स्पेशल फ़ोर्सेज़, मरीन्स और एयरबोर्न सैनिकों का अमेरिका मध्य पूर्व में कैसे कर सकता है इस्तेमाल

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- Author, पावेल अक्सेनोव
- पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा के मिलिट्री ऑब्ज़र्वर
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट पहले से वहां मौजूद है, और 11वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट और 82वीं एयरबोर्न डिवीजन की इकाइयां भी वहां पहुंच रही हैं.
अमेरिका में बीबीसी के सहयोगी सीबीएस न्यूज़ के मुताबिक़, अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज़ नेवी सील्स और आर्मी रेंजर्स को भी इस इलाक़े में तैनात किया गया है.
पहले से तैनात सैनिकों के उलट इन यूनिट्स को ज़मीनी ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
अब तक अमेरिका और इसराइल ने ईरान की ज़मीन पर बड़े स्तर पर ज़मीनी कार्रवाई से परहेज़ किया है.
कुल मिलाकर कम से कम 8,000 सैनिक फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में पहुंचेंगे. हर मरीन ग्रुप में लगभग 2,500 सैनिक और 3,000 से 4,000 एयरबोर्न सैनिक होंगे.
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ये आंकड़े पूरी तरह सटीक नहीं हैं, क्योंकि इनमें सपोर्ट और सप्लाई यूनिट्स (जैसे एयरमैन) भी शामिल होते हैं. दूसरी ओर, इन सैनिकों को लाने वाले जहाज़ों के नाविक इसमें शामिल नहीं हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, इन बलों का इस्तेमाल तीन संभावित स्थितियों में हो सकता है- स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को खोलना, ख़ार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा करना और ईरान से समृद्ध यूरेनियम निकालना जिसका इस्तेमाल न्यूक्लियर हथियार बनाने में किया जा सकता है.
एक तरफ़ वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के उदाहरण के आधार पर कोई यह मान सकता है कि ज़मीनी अभियानों की तैयारी बहुत अच्छी हो सकती है, और उन्हें लगभग बिना किसी ग़लती के किया जा सकता है.
स्टैंडबाय फ़ोर्स की तैनाती इस इलाक़े में अमेरिकी मिलिट्री विकल्पों को बढ़ाने की ज़रूरत दिखाती है. इससे यह संकेत मिल सकता है कि लड़ाई शुरुआती प्लान से आगे बढ़ रही है.
नाकेबंदी
ईरान ने फ़रवरी के अंत में हवाई हमले शुरू होते ही होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकेबंदी शुरू कर दी थी.
यह करना उसके लिए मुश्किल नहीं है क्योंकि यह सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 50 किलोमीटर चौड़ा है. यहां एंटी-शिप मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं, समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाई जा सकती हैं और मानवरहित नावों से हमले किए जा सकते हैं.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) के मुताबिक़, 2024 में दुनिया के लगभग 20% लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस का व्यापार इसी रास्ते से होता था.
2025 की पहली छमाही में समुद्र के ज़रिए होने वाले कुल तेल व्यापार का क़रीब एक चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरा.
अभी हालात ये हैं कि बड़े तेल टैंकरों समेत व्यापारी जहाज़ यहां से गुज़र नहीं पा रहे हैं. सिर्फ़ ख़तरे की वजह से नहीं, बल्कि बड़ी बीमा कंपनियों ने भी जोखिम बहुत ज़्यादा मानकर बीमा महंगा और सख़्त कर दिया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से 6 अप्रैल तक रास्ता खोलने को कहा है और चेतावनी दी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमले और तेज़ किए जाएंगे.
अगर ईरान नहीं मानता है तो अमेरिका यहां तैनात सैनिकों का इस्तेमाल करके रास्ता खोल सकता है.
समुद्री क़िला

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यह नाकाबंदी कई द्वीपों के ज़रिए की जा रही है, जो कि इसके पश्चिमी एंट्रेंस और स्ट्रेट के पास मौजूद आइलैंड्स की एक चेन पर आधारित है.
