क्या ट्रंप ईरान युद्ध से निकलने की कोशिश में और उलझ गए हैं?

    • Author, गैरी ओडोन्यहू
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह साढ़े छह बजे व्हाइट हाउस में ईरान जंग पर भाषण दिया.

लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संबोधन ज्यादातर वही बातें दोहराने जैसा था, जो वह पिछले कई दिनों से ईरान युद्ध को लेकर कह रहे थे.

20 मिनट के इस प्राइमटाइम भाषण में उन्होंने कहा कि अमेरिका-इसराइल सैन्य अभियान "मुख्य रणनीतिक मक़सदों" को लगभग पूरा करने के करीब है. उन्होंने अनुमान जताया कि यह युद्ध अभी दो से तीन हफ्ते और चल सकता है.

इस दौरान ईरान के ख़िलाफ़ सामान्य चेतावनियां भी दोहराई गईं, जिसमें ईरान को "पाषाण युग में वापस पहुंचाने" की बात फिर से कही गई.

अगर आप पिछले एक हफ्ते में ट्रंप के ट्रुथ सोशल पर किए गए पोस्ट को कॉपी-पेस्ट करें, तो वह इस राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से काफी मिलता-जुलता होगा.

राष्ट्रपति ने इस युद्ध के फ़ायदे अमेरिकी जनता को समझाने की भी कोशिश की. इसकी वजह भी है, क्योंकि सर्वे बताते हैं कि 28 फ़रवरी को शुरू किए गए इस सैन्य अभियान को लेकर ज्यादातर मतदाता असहमति जता रहे हैं.

ट्रंप ने अमेरिकी लोगों से इस युद्ध को अपने भविष्य में एक "निवेश" के रूप में देखने की अपील की और कहा कि यह पिछले एक सदी या उससे अधिक समय में हुए अन्य संघर्षों की तुलना में कुछ भी नहीं है, जिनमें अमेरिका कहीं अधिक लंबे समय तक शामिल रहा है.

लेकिन इस भाषण में उन लोगों के लिए बहुत कम या कुछ ख़ास नहीं था जो यह जानना चाहते थे कि यह युद्ध किस दिशा में जा रहा है या अमेरिका के लिए इससे बाहर निकलने के संभावित रास्ते क्या हो सकते हैं. इसमें कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाए.

सवाल जिनके नहीं मिले जवाब

पहला, इसराइल अभी भी ईरान पर हमले कर रहा है. साथ ही इसराइल को ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना भी करना पड़ रहा है- जिसमें बुधवार को तेल अवीव के पास कुछ हमले भी शामिल हैं.

एक अहम सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार ट्रंप के बताए गए कुछ हफ्तों की समय-सीमा से सहमत है. फिलहाल इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. कम से कम मौजूदा हालात में तो इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

दूसरा, उस 15-सूत्रीय शांति योजना का क्या हुआ, जिसे व्हाइट हाउस कुछ दिन पहले ईरान से स्वीकार करने के लिए कह रहा था? अपने संबोधन में ट्रंप ने इसका कोई जिक्र नहीं किया. क्या अब अमेरिका अपनी कई मांगों से पीछे हट रहा है, जिनमें समृद्ध यूरेनियम के भंडार को वापस लेने की मांग भी शामिल थी? इस बारे में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है.

होर्मुज़ को लेकर रुख़ साफ़ नहीं

अब दुनिया के सबसे व्यस्त तेल शिपिंग मार्गों में से एक, होर्मुज़ स्ट्रेट इस संघर्ष का फ़ोकस बन गया है.

ईरान ने इस तेल मार्ग को बंद कर रखा है.

हालांकि, राष्ट्रपति का इस पर कोई ठोस और तय रुख नज़र नहीं आता.

कभी वो ईरान से टैंकरों को रास्ता देने की मांग करते हैं, और अगले ही पल सहयोगी देशों से कहते हैं कि वे खुद जाकर इसे संभालें.

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बुधवार को उन्होंने कहा, "होर्मुज़ पर जाओ और बस उसे अपने नियंत्रण में ले लो, उसकी सुरक्षा करो, और अपने इस्तेमाल के लिए उसे खोलो. मुश्किल हिस्सा पूरा हो चुका है, इसलिए यह आसान होना चाहिए."

उन्होंने ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे अपने सहयोगियों को होर्मुज़ ख़ुद जाकर तेल हासिल करने की नसीहत दी.

इसके बाद उन्होंने बिना ज्यादा विस्तार से बताए सिर्फ इतना कहा कि युद्ध खत्म होने पर होर्मुज़ "स्वाभाविक रूप से" फिर से खुल जाएगा. तेल की क़ीमतों को लेकर चिंतित लोगों के लिए यह बात शायद ज्यादा भरोसा देने वाली नहीं होगी.

ट्रंप की कुछ सहयोगी देशों पर की गई तीखी टिप्पणी उस इंटरव्यू के बाद आई, जिसमें उन्होंने बुधवार को पहले नेटो सैन्य गठबंधन से बाहर निकलने का विचार भी सामने रखा था.

लेकिन व्हाइट हाउस में दिए गए ताज़ा भाषण में उनका वो तेवर पूरी तरह गायब था, जबकि ब्रीफिंग्स में संकेत दिए गए थे कि यह उनके संबोधन का एक अहम हिस्सा होगा.

एक और बड़ा अनसुलझा सवाल मैदान में सैनिकों की मौजूदगी को लेकर है. क्षेत्र में लगातार पहुंच रहे हज़ारों मरीन और पैराट्रूपर्स आखिर वहाँ क्या करने वाले हैं?

ट्रंप के लिए इस युद्ध में जीत के क्या मायने हैं, ये बात इस भाषण के बाद अब और ज़्यादा उलझ गई है.

उनके बयान हर अगले दिन बदल रहे हैं जिससे ये असमंजस और बढ़ गया है.

इस बीच अमेरिका में गैस की औसत कीमत लगभग चार साल में पहली बार 4 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर चली गई है, और कांग्रेस पर नियंत्रण तय करने वाले अहम मिडटर्म चुनावों से सिर्फ कुछ महीने पहले राष्ट्रपति की लोकप्रियता रेटिंग तेज़ी से गिर रही है.

ऐसा लग रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस युद्ध से निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं और फिलहाल वह अब भी उसी रास्ते की खोज में भटक रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.