ईरान जंग में चीन सुलह कराने की कोशिश में, क्या मिलेगी कामयाबी

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- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, चीन संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
मध्य पूर्व में जारी जंग दूसरे महीने में प्रवेश करने जा रही है और इसने दुनिया की ईंधन सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित कर रखा है जिससे तेल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं.
इन हालात में चीन शांति स्थापित करने वाले देश के रूप में आगे आने की कोशिश कर रहा है.
यह तब हो रहा है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई 'दो से तीन हफ़्तों' में समाप्त हो सकती है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे होगा या इसके बाद क्या होगा.
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल युद्ध में पाकिस्तान एक अप्रत्याशित मध्यस्थ के रूप में उभरा है और चीन अब उसके साथ हाथ मिला रहा है.
चीन और पाकिस्तान के अधिकारियों ने संघर्षविराम कराने और अहम होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने के मक़सद से पांच बिंदुओं की योजना पेश की है.
पाकिस्तान पहले अमेरिका का सहयोगी रहा है और लगता है कि उसने इस संघर्ष में मध्यस्थता के लिए ट्रंप का समर्थन हासिल कर लिया है.
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अगले महीने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप के बीच होने वाली व्यापार वार्ता से पहले चीन का इस वार्ता में दिलचस्पी लेना अहम माना जा रहा है.
लानझोउ यूनिवर्सिटी में अफ़ग़ानिस्तान अध्ययन केंद्र के निदेशक और मध्य पूर्व के विशेषज्ञ झू योंगबियाओ कहते हैं कि इस मामले में चीन का समर्थन 'बहुत महत्वपूर्ण' है.
उनके अनुसार, "चीन नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से व्यापक समर्थन दे रहा है, इस उम्मीद के साथ कि पाकिस्तान एक अधिक विशिष्ट भूमिका निभा सके."
यह चीन के लिए एक बदलाव भी है, जिसकी इस युद्ध पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक काफ़ी सीमित रही है. तो अब चीन हस्तक्षेप क्यों कर रहा है?
चीन अब क्यों आगे आ रहा है?

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पाकिस्तान के विदेश मंत्री इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए बातचीत के प्रयासों में चीन का समर्थन मांगने बीजिंग पहुंचे, इसके बाद यह शांति योजना तब तैयार की गई.
उनकी कोशिशें सफल होती दिख रही हैं. चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों 'शांति के लिए नए प्रयास' कर रहे हैं. संयुक्त बयान में सहमति जताई गई कि संवाद और कूटनीति 'संघर्षों को हल करने का एकमात्र व्यवहारिक विकल्प' हैं और इसमें बंद पड़े जलमार्गों सहित समुद्री रास्तों की सुरक्षा की अपील की गई.
यह केवल तेल का मामला नहीं है, हालांकि यह चिंता का विषय रहेगा. चीन, जो दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है, उसके पास अगले कुछ महीनों तक के लिए पर्याप्त भंडार है.
संभव है कि बीजिंग ने शांति स्थापित करने की भूमिका इसलिए चुनी हो क्योंकि ईरान में जंग उस चीज़ को ख़तरे में डालता है जिसे शी जिनपिंग महत्व देते हैं, यानी स्थिरता. चीन को एक स्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था की ज़रूरत है क्योंकि वह अपनी कमज़ोर घरेलू अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए दुनिया भर में सामान बेचने पर काफ़ी निर्भर है.
फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेन्स ऑफ़ डेमोक्रेसीज़ के चीन कार्यक्रम के अध्यक्ष मैट पॉटिंगर कहते हैं, "अगर ऊर्जा झटके के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ने लगती है, तो यह चीन के कारखानों और निर्यातकों के लिए मुश्किल होगा."
"इसीलिए जब मैं इस हफ़्ते ही चीन के विदेश मंत्री को ईरान को यह सलाह देते देखता हूं कि हमें इस जंग को समाप्त करने का रास्ता खोजना चाहिए, तो मुझे लगता है कि इसमें कुछ सच्चाई है. मुझे लगता है कि बीजिंग थोड़ा चिंतित है कि अगर यह लंबे समय तक चलने वाले वास्तविक ऊर्जा संकट में बदल गया तो इसके परिणाम क्या हो सकते हैं."
पहले से ही आशंका जताई जा रही है कि चीन का औद्योगिक क्षेत्र दुनिया की फ़ैक्ट्री के रूप में काम करता है, इस संकट के जारी रहने पर लंबे समय में प्रभावित हो सकता है.
मध्य पूर्व में चीन के हित

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तेल के लिए अधिक क़ीमत चुकाने का असर पूरे सप्लाई चेन पर पड़ता है, खिलौने और गेम बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक से लेकर आधुनिक सिंथेटिक कपड़ों के कच्चे माल तक और उन सैकड़ों कंपोनेंट्स तक जो फ़ोन, इलेक्ट्रिक कार और सेमीकंडक्टर बनाने में लगते हैं.
डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध ने देश भर के कई व्यापारियों को दुनिया भर में नए बाज़ार तलाशने के लिए मजबूर किया था.
नतीजतन पिछले साल मध्य पूर्व को चीन का निर्यात दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ा. यह क्षेत्र इलेक्ट्रिक कारों के लिए सबसे तेज़ी से बढ़ता बाज़ार बन गया है और चीन मध्य पूर्व में डीसैलिनेशन (पानी शुद्ध करने के प्लांट) में भी सबसे बड़ा निवेशक है, जहां पीने लायक पानी की कमी है.
पावर कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन ऑफ़ चाइना के प्रोजेक्ट्स सऊदी अरब, अमीरात, ओमान और इराक में हैं.
अपने आर्थिक संबंधों के चलते, चीन ने इस क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों, जैसे सऊदी अरब और विरोधियों, जैसे ईरान, दोनों के साथ रिश्ते बनाए हुए है.
तेहरान और बीजिंग के बीच दशकों पुरानी साझेदारी है. चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और वह ईरानी तेल का लगभग 80% खरीदता है.
चीनी सरकार पहले भी मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने वाले की भूमिका निभा चुकी है, हालांकि सीमित सफलता के साथ.
मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने में चीन की भूमिका

