जब पाकिस्तान ने करवाई थी अमेरिका और चीन की सीक्रेट मीटिंग

अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या ख़ान

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    • Author, सक़लैन इमाम
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू सर्विस
    • ........से, लंदन
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

पाकिस्तान की तरफ़ से अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश के बाद यह ख़बरें भी चल रही हैं कि दोनों पक्षों के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में वार्ता हो सकती है.

यह बातचीत हो पाएगी या नहीं? अगर वाक़ई पाकिस्तान की पेशकश पर ईरान और अमेरिका सहमत होते हैं तो क्या इस्लामाबाद में ही बातचीत होगी? इनमें कौन-कौन शामिल होगा? इस तरह के सवालों के जवाब अब तक साफ़ नहीं हैं.

लेकिन याद रहे कि पाकिस्तान की ओर से अमेरिका और उसके प्रतिद्वंद्वी देश के बीच मध्यस्थता की यह पहली कोशिश नहीं होगी.

लगभग 55 साल पहले पाकिस्तान की कोशिशों ने अमेरिका और चीन के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी, जब साल 1971 में अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने चीन का एक ख़ुफ़िया लेकिन ऐतिहासिक दौरा किया था.

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(इसके बारे में बीबीसी पर एक लेख पहली बार अक्तूबर 2020 में प्रकाशित किया गया था, जिसे दोबारा प्रस्तुत किया जा रहा है.)

चीन-रूस के बीच खाई का फ़ायदा उठाना चाहता था अमेरिका

उस समय पाकिस्तान गंभीर राजनीतिक संकट में घिरा हुआ था और अमेरिका शीत युद्ध के उस दौर में चीन और सोवियत संघ के बीच पैदा हुई वैचारिक और रणनीतिक खाई का फ़ायदा उठाना चाहता था.

यह वह वक़्त था जब पाकिस्तान में आम चुनाव हो चुके थे लेकिन सरकार बनाने में देरी हो रही थी और पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू हो चुकी थी. पूर्वी पाकिस्तान से हज़ारों की तादाद में बांग्ला बोलने वाले पलायन कर रहे थे, जबकि मुक्ति वाहिनी भी पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ कार्रवाईयों में लगी हुई थी.

यह वह दौर था जब सोवियत यूनियन ने भारत के साथ 'शांति, मित्रता और सहयोग' के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते में रणनीतिक सहयोग पर ज़ोर दिया गया था और इस समझौते के बाद भारत का पारंपरिक गुटनिरपेक्षता का दावा कमज़ोर हो गया था. सोवियत संघ शायद पाकिस्तान के चीन की ओर अधिक झुकाव की वजह से नाराज़ भी था.

लेकिन इन सभी परिस्थितियों और घटनाओं की पृष्ठभूमि में अमेरिका, पाकिस्तान को चीन के साथ अपने संबंधों में सुधार के मक़सद से अहम भूमिका निभाने के लिए इस्तेमाल कर रहा था.

इससे पहले 1960 के दशक में होने वाली ज़्यादातर घटनाओं के बीच सोवियत संघ और चीन के बीच संबंधों में कड़वाहट बढ़ रही थी.

पश्चिमी देश और ख़ास तौर से अमेरिका इन अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर बारीकी से ध्यान रख रहे थे, लेकिन अब तक किसी ने दो कम्युनिस्ट सरकारों, चीन और सोवियत संघ, के बीच मतभेदों का फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की थी.

रिचर्ड निक्सन पहले अमेरिकी नेता थे जिन्होंने इस काम की शुरुआत की. राष्ट्रपति बनने से पहले ही उन्होंने एक आलेख में चीन के साथ संबंध बेहतर बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था. राष्ट्रपति चुने जाने के बाद साल 1969 में उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या ख़ान से चीन के साथ ख़ुफ़िया संपर्क के लिए मदद मांगी थी.

