बिना अल्कोहल वाली बीयर कैसे बनी स्वाद में दमदार

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आप दोस्तों के साथ रात में बाहर हैं और ड्रिंक कर रहे हैं. आप नहीं चाहते कि अगले दिन हैंगओवर हो, इसलिए आप एक समझदारी भरा विकल्प चुनते हैं. और ये विकल्प है - बिना अल्कोहल वाली बीयर.
इस विकल्प को चुनने वालों में आप अकेले नहीं हैं. डेटा एनालिटिक्स फ़र्म आईडब्ल्यूएसआर ने अनुमान लगाया था कि बिना अल्कोहल वाली बीयर एल को पछाड़ते हुए दुनिया में दूसरी सबसे लोकप्रिय बीयर बनने जा रही है.
एक दशक पहले तक शायद आपको इसका स्वाद अच्छा नहीं लगता.
लेकिन अब केमिस्ट्री में कुछ बदलाव की मदद से, बीयर बनाने वाले कुछ ब्रुअर्स का दावा है कि उनकी बिना या कम अल्कोहल वाली बीयर अब आम बीयर जितनी ही स्वादिष्ट हो सकती है और यह एक ज़्यादा सेहतमंद विकल्प भी है.
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तो इसका स्वाद इतना बेहतर कैसे हुआ और क्या यह कभी उन सभी बारीक़ स्वाद और खुशबू दे पाएगी जिन्हें ज़्यादातर बीयर पीने वाले पसंद करते हैं?
केले जैसी एरोमा वाली बीयर

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बीयर बनाने में फ़र्मेंटेशन का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें यीस्ट की मदद से माल्टेड जौ से मिलने वाली शुगर को अल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदला जाता है.
बेल्जियम के वीआईबी-केयू लूवेन सेंटर फ़ॉर माइक्रोबायोलॉजी में यीस्ट विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर केविन वेरस्ट्रेपेन के अनुसार, जब यीस्ट इस शुगर को खाता है तो वह सैकड़ों तरह के एरोमा कंपाउंड बनाता है.
उन्होंने बीबीसी रेडियो कार्यक्रम क्राउडसाइंस में कहा, "इनमें से ज़्यादातर बहुत कम मात्रा में बनते हैं, लेकिन हमारी नाक इतनी संवेदनशील होती है कि हम उन्हें पहचान सकते हैं."
एस्टर नाम के कंपाउंड, बीयर को फलों जैसी खुशबू देते हैं. इनमें से एक आइसोएमिल एसीटेट है, जो केले जैसी तेज़ खुशबू के लिए जाना जाता है. लेकिन क्या इससे बीयर से केले की खुशबू नहीं आएगी?
वेरस्ट्रेपेन कहते हैं, "मुझ पर यक़ीन करें कि लगभग हर बीयर में आइसोएमिल एसीटेट होता है. अगर आप इसे हटा दें, तो आप उस फल जैसी खुशबू का थोड़ा हिस्सा मिस करेंगे."
इसके अलावा भी कई कंपाउंड होते हैं.
वह कहते हैं, "कुछ ऐसे होते हैं जिनकी ख़ुशबू गुलाब या सेब जैसी होती है, फिर थोड़ा बटर जैसा एहसास, और थोड़ी अनाज जैसी खुशबू भी होती है. इसलिए एरोमा के मामले में यह सच में एक चिड़ियाघर जैसा है."
ब्रुअर्स इसी अपने ख़ास "चिड़ियाघर" को बनाए रखना चाहते हैं ताकि उनकी बीयर का अलग स्वाद बना रहे.
डी-अल्कोहलाइज़ेशन

