मालेगांव धमाका मामले के अभियुक्तों को डिस्चार्ज किए जाने की वजह क्या रही?

मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को इसी जगह पर ब्लास्ट हुए थे (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को इसी जगह पर ब्लास्ट हुए थे (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

बुधवार, 23 अप्रैल को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मालेगांव धमाकों के मामले में अभियुक्त चार लोगों को डिस्चार्ज कर दिया. इन धमाकों में 31 लोगों की मौत हुई थी और 300 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.

अदालत ने कहा कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए भी पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

अदालत ने कहा कि धमाके की जांच करने वाली दो एजेंसियों, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और एंटी टेररिज़्म स्क्वॉड, ने "एक-दूसरे से बिल्कुल उलटी कहानियां" पेश कीं.

अदालत ने कहा कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामले में "विरोधाभास" हैं.

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डिस्चार्ज आरोपपत्र दाख़िल होने के बाद की प्रक्रिया है. अदालत आरोपपत्र देखती है और यह तय करती है कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं या नहीं.

अगर अदालत को पहली नज़र में पर्याप्त सबूत नहीं मिलते, तो वह अभियुक्त को डिस्चार्ज कर देती है. इस तरह क़रीब 20 साल बाद, तीन एजेंसियों की जांच वाला यह बम धमाका मामला ढह गया है. इसके साथ ही इस मामले में अब कोई भी अभियुक्त मुक़दमे का सामना नहीं कर रहा है.

एंटी टेररिज़्म स्क्वॉड (एटीएस) और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने आरोप लगाया था कि यह अपराध नौ मुस्लिम पुरुषों ने किया, वहीं नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने बिल्कुल अलग रुख़ अपनाते हुए चार हिंदू पुरुषों पर धमाके करने का आरोप लगाया.

धमाकों वाले दिन क्या हुआ था

8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में चार धमाके हुए थे, यह दिन शब-ए-बरात का था (फ़ाइल फ़ोटो)

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8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में चार धमाके हुए थे. यह दिन शब-ए-बरात का था, जो रमज़ान से दो हफ़्ते पहले आने वाला इस्लाम धर्म का एक पवित्र दिन है.

महाराष्ट्र के एंटी टेररिज़्म स्क्वॉड (एटीएस) ने अक्तूबर 2006 में जांच शुरू की. उसने नौ मुस्लिम पुरुषों को गिरफ़्तार किया और उन पर भारतीय दंड संहिता, गैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) क़ानून और दूसरे क़ानूनों के तहत हत्या और आतंकवाद समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया.

एटीएस का कहना था कि ये लोग अब प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) के सदस्य थे और सरकार गिराने के लिए विद्रोह को बढ़ावा देना चाहते थे. एजेंसी ने आरोप लगाया था कि अभियुक्तों में से दो पाकिस्तान गए थे ताकि आतंक गतिविधियों की ट्रेनिंग ले सकें.

एटीएस ने कहा था कि ये लोग मुस्लिम बहुल इलाक़े में बम धमाका करना चाहते थे ताकि "मुसलमानों को भड़काकर दंगे कराए जा सकें". एजेंसी ने यह भी कहा था कि दो अभियुक्तों ने बम बनाने के लिए 20 किलो आरडीएक्स हासिल किया था और धमाके के लिए हिंदू दुकानदारों से साइकिलें खरीदी थीं. फ़रवरी 2007 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने भी मामले की जांच शुरू की और पूरक आरोपपत्र दाख़िल किए.

मामले में मोड़

बॉम्बे हाई कोर्ट

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इसके बाद मामले में चौंकाने वाला मोड़ आया.

साल 2010 में, जब सीबीआई 2007 के हैदराबाद धमाका मामले की जांच कर रही थी, तब नबा कुमार सरकार, जिन्हें स्वामी असीमानंद भी कहा जाता है, ने बयान दिया कि मालेगांव धमाका हिंदुओं ने किया था. बाद में उन्होंने कहा कि यह बयान दबाव में दिया गया था.

इस बीच, केंद्र सरकार ने अप्रैल 2011 में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को आगे की जांच करने को कहा.

दो साल बाद एनआईए ने आरोपपत्र दाख़िल किया और मामले में चार हिंदू पुरुषों को अभियुक्त बनाकर गिरफ़्तार किया.

