क्या वाकई 146 अंग्रेज़ों को कलकत्ता की काल कोठरी में ठूँसा गया था ? - विवेचना

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

कहा जाता है कि इंग्लैंड में किसी भी स्कूल का बच्चा भारत के बारे में तीन चीज़ें ज़रूर जानता था, काल कोठरी (ब्लैक होल ), प्लासी की लड़ाई और 1857 का विद्रोह.

दरअसल 1707 में औरंगज़ेब की मौत के बाद से ही मुग़ल साम्राज्य का तेज़ी से पतन शुरू हो गया था और बंगाल तकनीकी रूप से मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भी एक तरह से आज़ाद प्रांत बन गया था.

जब अंग्रेज़ों और फ़्राँसीसियों ने वहाँ अपनी फ़ैक्ट्रियों की किलेबंदी शुरू कर दी तो नवाब सिराजुद्दौला को लगा कि वह उनको दिए गए अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं. उन्होंने उनसे जवाबतलब किया.

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इमेज कैप्शन, सिराजुद्दौला अपने सैनिकों के साथ एक पेंटिंग में

अंग्रेज़ों के जवाब से सिराजुद्दौला संतुष्ट नहीं हुए. लिहाज़ा 16 जून, 1756 को उन्होंने कलकत्ता पर हमला बोल दिया.

जब ये लगने लगा कि अंग्रेज़ों की हार निश्चित है, गवर्नर जॉन ड्रेक अपने कमांडर, अपनी परिषद के अधिकतर सदस्यों, महिलाओं और बच्चों के साथ हुगली नदी में खड़े एक पोत पर सवार होकर बच निकले.

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अंग्रेज़ो का आत्मसमर्पण

कलकत्ता की गैरिसन को-काउंसिल के एक जूनियर सदस्य जोनाथन हॉलवेल के ज़िम्मे छोड़ दिया गया.

20 जून, 1756 को सिराजुद्दौला के सैनिकों ने फ़ोर्टविलियम की दीवारें तोड़ कर उसके अंदर प्रवेश किया और अंग्रेज़ों की पूरी गैरिसन ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

एस सी हिल ने अपनी किताब 'बंगाल इन 1857-58' में लिखा, 'सिराजुद्दौला ने फ़ोर्ट विलियम के बींचोंबीच अपना दरबार लगाया, जहाँ उन्होंने घोषणा की कि कलकत्ता का नाम बदल कर अलीनगर रखा जा रहा है.

इसके बाद उन्होंने राजा मानिकचंद को किले का रक्षक घोषित किया. उन्होंने अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए गवर्नमेंट हाउज़ को गिराने का भी आदेश दिया. उन्होंने कहा ये भवन राजकुमारों के रहने लायक है न कि व्यापारियों के. इसके बाद उन्होंने अपनी सफलता के लिए ख़ुदा को धन्यवाद देते हुए नमाज़ पढ़ी.'

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अंग्रेज़ सैनिक ने गोली चलाई

बाद में जे ज़ेड हॉलवेल ने इसका विवरण देते हुए अपने लेख 'इंट्रेस्टिंग हिस्टोरिकल इवेंट्स रिलेटेड टू प्रॉविंस ऑफ़ बंगाल' में लिखा, 'मेरे हाथ बाँध कर मुझे नवाब के सामने पेश किया गया. नवाब ने मेरे हाथ खोलने के आदेश दिए और मुझसे वादा किया कि मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की जाएगी. साथ ही साथ उन्होंने अंग्रेज़ों द्वारा उनका प्रतिरोध करने और गवर्नर ड्रेक के व्यवहार पर अपनी नाराज़गी भी प्रकट की.'

थोड़ी देर बाद सिराजुद्दौला वहाँ से उठ गए और एक घर में आराम करने चले गए जो एक अंग्रेज़ वैडरबर्न का था.

एस सी हिल ने लिखा, 'नवाब के कुछ सैनिकों ने एक तरह की नियंत्रित लूटपाट शुरू कर दी. उन्होंने कुछ अंग्रेज़ों से लूटपाट की लेकिन उनके साथ किसी तरह की ज़्यादती नहीं की.

