हागिया सोफ़िया के बाद अर्दोआन की तुर्की में ख़िलाफ़त की माँग
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- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
हाल ही में तुर्की के मशहूर म्यूज़ियम हागिया सोफ़िया को मस्जिद में बदलने की घोषणा की गई थी. इसके बाद यहाँ 86 साल के बाद पहली बार पिछले शुक्रवार 24 जुलाई को नमाज़ भी अदा की जा चुकी है.
तुर्की के अख़बार हुर्रियत डेली न्यूज़ के मुताबिक़ क़रीब साढ़े तीन लाख लोग इस दिन नमाज़ अदा करने के लिए हागिया सोफ़िया के अंदर और बाहर जमा हुए थे.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के इस फ़ैसले की आलोचना भी हो रही है. दरअसल, उन्होंने अपने चुनाव अभियान के दौरान हागिया सोफ़िया को मस्जिद का दर्जा देने का वादा किया था.
नमाज़ अदा करने के बाद रूढ़िवादियों के एक दल ने इस्तांबुल की सड़कों पर निकलकर नारेबाज़ी भी की, "मोहम्मद रसूल अल्लाह...अल्लाह-हू-अकबर. हागिया सोफ़िया एक मस्जिद ही रहेगा."
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इस मामले में ताज़ा विवाद अब तुर्की सरकार समर्थित मैगज़ीन गर्सेक हयात के ख़िलाफ़त के लिए एकजुट होने के आह्वान के कारण जुड़ गया है.
मैगज़ीन ने अपने ताज़ा अंक में लिखा है, "हागिया सोफ़िया और तुर्की अब आज़ाद हैं. ख़िलाफ़त के लिए एकजुट हो जाओ...अगर अब नहीं तो कब?...अगर तुम नहीं तो कौन?"
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तुर्की के पत्रकार-लेखक अब्दुर्रहमान दिलीपाक ने अपने ट्विटर पर मैगज़ीन का कवर पेज शेयर किया है.
ख़िलाफ़त की माँग
इस्लामी दुनिया तुर्की के उस्मानी साम्राज्य के पतन को एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में देखता है. उन्हें लगता है कि इस घटना के बाद मुस्लिम समाज पूरी दुनिया में निर्बल और बदहाल हो गया.
उनका मानना है कि इस्लामी ख़िलाफ़त की पुनर्स्थापना के साथ मुसलमान अपने खोए हुए सुनहरे दिन फिर से हासिल कर लेंगे. उस्मानिया साम्राज्य में ख़लीफ़ा प्रमुख शासक हुआ करता था. ख़िलाफ़त की पुर्नस्थापना का मतलब है कि फिर से तुर्की में ख़लीफ़ा के पद को स्थापित करना.
उन्होंने पिछले साल कहा था कि रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने ख़लीफ़ा का ख़िताब हासिल किया है.
तुर्की के न्यूज़ वेबसाइट अहवाल न्यूज़ के मुताबिक़ उन्होंने पिछले मार्च में दिए एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अब ख़िलाफ़त राष्ट्रपति अर्दोआन के साथ है.
हालांकि सत्तारूढ़ जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (एकेपी) के प्रवक्ता ओमर सेलिक ने इस मुद्दे पर कई ट्वीट कर कहा है, "तुर्की गणराज्य एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और क़ानून वाला राज्य है. इन विशेषताओं के साथ गणराज्य हमारा आधार है. तुर्की की राजनीतिक शासन व्यवस्था के बारे में राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करना ग़लत है. हमारा गणराज्य हमेशा क़ायम रहेगा."
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मैगज़ीन की ओर से ख़िलाफ़त का आह्वान करने को लेकर आलोचना होनी शुरू हो गई और इसका विरोध भी किया जा रहा है. यह विरोध तुर्की में भी हो रहा है.
तुर्की के न्यूज़ वेबसाइट अहवालन्यूज़ की ख़बर के मुताबिक़ तुर्की के अंकारा बार एसोसिएशन ने ख़िलाफ़त का आह्वान करने को लेकर गर्सेक हयात मैगज़ीन के ख़िलाफ़ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है.
क्यों हो रही है आलोचना
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इसके अलावा ग्रीस ने हागिया सोफ़िया को मस्जिद में तब्दील करने के फ़ैसले पर कड़ा ऐतराज़ जताया है. ग्रीस के प्रधानमंत्री केरियाकोस मित्सोताकिस ने तुर्की को समस्या पैदा करने वाला देश बताया है और कहा है कि हागिया साफ़िया की स्थिति में यह बदलाव 21वीं सदी की सभ्यता के प्रतिकूल है.
