अफ़ग़ान औरतों ने दिल्ली में भी दिखाया दम!

अफ़ग़ानिस्तान का स्वाद

दिल्ली में कुछ अफ़ग़ान महिलाएं हफ़्ते में दो से तीन बार अफ़ग़ानिस्तान का खाना बनाती हैं और उसे बेचकर पैसे कमाती हैं.

इनमें से एक रज़िया ने बीबीसी को बताया, "2011 में तालिबान ने मेरे पति का अपहरण किया और फिर उन्हें मार डाला. अपने चार बच्चों के साथ मैं साल 2013 में भारत आई. शुरुआत में यहां मुश्किल हुई क्योंकि दिल्ली महंगा शहर है."

रज़िया अफ़ग़ानिस्तान में अपने आलीशान घर को छोड़कर आजकल दिल्ली में एक छोटे से घर में रहती हैं और कुछ दूसरी अफ़ग़ान औरतों के साथ भोगल के एक घर में अफ़ग़ान खाना बनाती हैं.

अफ़ग़ानिस्तान का स्वाद

खाना बनाते-बनाते रज़िया ने बताया, "ये मेरी अकेली की समस्या नहीं है. मेरे जैसी और भी अफ़गान औरते हैं जिन्हें इस परेशानी का सामना करना पड़ता है. अफ़ग़ानिस्तान में मैं एक अध्यापिका थी लेकिन यहाँ भारत में मुझे इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ."

लेकिन अब रज़िया और इन जैसी कई औरतें अपने हालात बदलने की कोशिश कर रही हैं. कुछ अफ़ग़ान महिलाओं ने 'इल्हाम' की शुरुआत की जिसमें इनकी मदद की यूएनएचसीआर और एक ग़ैर सरकारी संगठन 'ऐक्सेस' ने.

इस समूह में औरतें हफ़्ते में दो से तीन बार अफ़ग़ान खाना बनाती हैं और उसे दफ़्तरों और दूतावासों में बेचकर पैसे कमाती हैं.

अफ़ग़ानिस्तान का स्वाद

इमेज स्रोत, unhcr

'इल्हाम' का मतलब होता है सकारात्मकता. खाने से जो कमाई होती है उससे वो घर का सामान ख़रीदती हैं. इसी कमाई से वो अपने घर का किराया देती हैं और बच्चों के स्कूल की फ़ीस भी.

खाने में मिलता है अफ़ग़ान समोसा, काबुली पुलाओ, अफ़ग़ान चाय, खजूर, शामी कबाब और बहुत सारे अन्य अफ़ग़ान पकवान.

इनके खाने का आर्डर पांच सितारा होटल, दूतावासों और दफ़्तरों से आता है.

अफ़ग़ानिस्तान का स्वाद

'इल्हाम' की एक सदस्य परवीन बताती हैं कि वो यहाँ अपनी जैसी दूसरी औरतों से बातें करके बेहतर महसूस करती हैं .

परवीन का कहना है, "यहां जब मैं आती हूं तो अपनी बहुत सी बातें भूल जाती हूं. मेरा तनाव कम हो जाता है. हालांकि घर की याद बहुत आती है लेकिन कुछ पल के लिए ख़ुशी मिल जाती है."

भारत में यूएनएचसीआर यानी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था के साथ 35 हज़ार से ज़्यादा शरणार्थी रजिस्टर्ड हैं.

उनमें लगभग 14 हज़ार अफ़ग़ानिस्तान से हैं जिनमें से ज़्यादातर दिल्ली में रहते हैं. कुछ तो मानसिक तनाव की वजह से दवाई भी लेते हैं.

यूएनएचसीआर की सुचिता मेहता ने कहा, "जब से औरतों ने इस छोटे से बिज़नेस की शुरुआत की है, उनमें आत्मविश्वास आया है. इस सबके बाद हमनें इन्हें प्रशिक्षित किया ताकि यह पेशेवर तौर पर खाना बना सकें."

गैर सरकारी संगठन ऐक्सेस की अदिति सब्बरवाल के मुताबिक मई 2016 मे नियमित ऑर्डर आना शुरू हुए. "एक महिला करीब 12000 रुपये तक कमा सकती है लेकिन ये एक निर्धारित रकम नही. ये ऑर्डर पर निर्भर करता है. ये खुद खाना पकाने के लिए समान ख़रीदती हैं."

चिकी सरकार, दिल्ली के शाहपुर जाट में एक प्रकाशक हैं, उन्होंने इन महिलाओं का खाना खाया और वो कहती हैं कि खाना लाजवाब है.

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"आप पहली बार ये सोचकर आती हैं कि चलो कुछ अच्छा करते हैं और दूसरी बार केवल इसलिए आते हैं की खाना अच्छा है और यहीं से लेना चाहिए. इसमें अफ़ग़ानिस्तान का ज़ायका है ."

आजकल लोगों को खाना खिलाने में मसरूफ़ परवीन का सपना है कि वो एक रेस्त्रां खोलें या एक रेस्त्रां की मैनेजर बनें.

(इस ख़बर में औरतों की पहचान बचाने के लिए नाम बदले हुए हैं.)

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