इस ख़ुफ़िया दौरे की पूरी योजना कैसे बनाई गई और इसे दुनिया की नज़रों से पूरी तरह ओझल रखने के लिए 'नक़ली किसिंजर' के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल को हवादार पहाड़ी स्थल मरी कैसे भेजा गया, इसका जवाब आगे मिलेगा. उससे पहले उन माध्यमों के बारे में जानना ज़रूरी है जिनका इस्तेमाल अमेरिका ने चीन से संपर्क के लिए किया था.

चीन से संपर्क के कई चैनल्स

2019 में ली गई हेनरी किसिंजर की तस्वीर

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इस दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान के अलावा रोमानिया और पोलैंड के माध्यम से भी चीनी नेतृत्व को संपर्क के संदेश भिजवाए. इन्हीं कोशिशों के नतीजे में आख़िरकार उस समय अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान की मध्यस्थता से 9 जुलाई 1971 को ख़ुफ़िया मिशन पर बीजिंग गए और 11 जुलाई को वापस आए.

किसिंजर के इसी गुप्त दौरे के अगले साल फ़रवरी में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन का दौरा किया. इस तरह अंतरराष्ट्रीय बिसात पर अमेरिका ने दो कम्युनिस्ट शक्तियों के बीच के मतभेदों को अपने लिए इस्तेमाल करने के कार्यक्रम की शुरुआत की.

रिचर्ड निक्सन साल 1967 में ही चीन से संबंधों में सुधार का इशारा कर चुके थे. हालांकि इसकी व्यावहारिक शुरुआत जनवरी 1969 से हुई, यानी निक्सन के राष्ट्रपति पद संभालते ही.

हालांकि पोलैंड के माध्यम से राजदूतों के स्तर पर होने वाले संपर्कों से अमेरिका को यह अंदाज़ा हो गया था कि चीन भी अमेरिका से संबंधों में सुधार में दिलचस्पी रखता है लेकिन इसके लिए अभी कोई ठोस काम शुरू नहीं हुआ था.

राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन एक अगस्त 1969 को पाकिस्तान के दो दिवसीय दौरे पर आए. यहां उनकी राष्ट्रपति आग़ा मोहम्मद याह्या ख़ान से मुलाक़ात हुई. और, इस तरह चीन से संपर्क के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को बेहतरीन माध्यम बना लिया.

ख़ुफ़िया संपर्क की शुरुआत

पाकिस्तान की यात्रा के दौरान लिमोज़ीन से उतरते राष्ट्रपति निक्सन

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हर बात को बेहद गोपनीय रखा जा रहा था. इसी वजह से राष्ट्रपति याह्या ख़ान इस दुविधा में रहे कि क्या उन्हें उस समय चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई को संदेश भेजना चाहिए या वह उन्हें यह पैग़ाम तब दें जब उनकी आमने-सामने मुलाक़ात हो. उधर किसिंजर ने विदेश विभाग से भी इस कोशिश को छिपाए रखा.

आर्काइव्स के अनुसार राष्ट्रपति निक्सन चाहते थे कि राष्ट्रपति याह्या ख़ान अपनी किसी आम मुलाक़ात में चीनी नेताओं को अमेरिका की इस इच्छा के बारे में बताएं.

उन्होंने उस वक़्त पाकिस्तान के अमेरिका में राजदूत आग़ा हिलाली को बताया था कि इस मामले पर अमेरिकी सरकार में केवल किसिंजर से संपर्क किया जाएगा.

जुलाई और अगस्त में निचले स्तर के संपर्क के सिलसिले में प्रगति शुरू हुई. पोलैंड के माध्यम से भी संपर्क स्थापित हुए. लेकिन 16 अक्तूबर को हेनरी किसिंजर ने राष्ट्रपति निक्सन को जानकारी दी कि पाकिस्तान के राजदूत आग़ा हिलाली ने उनसे मुलाक़ात की है और बताया कि राष्ट्रपति याह्या की चीनी नेताओं से मुलाक़ात साल 1970 की शुरुआत में होने वाली है.

