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ईरान खाड़ी के बाक़ी देशों की तुलना में ओमान को लेकर नरम क्यों?
- Author, ओमनेया एल नग्गर
- पदनाम, मध्य-पूर्व मामलों की जानकार, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
बुधवार को दक्षिण अफ़्रीका स्थित ईरानी दूतावास ने एक्स पर पोस्ट किया, "सिर्फ़ ईरान और ओमान होर्मुज़ स्ट्रेट का भविष्य तय करेंगे."
भारत स्थित ईरानी दूतावास ने इसे शेयर करते हुए लिखा, "हमारे भारतीय दोस्त सुरक्षित हाथों में हैं. चिंता मत करिए."
खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के अधिकतर सदस्य देशों का रुख अमेरिका-इसराइल के ईरान पर युद्ध के बाद ईरान के प्रति और सख़्त हो गया है, लेकिन ओमान इस मामले में अपवाद बनकर उभरा है.
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले इस देश ने युद्ध के बीच भी अपनी तटस्थता बनाए रखी है.
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जहां जीसीसी के अन्य सदस्य देशों ने ईरान के खिलाफ आक्रामक और धमकी भरा रुख़ अपनाया, वहीं ओमान अपनी "सबका दोस्त, किसी का दुश्मन नहीं" वाली विदेश नीति पर कायम रहा.
इसी रुख़ की वजह से ओमान अमेरिका-इसराइल अभियान की आलोचना करने वाला जीसीसी का सबसे मुखर देश बन गया. उसने इसे 'गैरक़ानूनी युद्ध' बताया और कहा कि इसे तुरंत खत्म होना चाहिए.
ओमान जीसीसी का इकलौता देश भी रहा जिसने साफ तौर पर कहा कि वह इस युद्ध में शामिल नहीं होगा,
इसी वजह से ईरान के साथ युद्धविराम तक पहुंचने के लिए ओमान खाड़ी क्षेत्र की आखिरी भरोसेमंद कूटनीतिक कड़ी बना हुआ है.
ओमान का युद्ध पर क्या रुख़ रहा?
अमेरिका-ईरान वार्ता में अहम मध्यस्थ रहे ओमान को 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल के हमले से झटका लगा.
हमले से एक दिन पहले ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने वॉशिंगटन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मुलाकात के दौरान कहा था कि शांति समझौता "पहुंच के भीतर" है.
बुसैदी ने हमले के बाद निराशा जताते हुए कहा कि "सक्रिय और गंभीर बातचीत को एक बार फिर कमजोर कर दिया गया." उन्होंने अमेरिका से कहा, "यह आपका युद्ध नहीं है."
संघर्ष के पहले दिन से ही ओमान का यही रुख दिखा. ईरान के हमलों की निंदा करने वाले अपने खाड़ी पड़ोसियों के उलट ओमान ने अमेरिका और इसराइल के सैन्य अभियान की आलोचना की.
अपने क्षेत्र और सुविधाओं पर हमले के बाद भी ओमान का रुख नहीं बदला. उसने बेहद सतर्क भाषा में हमलों की निंदा की. ओमान ईरान का नाम लेने या उस पर आरोप लगाने से बचता रहा.
हालांकि 18 मार्च को इसराइल के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले के बाद ईरानी ठिकानों को निशाना बनाए जाने की उसने खुलकर आलोचना की.
ओमान अमेरिका और इसराइल को कैसे देखता है?
ओमान जारी युद्ध को "गैरकानूनी" मानता है. उसके विदेश मंत्री बुसैदी ने 18 मार्च को द इकॉनॉमिस्ट में लिखे एक लेख में कहा कि "महाशक्ति अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खो चुकी है."
उन्होंने कहा कि "अमेरिका के दोस्तों को उसे इस गैरकानूनी युद्ध से बाहर निकालने में मदद करनी चाहिए", क्योंकि इसने ईरान को जवाबी कार्रवाई की वजह दी है.
ओमान का यह रुख जीसीसी के दूसरे देशों से बिल्कुल अलग है.