कुछ पुर्तगालियों और आरमीनियंस को तो उन्होंने खुला छोड़ दिया और वो फ़ोर्ट विलियम से बाहर निकल आए. लेकिन कुछ ही घंटों में शाम होते होते हॉलवेल और दूसरे कैदियों के साथ नवाब के सैनिकों का व्यवहार बदल गया. हुआ यह कि शराब के नशे में एक अंग्रैज़ सैनिक ने पिस्टल निकाल कर नवाब के एक सैनिक को गोली से उड़ा दिया.'

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अंग्रेज़ों को काल कोठरी में डाला गया

जब इसकी शिकायत सिराजुद्दौला के पास पहुंची तो उन्होंने पूछा कि दुर्व्यवहार करने वाले अंग्रेज सैनिकों को कहाँ रखा जाता था तो उन्हें बताया गया कि काल कोठरी में. उनके अधिकारियों ने उन्हें सलाह दी कि इतने सारे कैदियों को रात भर खुले में छोड़ना ख़तरनाक होगा. इसलिए बेहतर होगा कि उन्हें काल कोठरी में डाल दिया जाए.

सिराजुद्दौला ने उन्हें ऐसा ही करने के लिए कहा.

कुल 146 अंग्रेज़ों को बिना उनके पद और लिंग का लिहाज़ किए बिना एक 18 फ़ीट गुणा 14 फ़ीट की कोठरी में ठूँस दिया गया, जिसमें सिर्फ़ दो छोटी सी खिड़कियाँ थीं ये कोठरी सिर्फ़ तीन या चार कैदियों को रखने के लिए बनाई गई थीं.

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हॉलवेल ने लिखा, 'ये साल की शायद सबसे गर्म और उमस भरी रात थी. ये सारे कैदी 21 जून की सुबह 6 बजे तक बिना खाना, पानी और हवा के उस कोठरी में बंद रहे.'

अंग्रेज़ो की ये तकलीफ़ शाम सात बजे से शुरू होकर अगले दिन सुबह छह बजे तक जारी रही.

एस सी हिल के शब्दों में , 'जिन सैनिकों को इन कैदियों की निगरानी के लिए रखा गया था, उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ी कि वो सो रहे नवाब को जगा कर उनका हाल उन्हें बताते. जब सिराजुद्दौला खुद जागे और उन्हें इन कैदियों का हाल बताया गया तो उन्होंने कोठरी का दरवाज़ा खोलने का आदेश दिया. जब दरवाज़ा खोला गया तो 146 कैंदियों में से सिर्फ़ 23 कैदी ही मरणासन्न हालत में जीवित बाहर आए.'

शवों को पास में एक साथ गड्ढ़ा खोद कर बिना किसी रसम के दफ़ना दिया गया.

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सुरक्षाकर्मी को रिश्वत देने की कोशिश

हॉलवेल ने लिखा कि सिर्फ़ एक बूढ़े सुरक्षाकर्मी ने उनके प्रति थोड़ी दया दिखाई.

'मैंने उससे विनयपूर्वक कहा कि वो आधे लोगों को दूसरे कमरे में बंद कर हमारी मुसीबतों को थोड़ा कम कर दे. इस दया के बदले मैं तुम्हें सुबह एक हजार रुपए दूँगा. उसने वादा किया कि वो कोशिश करेगा. लेकिन थोड़ी ही देर में उसने लौट कर बताया कि ऐसा करना संभव नहीं है. मैंने फिर देने वाली रकम बढ़ा कर दो हज़ार कर दी. वो दूसरी बार ग़ायब हो गया लेकिन फिर लौट कर उसने कहा कि इसे नवाब के आदेश के बिना पूरा नहीं किया जा सकता और किसी में हिम्मत नहीं है कि वो नवाब को जगा दे.'

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दम घुटने से मौत हुई

रात नौ बजे जब लोगों को प्यास लगनी शुरू हुई तो हालात और ख़राब होने लगे.

एक बूढ़े सैनिक को उन पर थोड़ी दया आई. वह एक मुश्क में थोड़ा पानी ले आया. खिड़की की सलाखों के ज़रिए उसने पानी अंदर पहुंचाया.