हिलाली यह जानना चाहते थे कि अमेरिका पाकिस्तान के माध्यम से चीन के लिए किस तरह का संदेश देना चाहता है. इस पर किसिंजर ने कहा, "राष्ट्रपति याह्या जब चीनी नेताओं से मुलाक़ात करें तो उन्हें यह बताएं कि अमेरिका अपनी नौसेना के दो जहाज़ों (डिस्ट्रॉयर्स) को ताइवान जलडमरूमध्य से हटा रहा है."

ताइवान का नाम 'फ़ॉर्मोसा' भी रहा है.

उसी वर्ष अमेरिका ने चीन को ऐसे और इशारे करने शुरू कर दिए जिससे चीन को भरोसा हो जाए कि अमेरिका संबंधों में सुधार के लिए गंभीर है. इनमें चीन पर अमेरिका के कुछ कृषि उत्पादों को ख़रीदने पर लगे प्रतिबंध हटाने से लेकर दूसरी गतिविधियों की शुरुआत के भी संकेत थे.

हेनरी किसिंजर आग़ा हिलाली के माध्यम से पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या ख़ान के साथ लगातार संपर्क में थे. याह्या ख़ान ने किसिंजर को बताया था कि चीनी नेता अमेरिकी कोशिशों से ख़ुश हैं लेकिन वह यह नहीं चाहते कि अमेरिका चीन की रज़ामंदी को उसकी कमज़ोरी समझे.

किसिंजर ने फ़रवरी 1970 को याह्या ख़ान को संदेश भिजवाया कि वह चीनियों से कह दें कि अमेरिका चाहता है कि यह सारा मामला प्रेस से पोशीदा रखा जाए. इसके लिए अमेरिका पेकिंग (बीजिंग) के साथ सीधा संपर्क स्थापित करना चाहता है जिसे व्हाइट हाउस के अलावा कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जानता होगा.

ताइवान का नाज़ुक मामला

हेनरी किसिंजर और चीनी प्रधान मंत्री चाउ एन लाई

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इस दौरान अमेरिका ने ताइवान के नेता च्यांग काई-शेक को भी भरोसे में लिया, जो पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना से अमेरिकी संपर्क की कोशिशों से ख़ुश नहीं थे. राष्ट्रपति निक्सन ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनका महत्व किसी भी तरह कम नहीं होगा, लेकिन अगर वह चीन और अमेरिकी संघर्ष के ख़तरों को कम नहीं करते हैं तो वह 'अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी करने में नाकाम होंगे'.

अक्तूबर में राष्ट्रपति याह्या और राष्ट्रपति निक्सन की इस सिलसिले में एक और मुलाक़ात हुई जिसमें निक्सन ने याह्या से चीन जाने के बारे में उनके कार्यक्रम की जानकारी ली. निक्सन ने कहा कि वह किसी तीसरे देश के माध्यम से चीन के साथ संपर्क का सिलसिला स्थापित करना चाहते हैं.

संपर्कों का यह सिलसिला रोमानिया के राष्ट्रपति निकोला चाउसेस्कु के माध्यम से भी चल रहा था. किसिंजर ने राष्ट्रपति चाउसेस्कु से मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि अमेरिका चीन के साथ संपर्क का सीधा सिलसिला क़ायम करना चाहता है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका चीन के साथ संघर्ष नहीं चाहता है. चाउसेस्कु ने अमेरिका के इस संदेश को चीन तक पहुंचाने का वादा किया.

उधर पाकिस्तान के राजदूत आग़ा हिलाली ने किसिंजर को दिसंबर 1970 में बताया कि राष्ट्रपति याह्या ने राष्ट्रपति निक्सन का संदेश चीनी नेताओं तक पहुंचा दिया है, "चाउ एन-लाई ने राष्ट्रपति याह्या को बताया कि अमेरिका से बातचीत की कोशिश का चेयरमैन माओ और वाइस चेयरमैन लिन बियाओ समर्थन करते हैं."