साल 2023 में उसने कट्टर विरोधियों सऊदी अरब और ईरान के बीच एक समझौता कराया, जो लंबे समय से मध्य पूर्व में प्रॉक्सी युद्धों में एक-दूसरे के विरोध में खड़े रहे हैं.
साल 2016 में दोनों के रिश्ते तब टूट गए थे जब सऊदी अरब ने एक प्रमुख शिया मुस्लिम विद्वान को फांसी दी, जिसके बाद ईरान में विरोध प्रदर्शन हुए और भीड़ ने तेहरान स्थित उसके दूतावास पर हमला किया.
जब चीन ने मध्यस्थ की भूमिका संभाली, तो दोनों पक्ष राजनयिक संबंध फिर से स्थापित करने पर सहमत हो गए. यह चीन के हित में था. बीजिंग को उम्मीद रही होगी कि सऊदी अरब और ईरान के बीच बेहतर कूटनीतिक संबंध क्षेत्रीय तनाव को कम करेंगे.
एक साल बाद, चीन ने 14 फ़लस्तीनी गुटों के नेताओं की मेज़बानी की, जिनमें फ़तह और हमास शामिल थे. इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक और ग़ज़ा के लिए एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनी.
यह घोषणा एक व्यापक समझौते से अधिक एक मंशा का संकेत थी, लेकिन एक बार फिर इसने दिखाया कि चीन इस क्षेत्र में क्या भूमिका निभा सकता है और मध्य पूर्व में स्थिरता में उसकी रुचि क्या है.
दुनिया भर में चीन की साझेदारियों के साथ कोई सुरक्षा गारंटी या सैन्य समर्थन नहीं जुड़ा होता.
बीजिंग के लिए उसकी अर्थव्यवस्था सबसे पहले आती है और यही क्षेत्र के देशों के साथ उसकी आर्थिक परस्पर निर्भरता उसे प्रभाव देती है और कुछ हद तक उसका असर दिखाने में मदद करती है.
संघर्ष से खुद को दूर रखने की रणनीति

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झू योंगबियाओ कहते हैं, "चीन व्यापक संघर्षों में खींचे जाने को लेकर सतर्क है. घरेलू और विदेश नीति दोनों में ही उसकी प्राथमिकता आर्थिक विकास रहा है. देश में एक व्यापक सहमति है कि चीन को लापरवाही से किसी युद्ध में नहीं पड़ना चाहिए."
लेकिन इस नज़रिये की अपनी सीमाएं हैं. चीन के पास इस क्षेत्र में ऐसी सैन्य क्षमता नहीं है कि वह चाहकर भी सीधे हस्तक्षेप कर सके.
अमेरिका के हर खाड़ी देश में सैन्य अड्डे हैं. चीन का सबसे नजदीकी अड्डा पूर्वी अफ़्रीका के जिबूती में है, जिसे साल 2017 में स्थापित किया गया था. यह ताक़त दिखाने के बजाय समुद्री डकैती विरोधी अभियानों के लिए एक लॉजिस्टिक केंद्र अधिक है.
जून 2025 में इसराइल-ईरान युद्ध के दौरान, चीन किनारे रहा और बहुत सीमित समर्थन दिया, जिससे एक साझेदार के रूप में उसकी भूमिका की सीमाएं उजागर हुईं.
जहां तक इस नई शांति योजना की बात है, अमेरिका और ईरान दोनों ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन इस पहल को आगे बढ़ाकर शी जिनपिंग खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ और शांति स्थापित करने वाले के रूप में पेश कर सकते हैं और एक बार फिर दुनिया की दूसरी बड़ी महाशक्ति यानी अमेरिका के राष्ट्रपति से अलग दिख सकते हैं.
चीन की एक व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में खुद को पेश करने की विश्वसनीयता कई शर्तों के साथ आती है. रूस के साथ उसकी नजदीकी ने उसकी तटस्थता पर लगातार सवाल खड़े किए हैं.
हांगकांग पर उसका बढ़ता नियंत्रण और ज़रूरत पड़ने पर स्व-शासित ताइवान को बलपूर्वक अपने नियंत्रण में लेने की उसकी बार-बार दी गई धमकियां अभी भी बड़ी चिंताएं हैं.
चीन के सत्तावादी नेता मानवाधिकारों पर किसी भी चर्चा से बचते हैं और अधिकारों के उल्लंघन या सत्ता के दुरुपयोग के लिए किसी शासन की आलोचना नहीं करते. यह सब राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दुनिया की नियम-आधारित व्यवस्था का चेहरा बनने के लिए एक बहुत अनुकूल नहीं है.
लेकिन चीन एक शक्तिशाली वैश्विक खिलाड़ी है जिसके अपने रणनीतिक हित हैं. उसने दिखाया है कि मध्य पूर्व में उसका कुछ प्रभाव है और भविष्य में अपना प्रभाव बढ़ाने की उसकी महत्वाकांक्षा भी साफ़ है.
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