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लेकिन जब बात बिना अल्कोहल वाली बीयर की आती है, तो यह हमेशा आसान नहीं होता.
बिना अल्कोहल वाली बीयर बनाने के लिए इसे सामान्य तरीके से बनाया जाता है और फिर अल्कोहल को उड़ाने के लिए बीयर को गर्म किया जाता है. लेकिन ऊंचा तापमान कई नाज़ुक एरोमा कंपाउंड को भी नष्ट कर देता है.
ब्रुअर्स इस तकनीक को कम दबाव पर अपनाकर इसमें बदलाव करते हैं, जिसे वैक्यूम डिस्टिलेशन कहा जाता है.
बेल्जियम की दुनिया की सबसे बड़ी ब्रूइंग कंपनी एबी इनबेव में इनोवेशन और टेक्नोलॉजी के ग्लोबल वाइस प्रेसिडेंट डेविड डी शुटर बताते हैं, "सामान्य दबाव पर अल्कोहल का बॉयलिंग पॉइंट 78 डिग्री सेल्सियस होता है."
उन्होंने क्राउडसाइंस को बताया, "लेकिन अगर आप बहुत ज़्यादा वैक्यूम में जाएं, तो बॉयलिंग पॉइंट को 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है. अगर आप उस तापमान पर डिस्टिल करते हैं, तो आप बीयर को नुकसान नहीं पहुंचाते."
लेकिन इस प्रक्रिया में भी कुछ सुगंध गुम हो सकती है. इसलिए ब्रुअर्स उन अहम गंधों की पहचान करते हैं और उन्हें दोबारा जोड़ते हैं. डी शुटर कहते हैं कि इससे बिना अल्कोहल वाली बीयर की गुणवत्ता सुधारने में काफ़ी मदद मिली है.
उनके अनुसार, "हमें एरोमा पर बहुत रिसर्च करनी पड़ी ताकि उसे वापस लाया जा सके, क्योंकि यही वह हिस्सा था जो 20-30 साल पहले हमारे पास नहीं था."
कुछ अन्य ब्रुअर्स अल्कोहल हटाने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस नाम की प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं.
यूके के स्वतंत्र क्राफ़्ट ब्रुअर वाइपर एंड ट्रू के ऑपरेशंस डायरेक्टर मार्विन लिंटनर ने बीबीसी टीवी कार्यक्रम टेक नाउ में दिखाया कि यह कैसे काम करता है.
बीयर को एक झिल्ली से गुजारा जाता है जो बड़े अणुओं वाले एरोमा कंपाउंड को रोक लेती है, जबकि छोटे अल्कोहल और पानी के अणु पार हो जाते हैं, जिससे एक गाढ़ा बीयर मिश्रण बचता है.
फिर इसमें ताज़ा पानी मिलाया जाता है, जिससे 5% अल्कोहल वाली बीयर 0.5% अल्कोहल वाली बीयर बन जाती है, जिसे कई देशों में बिना अल्कोहल वाली माना जाता है. दिलचस्प है कि बहुत पके केले में भी इतना अल्कोहल हो सकता है.
कंट्रोल्ड फ़र्मेंटेशन

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सामान्य बीयर से अल्कोहल निकालने के अलावा एक और तरीक़ा है कि इसे शुरुआत से ही कम या बिना अल्कोहल के बनाया जाए.
ऐसा करने का एक तरीक़ा है फ़र्मेंटेशन प्रक्रिया को सीमित करना, जैसे तापमान के ज़रिए यीस्ट को निष्क्रिय करना या कम माल्टेड जौ का इस्तेमाल करना.
यह सुनिश्चित करने के लिए कि बिल्कुल भी अल्कोहल न बने, कुछ ब्रुअर्स फ़र्मेंटेशन को पूरी तरह छोड़ देते हैं और उसकी जगह ऐसे अन्य घटक और एंज़ाइम मिलाते हैं जो उसके प्रभाव की नकल करते हैं.
कुछ ख़ास तरह के यीस्ट स्ट्रेन भी होते हैं जो शुगर को तोड़ते समय बाईप्रोडक्ट के रूप में अल्कोहल नहीं बनाते.
वेरस्ट्रेपेन बताते हैं, "हम इंसान भी शुगर खाते हैं, लेकिन हम अल्कोहल नहीं बनाते. हम पानी और कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं. और कुछ अन्य यीस्ट भी ऐसा ही करते हैं."
उनकी लैब ऐसे अलग-अलग यीस्ट स्ट्रेन पर प्रयोग करती है जो ब्रूइंग इंडस्ट्री के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जैसे वे जो ख़ास स्वाद बढ़ाते हैं या तेज़ी से फ़र्मेंट करते हैं. साथ ही बिना अल्कोहल वाली बीयर के लिए भी स्ट्रेन बनाने का प्रयोग होता है.
वह कहते हैं, "कमज़ोरी यह है कि अगर आप अलग यीस्ट का इस्तेमाल करते हैं, तो एरोमा थोड़ा बदल जाता है. हालांकि सच कहूं तो अब हमारे पास कुछ अच्छे यीस्ट हैं जो शानदार बीयर बनाते हैं और अल्कोहल नहीं बनाते."
फ़र्क पहचानिए?

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ब्रुअर्स के सामने एक चुनौती यह है कि बीयर से अल्कोहल हटाने से उसके स्वाद पर असर पड़ सकता है, चाहे आप कोई भी तरीका अपनाएं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि अल्कोहल खुद भी एक तरह की खुशबू रखता है, जो बीयर के स्वाद का हिस्सा होता है.
वेरस्ट्रेपेन कहते हैं, "अल्कोहल पानी के गुणों को भी बदल देता है. इससे बीयर में घुले दूसरे कंपाउंड कैसे व्यवहार करते हैं, यह भी बदल जाता है, जिनमें एरोमा कंपाउंड भी शामिल हैं."
इसलिए मनचाहा अंतिम स्वाद हासिल करने के लिए अलग-अलग तरीक़ों और सामग्री के साथ प्रयोग करना पड़ता है.
ब्रुअर्स निश्चित रूप से दलील देंगे कि आज वे जिन उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, उनसे बिना अल्कोहल वाली बीयर पहले से ज़्यादा स्वादिष्ट हो गई है.
लिंटनर गर्व से कहते हैं, "आप इसे पूरी रात पी सकते हैं. मैं वादा करता हूं, आपको फर्क पता नहीं चलेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
