हॉलवेल आगे लिखते हैं, 'मैं आपको कैसे बताऊँ कि मेरे ऊपर क्या गुज़र रही थी. कुछ लोगों ने जो दूसरी खिड़की पर खड़े हुए थे, पानी की आस में वो खिड़की छोड़ दी. वो इतनी तेज़ी से पानी की तरफ़ भागे कि रास्ते में उन्होंने कई लोगों को कुचल दिया. मैंने देखा कि थोड़े से पानी ने उनको सुकून देने के बजाए उनकी प्यास बढ़ा दी थी. हर तरफ़ 'हवा हवा' की आवाज़ गूँज रही थी. फिर उन लोगों ने ये सोच कर सौनिकों को भला बुरा कह कर भड़काना शुरू कर दिया कि वो लोग गुस्से में उनपर गोलियाँ चला कर उनकी दुर्गति को हमेशा के लिए ख़त्म कर देंगें. लेकिन साढ़े ग्यारह बजते बजते उनकी सारी ताकत ख़त्म हो चुकी थी. गर्मी से उनका दम घुट रहा था और वो एक दूसरे पर गिर कर दम तोड़ने लगे थे. '

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याद में बना स्मारक

हॉलवेल ने बाद में उन मृत लोगों की याद में वहाँ एक स्मारक बनवाया.

कुछ सालों बाद बिजली गिरने से इसे बहुत नुकसान पहुंचा. ईंट से बने इस स्मारक को 1821 में फ़ोर्टविलियम के उस समय के गवर्नर जनरल फ़्राँसिस हैस्टिंग्स ने गिरवा दिया.

1902 में वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने काल कोठरी से थोड़ी दूर डलहोज़ी स्कवायर (आज के बिनोय, बादल, दिनेश बाग़) में इन लोगों की याद में संगमरमर का एक और स्मारक बनवाया.

लोगों की माँग पर 1940 में इसे सेंट जॉर्ज चर्च के प्रांगण में शिफ़्ट कर दिया गया जहाँ ये आज भी मौजूद है. कुछ इतिहासकारों ने हॉलवेल द्वारा दिए गए विवरण पर सवाल उठाए हैं. एस सी हिल ने लिखा है, 'हॉलवेल द्वारा बताए गए 123 मृत लोगों में से हमें सिर्फ़ 56 लोगों के रिकॉर्ड मिलते हैं.'

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मरने वालों की संख्या बढ़ाचढ़ा कर पेश करने का आरोप

भारत के मशहूर इतिहासकार जदुनाथ सरकार का मानना है कि हॉलवेल ने अपने विवरण में मरने वालों की संख्या को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया था.

सरकार अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ बंगाल' में लिखते हैं, 'ये देखते हुए कि बहुत से अंग्रेज़ इस लड़ाई में मारे गए थे सिराजुद्दौला के हाथ इतने अधिक अंग्रेज़ लगने का सवाल नहीं उठता. बाद में एक ज़मींदार भोलानाथ चंद्रा ने 18 गुणा 15 फ़िट के क्षेत्र में बाँस का घेरा बना कर लोगों को इकट्ठा किया था. वो संख्या 146 से कहीं कम पाई गई थी. हॉलवेल के विवरण में उन सभी लोगों को काल कोठरी में मरा हुआ दिखाया गया था जो पहले ही या तो लड़ते हुए मारे गए थे या जिनके जीवित रहने या बच निकलने के बारे में कोई रिकार्ड बचा नहीं था.'

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मशहूर इतिहासकार विलियम डेलरिंपिल अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब 'द एनार्की' में लिखते हैं, 'हाल ही में किए गए शोध के अनुसार काल कोठरी में 64 लोगों को रखा गया था जिसमें 21 लोगों की जान बच गई थी. इस घटना के 150 साल बाद भी इसे ब्रिटिश स्कूलों में भारतीय लोगों की नृशंसता के उदाहरण के तौर पर पढ़ाया गया. लेकिन ग़ुलाम हुसैन ख़ाँ समेत तत्कालीन इतिहासकारों के लेखन में इस घटना का कोई विवरण नहीं मिलता.'

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अंग्रेज़ों में नाराज़गी

इतिहास के पन्नों में इस घटना को जितना बढ़ाचढ़ा कर पेश किया गया हो लेकिन इसका भरपूर इस्तेमाल ब्रिटिश राष्ट्रवाद को बढ़ाने में किया गया.

