमें से कई फ़ार्मास्यूटिकल उत्पाद सामान्यतः खाड़ी क्षेत्र के हवाई अड्डों, ख़ासकर दुबई, से वैश्विक बाज़ारों तक पहुंचाए जाते हैं, लेकिन संघर्ष के कारण यह बुरी तरह बाधित हो गया है.
कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में रुकावट के चलते घरेलू स्तर पर दवाइयों की कीमतें बढ़ सकती हैं.
सल्फ़र (धातुएं/बैटरियां)
सल्फ़र कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की प्रोसेसिंग से निकलने वाला एक और उप-उत्पाद है और निर्यात के लिए खाड़ी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बनाया जाता है.
दुनिया के समुद्री सल्फ़र व्यापार का लगभग आधा हिस्सा सामान्यतः होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है.
इसका मुख्य उपयोग कृषि खाद के रूप में होता है, लेकिन यह धातु प्रसंस्करण या प्रोसेसिंग के लिए भी बेहद ज़रूरी है.

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सल्फ़र से सल्फ़्यूरिक एसिड बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल तांबा, कोबाल्ट और निकल की प्रोसेसिंग में होता है. इसके साथ लीथियम के निष्कर्षण या एक्सट्रेक्शन में भी.
ये सभी धातुएं बैटरियों के उत्पादन के लिए ज़रूरी हैं, जिनका इस्तेमाल घरेलू उपकरणों से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों और सैन्य उपकरणों, जैसे ड्रोन, तक में होता है.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर सल्फ़र की आपूर्ति बाधित रही तो बैटरियों वाले उत्पादों के उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ना तय है.
अतिरिक्त रिपोर्टिंग: टॉम एजिंगटन और जोशुआ चीथम
ग्राफ़िक्स: टॉम शील
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