ये अबू मूसा, ग्रेटर और लेसर टुंब के आइलैंड्स हैं - ये तीन आइलैंड्स स्ट्रेट के पश्चिमी हिस्से में मौजूद हैं, जो फ़ारस की खाड़ी से इसके एंट्रेंस को ब्लॉक करते हैं.
ये ईरान और यूएई के बीच इलाक़े के झगड़े का मुद्दा भी हैं.
इन द्वीपों पर हवाई पट्टी, एयर डिफ़ेंस सिस्टम और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं, जो ज़मीन और समुद्र दोनों पर हमला कर सकते हैं.
स्ट्रेट में मौजूद सबसे महत्वपूर्ण द्वीप क़ेशम है, जो फ़ारस की खाड़ी का सबसे बड़ा द्वीप है और ईरान के तट के साथ 100 कि.मी. से ज़्यादा फैला हुआ है. यह एक प्राकृतिक समुद्री क़िले के रूप में काम करता है जो स्ट्रेट को कंट्रोल करता है.
इसके अलावा लारक, होर्मुज़ और हेंगाम द्वीप भी हैं, जो इस रास्ते पर नज़र रखते हैं.
इन सभी जगहों पर निगरानी सिस्टम, मिसाइल ठिकाने और ड्रोन बोट्स मौजूद हैं जिनमें अंडरग्राउंड मिसाइल बंकर भी शामिल हैं.
इसलिए, ज़बरदस्ती स्ट्रेट को खोलने के लिए कम से कम इन सभी आइलैंड पर क़ब्ज़ा करना ज़रूरी होगा.
लेकिन अगर ईरान ने स्ट्रेट की नाकेबंदी को एक डिफेंसिव स्ट्रैटेजी के तौर पर देखा होगा, तो इस बात की बहुत ज़्यादा संभावना है कि वह इन आइलैंड को डिफेंस के लिए तैयार कर चुका होगा.
मुख्य तेल टर्मिनल
दूसरा संभावित लक्ष्य ख़ार्ग द्वीप हो सकता है. ईरान के 90% तेल का निर्यात इसी द्वीप से होता है, जो कि जो सत्तारूढ़ शासन के लिए आय का मुख्य स्रोत है.
अगर तेहरान को इस टर्मिनल से दूर कर दिया जाए, तो उसकी तेल से होने वाली आय कम हो जाएगी और उसके महंगे सैन्य कार्यक्रमों, खासतौर पर मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को फ़ंड करने की क्षमता घट जाएगी.
लेकिन इस तरह की कार्रवाई से खाड़ी के महत्वपूर्ण ठिकानों पर जवाबी हमले हो सकते हैं और माना जाता है कि ईरान अब तक ऐसे कई आर्थिक रूप से अहम ठिकानों पर हमला करने से बचता रहा है.
इसके अलावा अगर ख़ार्ग द्वीप का इन्फ़्रास्ट्रक्चर नष्ट हो जाता है तो भविष्य में किसी अमेरिका समर्थक सरकार के लिए इसे दोबारा विकसित करना मुश्किल हो सकता है.
इसलिए अमेरिकी सेना द्वारा ख़ार्ग पर क़ब्ज़ा करना ज़्यादा तर्कसंगत लगता है. इससे तेहरान को तेल निर्यात से रोका जा सकेगा और भविष्य में इसे फिर से चालू भी किया जा सकेगा.
अमेरिका पहले ही इस द्वीप पर कई हमले कर चुका है, लेकिन माना जाता है कि उनका निशाना सिर्फ सैन्य ठिकाने थे.
इनमें एयरफील्ड भी शामिल है जिस पर क़ब्ज़ा करना किसी भी समुद्री हमले की स्थिति में अहम लक्ष्य होगा, क्योंकि इसे दोबारा चालू करने के बाद यहां से और सैनिक लाए जा सकते हैं.

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द्वीप
बड़े तट के पास छोटे द्वीपों पर क़ब्ज़ा करना आमतौर पर तभी मायने रखता है जब उसके बाद मुख्य ज़मीन पर उतरने की योजना हो.