एनआईए के आरोपपत्र के मुताबिक असीमानंद ने बताया था कि अभियुक्तों में से एक ने उनसे कहा था कि मालेगांव बम धमाके "उसके लड़कों का काम" थे. एनआईए के पेश बयान के मुताबिक़, मालेगांव को "उपयुक्त जगह" चुना गया क्योंकि वहां "86 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी" थी.

एनआईए ने यह भी कहा कि एटीएस ने जिन मुस्लिम पुरुषों को अभियुक्त बताया था, उनके इक़बालिया बयान "दबाव में" लिए गए थे और अब वे अपने बयान वापस ले रहे हैं.

एनआईए के आरोपपत्र को देखते हुए 2016 में महाराष्ट्र की एक सत्र अदालत ने नौ मुस्लिम पुरुषों को यह कहते हुए डिस्चार्ज कर दिया कि उन्हें "सिर्फ़ शक़ के आधार पर" अभियुक्त बनाया गया था. दिलचस्प बात यह रही कि एटीएस ने इन नौ मुस्लिम पुरुषों को डिस्चार्ज किए जाने का विरोध किया, जबकि एनआईए ने उनका समर्थन किया.

एटीएस ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की, जो अब भी लंबित है.

इस बीच, महाराष्ट्र की एक अदालत ने सितंबर 2025 में चार हिंदू पुरुषों पर आरोप तय किए. उन्होंने इस आदेश को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में डिस्चार्ज किए जाने की मांग की. इसी अपील पर इस साल 22 अप्रैल को फ़ैसला सुनाया गया.

एनआईए की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि आरोप तय करने का आदेश "ठोस तर्कों पर आधारित" था और हाई कोर्ट को उसमें दख़ल नहीं देना चाहिए.

हालांकि अभियुक्तों की ओर से पेश वकील ने कहा कि एनआईए के पेश सबूत "क़ानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं" हैं और मुक़दमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. वकील ने कहा कि एनआईए "आगे की जांच" के नाम पर पूरी तरह "नई और ताज़ा जांच" नहीं कर सकती.

जांच में देरी

गौरव भाटिया

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इमेज कैप्शन, बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि मालेगांव ब्लास्ट यूपीए सरकार के दौर में हुआ था और कांग्रेस ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए 'भगवा आतंकवाद' शब्द गढ़ दिया

अदालत ने माना कि चारों लोगों के ख़िलाफ़ दाख़िल सबूत स्वीकार्य नहीं थे. अदालत ने कहा कि एनआईए का मामला पूरी तरह "परिस्थितिजन्य साक्ष्य" पर आधारित था. इसमें मुख्य रूप से अभियुक्तों और असीमानंद के इक़बालिया बयान के अलावा एटीएस और सीबीआई की ओर से पहले गिरफ़्तार अभियुक्तों से लिए गए बयान शामिल थे.

अदालत ने कहा कि एनआईए की ओर से मुक़दमे में हुई देरी ने सबूतों की मज़बूती को प्रभावित किया.

भारतीय क़ानून के तहत पुलिस हिरासत में किसी अभियुक्त का बयान तभी भरोसेमंद माना जा सकता है जब उससे कोई नया सबूत बरामद हो. एनआईए का कहना था कि चार अभियुक्तों के बयानों से उन्हें उन जगहों तक पहुंच मिली "जहां बम धमाकों की योजना और तैयारी हुई थी".

अदालत ने कहा कि इस मामले में अभियुक्तों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि बरामदगी धमाके के छह साल बाद हुई. साथ ही बरामदगी किसी निजी जगह से नहीं, बल्कि ऐसी जगह से हुई जो आम लोगों की पहुंच में थी.

इसके अलावा एनआईए ने कहा कि अभियुक्तों की पहचान के लिए 'टेस्ट आइडेंटिफ़िकेशन परेड' कराई गई थी.

टेस्ट आइडेंटिफ़िकेशन परेड अभियुक्त की पहचान पक्की करने की प्रक्रिया है, जिसमें वह गवाह जो दावा करता है कि उसने अभियुक्त को देखा था, उसे कई लोगों के बीच अभियुक्त को पहचानना होता है. इस पंक्ति में कई ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो अभियुक्त नहीं होते.

अदालत ने कहा कि यह परेड एनआईए ने काफ़ी देरी से कराई. अदालत ने कहा कि घटना के "छह साल बाद कराई गई परेड का कोई प्रमाणिक महत्व नहीं होगा". अदालत ने यह भी कहा कि अपने आप में टेस्ट आइडेंटिफ़िकेशन परेड कोई ठोस साक्ष्य नहीं हो सकती.