हालांकि चाउ एन-लाई ने राष्ट्रपति याह्या से यह भी कहा कि ताइवान का सवाल चीन के लिए एक मुख्य मामला है. उन्होंने कहा कि चीन ताइवान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के सिलसिले में किसी भी बातचीत के प्रयास का स्वागत करेगा. किसिंजर ने चीन से बातचीत के लिए ज़बानी संदेश भेजने को कहा.

हेनरी किसिंजर ने संकेत दिया कि अमेरिका चीन के साथ ताइवान सहित कई और मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है. हालांकि, इसमें यह बात भी थी कि अमेरिका पूर्वी एशिया से अपनी सेनाएं, तनाव कम होने के साथ-साथ धीरे-धीरे कम करेगा.

निक्सन की घोषणा

किसिंजर (दाएं) और राष्ट्रपति निक्सन

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उसी शाम राष्ट्रपति निक्सन ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में घोषणा की थी कि अमेरिका की चीन के साथ संबंधों में सुधार की कोशिशें जारी रहेंगी.

इसी पृष्ठभूमि में साल 1971 की शुरुआत में कम्युनिस्ट विचारधारा वाले एक अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो चीन का दौरा भी करते हैं. यह वही अमेरिकी पत्रकार हैं जो इससे पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास पर एक किताब भी लिख चुके हैं और कम्युनिस्ट चीन से हमदर्दी भी रखते हैं.

इसी वर्ष यानी सन 1971 के अप्रैल महीने में पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या ख़ान चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई का संदेश अमेरिका भिजवाते हैं. यह संदेश हेनरी किसिंजर को 27 अप्रैल को मिला जिसमें चीनी नेता ने कहा था कि चीनी सरकार बातचीत के लिए अमेरिका के प्रतिनिधि का स्वागत करेगी.

इसके बाद दोनों देशों में सीधे संपर्कों की तैयारियों और उससे जुड़ी बातचीत ने ज़ोर पकड़ लिया. अमेरिकी सरकार ताइवान के बारे में चीन को आश्वासन नहीं देना चाहती थी लेकिन इसकी वजह से संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश को रोकना भी नहीं चाहती थी.

राष्ट्रपति निक्सन ने अपने सलाहकार किसिंजर को निर्देश दिया कि वह चीन जाने की तैयारी करें. लेकिन उन्होंने किसिंजर से कहा कि वह जब चीनी नेताओं से बात करें तो ताइवान के बारे में किसी नरमी का संकेत न दें, "चीनियों को कभी भी यह महसूस न हो कि अमेरिका ताइवान का सौदा करने के लिए तैयार है."

साल 1971 में 19 जून को आग़ा हिलाली ने किसिंजर को संदेश भेजा कि उन्हें राष्ट्रपति याह्या ख़ान ने बताया है कि आख़िरकर "चीन जाने के इंतज़ाम हो गए हैं और वह हमारे दोस्त (निक्सन) को उनके 'फ़ुल-प्रूफ़' होने का यक़ीन दिला दें."

इसी संदेश में किसिंजर से कहा गया था कि वह 8 जुलाई को पाकिस्तान पहुंच जाएं.

हालांकि हेनरी किसिंजर ने 21 जून को आग़ा हिलाली से एक मुलाक़ात की जिसमें दौरे की व्यवस्था के बारे में जानकारी ली और इस मिशन के ख़ुफ़िया होने के बारे में अपनी तसल्ली की. आग़ा हिलाली से उन्होंने उस जहाज़ के बारे में भी बात की जिस पर सवार होकर उन्हें चीन जाना था.

अगले दिन किसिंजर ने पाकिस्तान में अमेरिकी राजदूत जोसेफ़ फ़ारलैंड को अपने ख़ुफ़िया दौरे के बारे में जानकारी दी और बताया कि समय आने पर अमेरिकी विदेश मंत्री को भी विश्वास में लिया जाएगा. किसिंजर ने पहले पाकिस्तान पहुंचने के दौरान अपने सफ़र के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि वह 8 जुलाई को पाकिस्तान पहुंचेंगे और ज़ाहिर तौर पर उनकी वापसी 10 जुलाई को होने वाली थी.

अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के आर्काइव्स से सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों के अनुसार इस्लामाबाद के दूतावास से जून के अंत में संदेश आया कि व्यवस्था कर ली गई है. इसके अनुसार किसिंजर 11 जुलाई को वापस आ जाएंगे और फिर वह यहां से पेरिस रवाना हो जाएंगे.

दूतावास के पत्र में ख़ुफ़िया सफ़र की और जानकारी भी दी गई थी, "मुख्य यात्री (किसिंजर) काला चश्मा और एक हैट पहने होंगे. 'साइड ट्रिप' (चीन की यात्रा) के दौरान उनके साथ '(विंस्टन) लॉर्ड, होल्ड्रिज, स्मायर और दो ख़ुफ़िया एजेंट' होंगे."

"(हेनरी किसिंजर के एक स्टाफ़ ऑफ़िसर) सॉन्डर्स रावलपिंडी में ही रुकेंगे. एक और स्टाफ़ ऑफ़िसर हेल्परिन इस्लामाबाद में अमेरिकी राजदूत फ़ारलैंड और एक तीसरे सीक्रेट एजेंट के साथ एक पहाड़ी स्थल (मरी) की ओर रवाना हो जाएंगे, जबकि सॉन्डर्स एक गेस्ट हाउस में ठहरेंगे."

"पार्टी में शामिल दो लड़कियों, डाइयान मैथ्यूज़ और फ़्लोरेंस ग्वायर को अलग-अलग सेफ़ हाउस में रखा जाएगा. पार्टी के इस्लामाबाद आने तक इसके सभी सदस्यों को जानकारी दी जाएगी, सिवाय तीन सीक्रेट सर्विस के एजेंटों के, जो दूतावास में होंगे."

इस पत्र में यह भी कहा गया कि फ़ारलैंड को इस बात के लिए भी मनाया जाए कि दूतावास का डॉक्टर पहाड़ी स्थल पर उनके साथ न जाए, और "इसका सबसे अच्छा तरीक़ा यह हो सकता है कि हेल्परिन अपने फ़ील्ड स्टेशन से सॉन्डर्स को फोन करें और कहें कि मुख्य यात्री आराम कर रहे हैं और वह अकेले रहना चाहते हैं और ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर को फ़ोन करेंगे."

आग़ा हिलाली के बेटे ज़फ़र हिलाली ख़ुद भी राजनयिक रहे हैं. वह बताते हैं कि जब किसिंजर चीन के दौरे पर रवाना हो रहे थे तो "उसी वक़्त पहाड़ी जगह (मरी) की ओर एक नक़ली किसिंजर को रवाना किया गया था ताकि पक्के तौर पर यह लगे कि वह आराम के लिए मरी जा रहे हैं, न कि किसी ख़ुफ़िया मिशन पर."

इसके अलावा एक बोइंग जहाज़ में सफ़र की सहूलियतों और सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी दी गई. यह भी बताया गया कि जब 11 जुलाई को जहाज़ चकलाला एयरपोर्ट पर उतरेगा तो इस पार्टी को घुमा-फिरा कर गेस्ट हाउस ले जाया जाएगा ताकि यह लगे कि वह पहाड़ी स्थल से आई है.

"इसके बाद मुख्य यात्री (किसिंजर) राष्ट्रपति से मुलाक़ात करेंगे और उसके बाद वह एयरपोर्ट के लिए रवाना हो जाएंगे जहां से उनका विमान पेरिस के लिए उड़ान भरेगा."

यह सारी बातें योजना के अनुसार हुईं. और इस तरह यह ऐतिहासिक दौरा कामयाब रहा.

चीन से वापसी के बाद पेरिस से होते हुए किसिंजर वॉशिंगटन डीसी पहुंचे और फिर 15 जुलाई को राष्ट्रपति निक्सन ने किसिंजर के चीन के ख़ुफ़िया मिशन के बारे में एक बयान जारी किया.