ये द्वीप डूब न सकने वाले जहाज़ों की तरह काम करते हैं, जो तट की रक्षा करते हैं और हवाई सुरक्षा व समर्थन देते हैं, इसलिए बड़े हमले से पहले इन पर क़ब्ज़ा करना एक सामान्य रणनीति है.
हालांकि, अगर आगे कोई कार्रवाई नहीं होती, तो इन द्वीपों पर मौजूद सैनिक मुख्य भूमि से होने वाली गोलाबारी के आसान निशाने बन सकते हैं. छोटा द्वीप जहाज़ की तरह अपनी जगह नहीं बदल सकता.
और अगर वह तोपखाने की ज़द में है, तो ख़तरा और बढ़ जाता है क्योंकि तोप के गोलों को मिसाइलों की तुलना में रोकना ज़्यादा मुश्किल होता है.
इसलिए, द्वीपों पर उतरने का मतलब होता है कि आगे मुख्य भूमि पर भी कोई कार्रवाई की योजना हो.
लेकिन अमेरिका के पास इसके लिए पर्याप्त सैनिक नहीं दिखते.
यूरेनियम पर क़ब्ज़ा
इन बलों का इस्तेमाल ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार को निकालने के लिए भी किया जा सकता है, जो इस्फ़हान और नतांज़ में मौजूद हैं.
पिछली गर्मियों में 12 दिन के युद्ध के दौरान इन ठिकानों पर हमले हुए थे.
पहले इसराइल के चैनल 12 ने रिपोर्ट किया था कि प्रतिबंध हटाने के बदले अमेरिका तेहरान से मांग कर रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म करे, जिसमें नतांज़, इस्फ़हान और फ़ोर्दो जैसे तीन प्रमुख ठिकानों को नष्ट करना और समृद्ध यूरेनियम को आईएईए को सौंपना शामिल है.
द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया कि डोनाल्ड ट्रंप इस यूरेनियम को हटाने के लिए सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं, और इस तरह के जटिल ऑपरेशन के लिए सैनिकों की कई दिनों या उससे ज़्यादा समय तक मौजूदगी ज़रूरी हो सकती है.
अख़बार के मुताबिक़, जून के ऑपरेशन से पहले माना जाता था कि ईरान के पास 60% तक समृद्ध 400 किलोग्राम से ज़्यादा यूरेनियम और लगभग 200 किलोग्राम 20% स्तर का यूरेनियम था, जिसे आसानी से 90% स्तर तक ले जाकर हथियार बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है.
हालांकि सूत्रों के आधार पर यह कहना पूरी तरह मुश्किल है कि यह यूरेनियम कहां है और किस स्थिति में है.
इसराइली सैन्य विशेषज्ञ डेविड जेंडेलमेन ने पहले लिखा था कि यह एक जटिल और बड़े पैमाने का ऑपरेशन होगा, "अगर ईरानी इन ठिकानों की अच्छी तरह सुरक्षा कर रहे हैं और इलाक़े पर उनका नियंत्रण मज़बूत है, तो इसके लिए एयर डिफेंस को पूरी तरह ख़त्म करना, एक अस्थायी एयरफील्ड बनाना, लगातार हवाई सुरक्षा देना, अपनी एयर डिफेंस और ज़मीनी सुरक्षा रखना, इंजीनियरिंग उपकरण लाना और स्पेशल फोर्स को अंदर भेजना होगा."
साथ ही विशेषज्ञ के अनुसार, यह सामग्री लोगों के लिए रेडिएशन के लिहाज़ से ज़्यादा ख़तरनाक नहीं होती, क्योंकि यूरेनियम शुद्ध रूप में नहीं बल्कि एक यौगिक हेक्साफ्लोराइड के रूप में रखा जाता है.
डेविड जेडेंलमेन ने लिखा, "यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड बहुत ज़हरीला और रासायनिक रूप से सक्रिय होता है, इसलिए इसके लिए सुरक्षा उपकरण और सावधानी ज़रूरी होती है, लेकिन इसमें रेडिएशन का ख़तरा लगभग नहीं होता, यहां तक कि समृद्ध यूरेनियम भी बहुत कम रेडियोएक्टिव होता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