24 जुलाई को अपने संबोधन में राष्ट्रपति अर्दोआन ने ग्रीस का नाम लिए बिना कहा था कि हाल के दिनों में कुछ देश जो हो हल्ला मचा रहे हैं वो हागिया सोफ़िया के लिए नहीं है बल्कि उनके निशाने पर इस क्षेत्र में तुर्की और मुसलमानों की मौजूदगी है.
शनिवार 25 जुलाई को तुर्की के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान दिया, "ग्रीस ने एक बार फिर इस्लाम और तुर्की के प्रति हागिया सोफ़िया के बहाने अपनी शत्रुता का परिचय दिया है."
दूसरी तरफ़ ग्रीस के विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया देते हुए बयान दिया, "21वीं सदी का अंतरराष्ट्रीय समुदाय आज की तुर्की में कट्टरपंथी धार्मिक और राष्ट्रवादी विचारों को फलता-फूलता देखकर दंग है."
ग्रीस के ज़्यादातर लोग हागिया सोफ़िया को रूढ़िवादी ईसाई धर्म के केंद्र के रूप में देखते हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ जब शुक्रवार को हागिया सोफ़िया में नमाज़ पढ़ा जा रहा था तब उसी दिन पूरे ग्रीस में चर्च में शोक की घंटियाँ बजाई गईं.
ईसाइयों से धर्मगुरू पोप फ़्रांसिस ने भी कहा है कि इस्तांबुल के हागिया सोफ़िया को वापस मस्जिद में बदलने के तुर्की सरकार के फ़ैसले से उन्हें दुख पहुँचा है.
इस्लामी राष्ट्रवाद के उदय का ख़तरा
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एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष तुर्की की नींव रखने वाले कमाल पाशा के कई फ़ैसलों को अर्दोआन ने पिछले कई सालों में बदला है. इसमें हिजाब पहनने पर पाबंदी को हटाने, धार्मिक शिक्षा देने, शराब पर टैक्स बढ़ाने और उसके विज्ञापन पर रोक लगाने से लेकर कई मस्जिदों के निर्माण शामिल हैं.
तुर्की के धार्मिक मामलों के निदेशालय के मुताबिक़ अर्दोआन के सत्ता संभालने के बाद से अब तक तुर्की में 13000 नई मस्जिदें बन चुकी हैं. औरतों को लेकर अर्दोआन की राय की भी काफ़ी आलोचना हुई है. उन्होंने एक बार कहा था कि औरतें 'नाज़ुक' मिज़ाज की होती हैं.
उन्हें मर्दों के बराबर नहीं खड़ा किया जा सकता है. उनका मानना है कि क़ानून की नज़र में तो औरतों के साथ बराबर का व्यवहार होना चाहिए लेकिन समाज में उनके लिए अलग भूमिका तय होनी चाहिए.
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एके पाशा तुर्की में चल रहे मौजूदा घटनाक्रम पर कहते हैं कि पिछले कई सालों से राजनीतिक नेता इस्लाम का इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए कर रहे हैं.
वो विस्तार से इस बारे में बताते हैं, "इसकी शुरुआत ईरान में 1979 में अयातुल्लाह खुमैनी ने की. इस्लाम के नाम पर वो तख्तापलट कर सत्ता में आए. उसके बाद से लगातार वहाँ मुल्लाओं और धार्मिक नेताओं के हाथ में सत्ता रही है. उनकी कोशिश दूसरे इस्लामी मुल्कों में भी इसे दोहराने की रही है. उनकी इस कोशिश का सबसे पहले सऊदी अरब ने विरोध किया. चूँकि इस्लाम की वहीं से शुरुआत हुई है. मक्का-मदीना वहीं हैं. ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉफ्रेंस का मुख्यालय भी वहीं है इसलिए उन्हें लगाता है कि इस्लामी दुनिया के नेतृत्व वो करेंगे ना कि ईरान."
वो आगे कहते हैं, "सऊदी अरब ने इसके लिए जो क़दम उठाए हैं, उसके बहुत ख़राब नतीजे निकले. उन्होंने मस्जिदों और मदरसों पर अरबों रुपए ख़र्च किए. इसके बाद अल-क़ायदा की ओर से 9/11 जैसे हमले भी देखने को मिले. इसके बाद अमरीका का काफ़ी दबाव सऊदी अरब पर पड़ा. इसकी वजह से सऊदी अरब ने अपने यहाँ इस्लामी हुकूमत में थोड़ा लचीलापन लाने की कोशिश की. इसके ख़िलाफ़ इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट ने अपनी कार्रवाइयाँ शुरू की."