रॉबर्ट क्लाइव ने 7 अक्तूबर, 1756 को सांसद विलियम मॉबट को एक पत्र में लिखा, 'इस घटना को सुनकर हर सीना दुख, दहशत और नाराज़गी से भर गया है. ये नाराज़गी ख़ासतौर से सिराजुद्दौला के प्रति है जिसने कलकत्ता को हमसे छीना है और जो हमारे देशवासियों का हत्यारा है. जिस आसानी से कलकत्ता पर कब्ज़ा किया गया उससे भी हमारा घोर अपमान हुआ है.'

ब्रिटिश हल्कों में हर जगह यही भावना घर कर गई थी कि ब्रिटिश सम्मान की वापसी होनी चाहिए और इस घटना का बदला लिया जाना चाहिए. निकोलस डर्क्स ने अपनी किताब 'कास्ट्स ऑफ़ माइंड कोलोनियलिज़्म एंड मेकिंग ऑफ़ म़ॉडर्न इंडिया' में लिखा, 'ब्लैक होल यानि काल कोठरी एक किंवदंति बन गई और इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के बहादुर व्यापारियों पर भारत में रहने वाले लोगों के अत्याचार के रूप में दिखाया गया. घटना के एक साल बाद इसकी खबर लंदन पहुंची वो भी तब जब हॉलवेल ख़ुद पानी के जहाज़ से वहाँ पहुंचे. बाद में 1757 में नवाब सिराजुद्दौला पर हमला करने के लिए इस घटना का बहाना बनाया गया.'

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हॉलवेल द्वारा दिए गए विवरण पर सवाल

बाद में एच एच डॉडवेल ने अपनी 'किताब क्लाइव इन बंगाल 1756-60' में लिखा, 'हॉलवेल, कुक और जिन दूसरे लोगों ने इस घटना के बारे में लिखा, उनके विवरण मनगढ़ंत थे. इनमें से अधिक्तर लोग फ़ोर्टविलियम पर हुए हमले में मारे गये थे.'

निकोलस डर्क्स ने लिखा, 'ब्लैक होल घटना के कुल 14 विवरणों में एक को छोड़ कर सभी विवरणों का स्रोत ह़ॉलवेल का लेख है जबकि 14 वाँ विरण घटना के सोलह साल बाद लिखा गया था.'

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गंभीर इतिहासकारों को काल कोठरी की इस घटना पर संदेह है. उनका मानना है कि ये लोग काल कोठरी में दम घटने से नहीं बल्कि लड़ाई में मारे गए थे.

एक और इतिहासकार विन्सेंट ए स्मिथ ने अपनी किताब 'ऑक्सफ़र्ड हिस्ट्री आफ़ इडिया फ़्रॉम अरलियर टाइम्स टू द एंड ऑफ़ 1911' में लिखा, 'घटना हुई ज़रूर थी, लेकिन कुछ विवरणों में असंगतियाँ पाई जाती हैं. इस क्रूरता के लिए नवाब सिराजुद्दौला निजी और प्रत्यक्ष रूप से ज़िम्मेदार नहीं थे. उन्होंने कैदियों के साथ क्या सलूक किया जाए, इसको अपने मातहतों पर छोड़ दिया था. उन्होंने इन कैदियों को उस छोटे से कमरे में रखने का आदेश अपने मुँह से नहीं दिया था लेकिन यह भी तथ्य है कि उन्होंने न तो अपने मातहतों को इस नृशंसता के लिए सज़ा दी और न ही इस पर कभी दुख प्रकट किया.'

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ब्रिटिश साम्राज्यवाद को सही ठहराने की कोशिश

काल कोठरी की इस घटना को भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विस्तार का न सिर्फ़ प्रमुख कारण बताया गया बल्कि इसके आधार पर भारत में ब्रिटिश शासन को जायज़ ठहराने की कोशिश भी हुई.

लेकिन जैसे जैसे ब्रिटिश शासन का सूरज अस्त होता गया, ये घटना भी इतिहास के गर्त में समाती चली गई. इस घटना के एक साल के भीतर रॉबर्ट क्लाइव ने न सिर्फ़ कलकत्ता पर दोबारा कब्ज़ा किया बल्कि प्लासी की लड़ाई में सिराजुद्दौला को हरा कर भारत में अंग्रेज़ी शासन की नींव रखी.

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