असीमानंद की गवाही

असीमानंद

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इमेज कैप्शन, अदालत ने असीमानंद की गवाही को स्वीकार नहीं किया.

अदालत ने यह भी कहा कि वह असीमानंद की गवाही पर भरोसा नहीं कर सकती.

अदालत ने कहा कि उनके बयान को अजमेर और हैदराबाद की निचली अदालतों ने अपनी मर्ज़ी से दिया गया बयान नहीं माना था. मालेगांव धमाका मामले में एनआईए के आरोपपत्र में उन्हें गवाह के तौर पर भी लिस्ट नहीं किया गया था.

अदालत ने यह भी कहा कि "कोई व्यक्ति एनआईए के सामने यह कहने नहीं आया कि उसने अपील करने वालों में से किसी को बम धमाकों में शामिल देखा है."

जांच में विरोधाभास

 पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर
इमेज कैप्शन, 2008 के मालेगांव बम धमाका मामले में सभी सात अभियुक्त डिस्चार्ज कर दिए गए थे, जिनमें पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी शामिल थीं (फ़ाइल फ़ोटो

अदालत ने एनआईए और एटीएस की ओर से पेश मामलों में कई विरोधाभासों की ओर भी इशारा किया.

अदालत ने अपने आदेश में कहा, "एनआईए ने बिल्कुल नई कहानी पेश की कि अपील करने वालों और दूसरे अभियुक्तों ने लोगों के मन में दहशत फैलाने के इरादे से आतंकवादी कृत्य करने की आपराधिक साज़िश रची."

हालांकि अदालत ने कहा, "ध्यान रखने वाली अहम बात यह है कि एनआईए ने अभियोजन की कहानी मुख्य रूप से अपीलकर्ताओं के इक़बालिया बयानों और घटनास्थल से जुड़ी बरामदगी वाले बयानों पर बनाई."

एनआईए का कहना था कि अभियुक्तों ने उन जगहों की पहचान कराई जहां वे मालेगांव में बस से उतरे थे और जहां बम लगाए गए थे. उन्होंने उस ट्रेनिंग कैंप की जगह भी बताई जहां उन्हें बम जोड़ने का तरीका बताया गया था.

अदालत ने कहा कि एटीएस का कहना था कि एक मुस्लिम पुरुष ने बम लगाया था. जबकि एनआईए ने कहा कि धमाके वाले दिन वही व्यक्ति घटनास्थल से 400 किलोमीटर दूर था.

एटीएस का दावा था कि एक मुस्लिम पुरुष ने धमाके के लिए साइकिलें खरीदी थीं, जबकि एनआईए ने कहा कि यह काम अभियुक्त हिंदुओं में से एक ने किया था. अदालत के मुताबिक़, एनआईए की ओर से पेश ये तथ्य "सुनी-सुनाई गवाही" पर आधारित थे.

अदालत ने यह भी कहा कि एटीएस की ओर से दाख़िल कई दूसरे सबूत, जैसे फ़ॉरेंसिक रिकॉर्ड, एनआईए ने "पूरी तरह नज़रअंदाज़" कर दिए.

अदालत ने कहा, "मामला अब बंद गली में पहुंचता दिखता है."

अदालत ने आगे कहा, "एटीएस और एनआईए के आरोपपत्रों में पेश बिल्कुल उलटी कहानियां कहीं नहीं ले जातीं."

बॉम्बे हाई कोर्ट से डिस्चार्ज किए गए चारों अभियुक्त 2019 से ज़मानत पर बाहर थे.

इस मामले में अब सिर्फ़ एक मुक़दमा लंबित है, जो 2016 में डिस्चार्ज किए गए नौ मुस्लिम पुरुषों के ख़िलाफ़ एटीएस की अपील है.

पिछले कुछ वर्षों में कई बम धमाका मामलों में अभियुक्त अदालतों से डिस्चार्ज हुए हैं. पिछले साल जुलाई में 2008 के मालेगांव बम धमाका मामले में सभी सात अभियुक्त डिस्चार्ज कर दिए गए थे.

इनमें भारत की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेना अधिकारी श्रीकांत प्रसाद पुरोहित शामिल थे.

उसी महीने बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7/11 धमाका मामले में अभियुक्त सभी 12 पुरुषों को भी डिस्चार्ज कर दिया था. इस मामले में 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में कई बम धमाके हुए थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.