उन्होंने आगे बताया- अब यह तुर्की में अर्दोआन की तरफ़ से तीसरी कोशिश की जा रही है इस्लामी दुनिया में एक मॉडल पेश करने की और वो ख़ुद को इस्लामी दुनिया के नेता के तौर पर पेश करने में लगे हैं. इसलिए अर्दोआन ने फ़लस्तीन, कश्मीर, यमन, लीबिया और सीरिया जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाई है. वो यह बताना चाहते हैं कि तुर्की का मॉडल ही सफल है जो राजनीतिक तौर पर एक लोकतंत्र भी और अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से भी मज़बूत है. अभी जो कुछ भी तुर्की में हो रहा है उसे ईरान, सऊदी अरब और 9/11 की पिछली घटना के पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. इसके अलावा यूरोपीय यूनियन में तुर्की के नहीं लिए जाने और 2016 में तुर्की में तख्तापलट की कोशिश में अमरीका के हाथ होने के आरोप जैसी बातों की वजहों से भी अर्दोआन का यह रुख़ हुआ है.
इतिहास
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दरअसल हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम असल में एक चर्च हुआ करता था जिसे छठी सदी में बैज़ेंटाइन सम्राट जस्टिनियन ने बनवाया था.
लेकिन उस्मानिया साम्राज्य के उदय के साथ ही इसे मस्जिद में तब्दील कर दिया गया.
इसके बाद उस्मानिया सल्तनत के ख़ात्मे के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा का शासन आया, जिन्होंने 1934 में इस मस्जिद (मूल रूप से हागिया सोफ़िया चर्च) को म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला किया. यह यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में भी शामिल है.
तुर्की में कट्टर इस्लामवादी लंबे समय से हागिया सोफ़िया को मस्जिद में तब्दील करने की वकालत करते आए हैं जबकि तुर्की की सेक्युलर जमात हमेशा से इसके ख़िलाफ़ रही है.
तुर्की के मशहूर लेखक और नोबेल विजेता ओरहान पामुक ने बीबीसी से बातचीत में कहा था, "इस निर्णय के बाद कुछ तुर्क लोगों से उनका 'गौरव' छिन जाएगा जो अब तक कहते रहे कि तुर्की एक सेक्युलर मुल्क है. मेरे जैसे लाखों तुर्क मुसलमान हैं, जो इस निर्णय के बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं, लेकिन हमारी आवाज़ों को सुना ही नहीं गया."
राष्ट्रपति अर्दोआन ने अपने फ़ैसले के बचाव में कहा था, "तुर्की सरकार ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर यह निर्णय लिया है और यह इमारत आगे भी मुस्लिम, ग़ैर-मुस्लिम और अन्य विदेशी यात्रियों के लिए हमेशा की तरह खुली रहेगी."
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लेकिन अरबी भाषा में उन्होंने जो बयान ट्विटर पर दिया है, वो इस बयान से अलग है. अरबी में उन्होंने बयान दिया है कि, "हागिया सोफ़िया का रिवाइवल अल-अक्सा मस्जिद की आज़ादी की ओर एक संकेत है."
अरबी और अंग्रेजी में अलग-अलग तरह के बयान देने की वजह से भी उनकी काफ़ी आलोचना हुई है और उनके नीयत पर संदेह जताया गया है.
हालाँकि यूरोप में कई ऐसी भी जगहें हैं, जहाँ कभी उस्मानिया सल्तनत के दौरान मस्जिद हुआ करती थी, लेकिन अब वहाँ चर्च हैं इनमें एक स्पेन के कोरडोबा की मस्जिद भी शामिल है. अब यह कोरडोबा कैथेडरल है और यहाँ ईसाइयों के साथ नमाज़ पढ़ने की मुसलमानों की ओर से मांग होती रही है.
मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने साल 1924 में ख़िलाफ़त का अंत करते हुए तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया था.
अरबी में ख़लीफ़ा का अर्थ प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होता है. कुरान में इसे न्यायप्रिय शासन के रूप में देखा गया है. पहले आदम फिर दाऊद और सुलेमान को धरती पर ख़ुदा का ख़लीफ़ा माना जाता है. जब 632 में पैगम्बर मोहम्मद की मृत्यु हुई तो उनके उत्तराधिकारी को मुस्लिम समुदाय के नेता के रूप में ख़लीफ़ा का ख़िताब मिला.
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