हेनरी किसिंजर ने साल 1971 में चीन का दो बार दौरा किया, एक बार जुलाई में और फिर अक्तूबर में. चीन की तरफ़ से किसिंजर के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई ने हिस्सा लिया. बातचीत की शुरुआत में दोनों के बीच ताइवान के मामले पर मतभेद था लेकिन किसिंजर ने चीन के रुख़ को मान लिया.

इस मुलाक़ात के नतीजे में हेनरी किसिंजर ने वियतनाम, पूर्वी एशिया और जापान के बारे में चीन से अहम मामलों पर भी काफ़ी कामयाब बातचीत की. इसके अलावा चीन के साथ सोवियत संघ के ख़िलाफ़ एक साझा स्टैंड लेने की बुनियाद भी पड़ी.

पाकिस्तान को क्या मिला?

आगा हिलाली

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किसी भी बड़े अमेरिकी अधिकारी का चीन का यह दौरा पाकिस्तान की मध्यस्थता से मुमकिन हुआ था. इसमें राष्ट्रपति निक्सन के कहने पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या ख़ान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिन्होंने चीनी नेताओं को अपने प्रभाव से बातचीत के लिए राज़ी किया था. हालांकि उन परिस्थितियों में चीनी भी अमेरिकियों से संबंध बेहतर करना चाहते थे.

अमेरिका और चीन के संबंधों में पाकिस्तान की इस भूमिका, ख़ुफ़िया कूटनीति और भरोसा बहाल करने की बहुत तारीफ़ की जाती है. इस दौरे के बाद कम्युनिस्ट ब्लॉक की उभरती हुई शक्ति दो हिस्सों में बंट गई और कम्युनिस्ट ब्लॉक धीरे-धीरे कमज़ोर होना शुरू हो गया.

पाकिस्तान ने इस गुप्त मिशन की व्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभाई तो उसे इस सेवा के बदले क्या मिला? इसका साफ़-साफ़ जवाब अब तक नहीं मिल सका है. अमेरिका की इस गुप्त कूटनीति के दौरान पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई में लगी थी. इसी दौरान भारत सोवियत संघ की मदद से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग की तैयारियों में भी लगा था.

इस ख़ुफ़िया मिशन और इसके रणनीतिक महत्व को अंतरराष्ट्रीय मामलों के सभी विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं. दूसरी तरफ़ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की सेना की कार्रवाई पर चुप्पी के लिए निक्सन और किसिंजर की कड़ी आलोचना की जाती है.

ज़फ़र हिलाली के अनुसार राष्ट्रपति निक्सन के राष्ट्रपति याह्या के नाम धन्यवाद पत्र में उनके पिता आग़ा हिलाली का निक्सन ने ख़ास शुक्रिया अदा किया था. "निक्सन ने इतनी ज़्यादा तारीफ़ की थी कि मेरे पिता ने उनके पत्र में बदलाव कराए और पत्र दोबारा लिखा गया. सोचिए कि एक पाकिस्तानी राजदूत अमेरिकी राष्ट्रपति के पत्र के मसौदे को सही कराए!"

पाकिस्तानी राजनयिक ज़फ़र हिलाली कहते हैं कि निक्सन का शुक्रिया अदा करना काफ़ी नहीं माना जा सकता क्योंकि इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि इंदिरा (गांधी) पश्चिमी पाकिस्तान को जीतना चाहती थीं और निक्सन ने कहा था कि ऐसी किसी बात की इजाज़त नहीं दी जा सकती.

बहरहाल, यह बात इतिहास में हमेशा विवादास्पद रहेगी कि अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल करने के बाद पाकिस्तानी सेना के पूर्वी पाकिस्तान में कथित अपराधों को नज़रअंदाज़ कर उसे इनाम दिया या सोवियत संघ समर्थित भारत को पश्चिमी पाकिस्तान पर क़ब्ज़ा करने से रोक दिया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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