इसराइल को लेकर ओमान का रुख़ और ज़्यादा आलोचनात्मक रहा. ग्रैंड मुफ्ती अहमद बिन हमद अल-खलीली ने इसे "ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इसराइली विश्वासघाती हमला" बताया.
उन्होंने 28 फ़रवरी को एक्स पर जारी बयान में "दुनिया भर के मुसलमानों और जागरूक लोगों से इसके खिलाफ मजबूती से खड़े होने" की अपील की.
ओमान ने संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन की तरह इसराइल के साथ औपचारिक रिश्ते स्थापित नहीं किए हैं. हालांकि उसने संपर्क बनाए रखा है और 2018 में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू मस्कट भी गए थे. 1996 के बाद इस स्तर की यह पहली यात्रा थी.
कुछ पर्यवेक्षकों ने पहले इसराइल के साथ रिश्तों को ओमान के खुलेपन का संकेत माना लेकिन ओमान का कहना है कि ऐसा कदम तभी संभव है जब एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी देश की स्थापना हो जाए.
ओमान की रणनीतिक और आर्थिक स्थिति
ओमान में अमेरिका के तीन सैन्य अड्डे हैं. ये हैं - मसीरा आइलैंड एयरबेस, राफ़ो थुमरैत एयरबेस और दुक्म बंदरगाह.
मध्यस्थ की अहम भूमिका के बावजूद ओमान ईरान के जवाबी हमलों से बच नहीं सका.
ओमान पर पहला हमला एक मार्च को हुआ, जब दो ड्रोन ने दुक्म के वाणिज्यिक बंदरगाह को निशाना बनाया गया.
इसमें एक प्रवासी कर्मचारी घायल हुआ. कुछ विश्लेषकों ने माना कि ओमान को मध्यस्थ की भूमिका के तौर पर जो इम्यूनिटी मिली थी वो अब टूट चुकी है. इसके अलावा सलालाह बंदरगाह के तेल भंडारण ठिकानों को भी निशाना बनाया गया.
इसके बावजूद युद्ध शुरू होने के बाद से ओमान सबसे कम निशाना बनने वाला देश रहा, जबकि उसके जीसीसी पड़ोसी, खासकर सऊदी अरब और यूएई सबसे ज्यादा प्रभावित हुए.
दूसरे खाड़ी देशों के उलट ओमान के शेयर बाजार में गिरावट नहीं आई. बल्कि उसका मुख्य सूचकांक एमएसएम 30 पिछले एक महीने में 11.77 प्रतिशत चढ़ा, जो इसे अलग बनाता है.
होर्मुज़ स्ट्रेट में रुकावट के बावजूद ओमान की भौगोलिक स्थिति उसके लिए फायदेमंद रही. दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति और 20 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है. हिंद महासागर तक सीधी पहुंच और बढ़ती तेल कीमतों ने भी ओमान की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया.
ओमान-ईरान रिश्तों की आगे क्या संभावना?
अपने कई खाड़ी पड़ोसियों के विपरीत, ओमान ने ईरान के साथ बातचीत के खुले चैनल बनाए रखते हुए एक अलग भूमिका तैयार की है. इसके बावजूद ईरान के विरोधी ओमान से नाराज़ नहीं हुए हैं.
इसी वजह से ओमान को लंबे समय से ईरान और उसके खाड़ी प्रतिद्वंद्वियों, खासकर सऊदी अरब, के बीच स्वाभाविक मध्यस्थ माना जाता रहा है.
जीसीसी सदस्यता और ईरान से रिश्तों के बीच संतुलन बनाने वाली यह विदेश नीति आगे भी जारी रहने की संभावना है.
ओमान लगातार स्वतंत्र रुख अपनाता रहा है. इसका उदाहरण यमन में ईरान समर्थित हूतियों के खिलाफ लड़ रहे गठबंधन में शामिल न होने का फैसला है.
युद्ध के बावजूद ओमान और ईरान के बीच कूटनीतिक संवाद जारी है. ओमान जीसीसी का इकलौता देश रहा जिसने नए ईरानी सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को चुने जाने पर बधाई दी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.