आदमी ने पहना सैनिटरी नैपकिन!

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दक्षिणी भारत के अरुणाचलम मुरुगनांथम एक अनोखे मिशन पर हैं.
वे इस बात को लेकर परेशान थे कि विकसित देशों में रहने वाली गरीब महिलाएं अपने मासिक धर्म के दौरान क्या इस्तेमाल करती हैं.
मुरुगनांथम का मिशन ये था कि वे कैसे इन महिलाओं को कुछ ऐसा उपलब्ध करवाएं जिससे इन्हें आसानी हो और जो इनकी दशा बदल सके.
यही जुनून था कि 49 वर्षीय इस भारतीय उद्यमी न केवल सैनिटरी नैपकिन बनाया बल्कि उसे खुद पर प्रयोग भी किया.
उनका कहना है, ''नील आर्मस्ट्रोंग चांद पर जाने वाले पहले व्यक्ति थे, हिलेरी और तेंजिंग ने पहली बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी और मैं दुनिया में पहला व्यक्ति हूं जिसने सैनिटरी नैपकिन का खुद पर प्रयोग किया है.''
उनका कहना था कि उन्होंने ये प्रयोग खुद पर इसलिए किया क्योंकि भारत जैसे रुढ़िवादी समाज में महिलाएं मासिक धर्म के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करती है.
ऐसे में महिला सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग करने के लिए तैयार नहीं होती.
वे दुखी होकर कहते हैं, ''पत्नियां भी अपने पतियों से मासिक धर्म के बारे में बात करना पसंद नहीं करतीं.''
विचार का जन्म
12 साल पहले जब उनकी शादी हुई थी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी को एक गंदा कपड़ा घर में छिपाते हुए देखा.

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जब उन्हें ये पता चला कि वो इसे मासिक धर्म के लिए इस्तेमाल कर रही थी तो वे चकित रह गए.
मुरुगनांथन ने जब दबाव देकर पूछा तो उनकी पत्नी ने बताया कि अगर वे सैनिटरी टॉवल का इस्तेमाल करेंगी तो परिवार के लिए दूध खरीदने के लिए पैसे नहीं बचेंगे.
इस घटना के बाद मुरुगनांथन ने एक ऐसा तरीका ईजाद करने की ठानी जो उनकी पत्नी और अन्य महिलाओं की जेब पर भारी न पड़े.
चार साल के शोध के बाद उन्होंने एक छोटी मशीन बनाई जिसका इस्तेमाल सैनिटरी नैपकिन के उत्पादन के लिए किया जा सकता है और इससे चार-पाँच महिलाएँ ख़ुद ही सैनिटरी नैपकिन बना सकती हैं.
एक मशीन की क़ीमत 45 हज़ार रुपए के क़रीब आती है और इससे बनने वाले सैनिटरी नैपकिन की कीमत बाज़ार में मिलने वाली सैनिटरी नैपकिन से एक चौथाई होती है.
ख़ुद किया प्रयोग
यही समय था इन सैनिटरी नैपकिन को टेस्ट करने करने का और मुरुगनांथन ने इसका प्रयोग खुद पर ही किया.
उन्होंने गर्व से कहा, ''मैंने एक कृत्रिम गर्भाशय बनाया.''
फुटबाल से उन्होंने अंदर का हिस्सा यानी ब्लैडर निकाला और उसे खून से भर दिया. इसके बाद उन्होंने इसमें एक चीरा लगाया और एक ट्यूब से जोड़ते हुए अपनी पेंटी में लगा दिया जिस पर सैनिटरी नैपकिन लगा हुआ था.
इस सैनिटरी नैपकिन की अलग-अलग स्थितियों में क्षमता जांचने के लिए उन्होंने इसे पहना और पहनने के बाद अभ्यास, साइकिल और चलना शुरु किया.
उनकी लगातार कोशिश ने नतीजे भी दिखाने शुरु किए.
अब हाथ से चलने वाली इस मशीन को वो भारत के 23 राज्यों के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे जैसे देशों को बेच चुके हैं.
































