किसानों के जी का जंजाल बना आलू!

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अपने खेतों में बंपर पैदावार देख कर आमतौर पर किसानों के चेहरे खुशी से खिल उठते हैं.
लेकिन क्या यह बंपर फसल उनके लिए नुक़सानदेह और आत्महत्या की वजह भी हो सकती है? कम से कम पश्चिम बंगाल के बर्दवान ज़िले में तो ऐसा ही लग रहा है.
राज्य में आलू की बंपर फसल होने के बावजूद पिछले एक पखवाड़े में सात किसानों के ख़ुदकुशी करने की ख़बरें सामने आई हैं.
पिछले 15 दिनों के दौरान लागत मूल्य भी वसूल नहीं हो पाने की वजह से जगह-जगह सड़कों पर आलू की बोरियां बिखेर कर किसान अपना विरोध जता चुके हैं.
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राज्य के कृषि मंत्री पूर्णेंदु बासु मानते हैं कि आलू की बंपर पैदावार से संकट तो है, लेकिन इसका किसानों की आत्महत्या से संबंध है कि नहीं, इस सवाल पर वे कोई टिप्पणी नहीं करते.
बोस कहते हैं, "सरकार ने इस संकट पर काबू पाने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन रातों रात कोई चमत्कार नहीं हो सकता."
इस बीच आलू किसानों की आत्महत्या पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी राज्य सरकार से मंगलवार तक एक हलफ़नामे के जरिए यह बताने को कहा है कि उसने आलू किसानों के सामने पैदा हुए संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं.
आलू की पैदावार

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राज्य में इस साल आलू की पैदावार लगभग 1.20 करोड़ टन हुई है. इसकी घरेलू खपत लगभग 74 लाख टन है और राज्य में इसकी भंडारण क्षमता 65 लाख टन है.
ऐसे में किसानों को लागत से बेहद कम दाम पर अपनी उपज बेचनी पड़ रही है. भारी मुनाफ़े की उम्मीद में ज़िलों में आलू किसान, साहूकारों से ऊंची ब्याज दर पर कर्ज़ लेकर आलू की खेती करते हैं.
इस साल आलू उत्पादन करने वाले इलाकों में 50 किलो की बोरी 140 रुपए में बिक रही है, जबकि लागत इससे कहीं ज़्यादा पड़ती है.
पिछले साल इन इलाकों में ही प्रति बोरी का भाव 300-350 रुपए था.
संकट की वजह?

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बंटाई पर खेती करने वाले बर्दवान के गुड्डू मुर्मू ने साहूकारों से आलू की खेती के लिए 55 हज़ार का कर्ज़ लिया था.
लेकिन आलू की लगातार गिरती कीमतों से हताश होकर उन्होंने पिछले सप्ताह कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.
उनके परिवार में दस लोग हैं. गुड्डू का पुत्र राम मुर्मू कहते हैं, "अब तक आलू की फसल खेतों में ही है. समझ में नहीं आता कि आगे घर कैसे चलेगा और कर्ज़ कैसे चुकाएंगे?"
आखिर इस संकट की वजह क्या है?
नहीं मिल रहे हैं ऑर्डर

पश्चिम बंगाल प्रोग्रेसिव पोटैटो मर्चेंट्स एसोसिएशन के सलाहकार गोपाल मंडल कहते हैं, "पड़ोसी राज्यों में भी आलू की फसल होने की वजह से इस बार वहाँ से ऑर्डर बहुत कम मिले हैं."
पश्चिम बंगाल कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के अध्यक्ष पतित पावन डे कहते हैं, "सरकार ने किसानों से वाजिब क़ीमतों पर आलू खरीदने का ऐलान किया था, लेकिन वह काफी कम मात्रा में ख़रीद कर रही है."

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मंत्री बताते हैं कि सरकार ने साढ़े पांच रुपए किलो की दर से किसानों से सीधे 50 हजार टन आलू ख़रीदने का फैसला किया है, लेकिन यह ख़रीद कब शुरू होगी, इस बारे में वे साफ कुछ नहीं बताते.
वे कहते हैं कि सरकार विदेशों में आलू निर्यात के लिए बातचीत कर रही है. इसके लिए आलू निर्यातकों को सब्सिडी देने का भी फैसला किया गया है.
लेकिन सरकार ने अगर मौजूदा हालात पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो आने वाले दिनों में यह संकट और गंभीर हो सकता है.
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