एक चींटी की कीमत 21 हज़ार रुपये, इन चींटियों का क्या करते हैं तस्कर

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- Author, वाइक्लिफ मुइआ
- पदनाम, नैरोबी, कीनिया
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
कीनिया में इस वक्त चींटियों की भरमार है.
बारिश के मौसम में गिलगिल नाम के एक छोटे से कस्बे के आसपास हज़ारों बांबियों (चींटियों के घर) से चींटियों के झुंड निकलते हुए देखे जा सकते हैं.
यह कस्बा कीनिया की रिफ्ट वैली में है और अब एक बड़े ग़ैरक़ानूनी धंधे का केंद्र बन गया है.
इस मौसम में नर चींटियों के पंख निकल आते हैं और वो रानी चींटी के साथ मिलन के लिए उड़ते हैं. रानी चींटी भी इसी वक्त उड़ती है. यही वो सही समय होता है जब लोग रानी चींटियों को पकड़ते हैं और तस्करों को बेचते हैं.
दुनिया भर में एक बड़ा काला बाज़ार चल रहा है जहां लोग शौक के तौर पर चींटियों को शीशे के बक्सों में रखते हैं और उन्हें घर बनाते हुए देखते हैं.
सबसे ज़्यादा मांग 'बड़ी अफ्रीकन हार्वेस्टर' रानी चींटी की है. यह बड़ी और लाल रंग की होती है. आमतौर पर ऑनलाइन चलने वाले काले बाज़ार में एक रानी चींटी की क़ीमत 220 डॉलर यानी करीब 21 हज़ार रुपए तक हो सकती है.
एक अकेली गर्भवती रानी चींटी पूरी कॉलोनी बना सकती है और कई बरस तक ज़िंदा रह सकती है. इसे पार्सल करना भी आसान है, क्योंकि एयरपोर्ट के स्कैनर आमतौर पर जीवित जीवों को पकड़ नहीं पाते.
अपना नाम ना बताने की शर्त पर एक शख्स ने बीबीसी को बताया कि "पहले तो मुझे पता भी नहीं था कि यह ग़ैरक़ानूनी है." यह व्यक्ति पहले बिचौलिए का काम करता था, जो विदेशी खरीदारों को चींटी पकड़ने वाले स्थानीय लोगों से मिलाता था.
इन चींटियों का वैज्ञानिक नाम मेसर सेफालोट्स है. ये मूल रूप से पूर्वी अफ्रीका में पाई जाती हैं. इनकी ख़ासियत यह है कि ये बीज इकट्ठा करती हैं, इसलिए चींटी पालने के शौकीन लोगों में इनकी बड़ी मांग है.
इस शख्स ने बताया, "एक दोस्त ने कहा कि कोई विदेशी व्यक्ति उन रानी चींटियों के लिए अच्छे पैसे दे रहा है जो यहां आसानी से मिल जाती हैं."
"हम सुबह- सुबह, धूप निकलने से पहले खुले मैदानों के पास बांबियां ढूंढते थे. विदेशी खुद कभी खेतों में नहीं आते थे. वो शहर में किसी गेस्ट हाउस या गाड़ी में बैठे रहते थे. हम चींटियों को उनकी दी हुई छोटी नलियों और सिरिंज में भरकर उन तक पहुंचाते थे."

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कीनिया में इस ग़ैरक़ानूनी धंधे की असली तस्वीर तब सामने आई जब पिछले साल नैवाशा के एक गेस्टहाउस में 5 हजार जायंट हार्वेस्टर रानी चींटियां ज़िंदा पकड़ी गईं.
कीनिया वाइल्डलाइफ सर्विस (केडब्ल्यूएस) के मुताबिक पकड़े गए संदिग्ध बेल्जियम, वियतनाम और कीनिया के थे. वे टेस्ट ट्यूब और सीरिंज में गीली रूई भरकर चींटियां रखते थे. इस तरह हर चींटी दो महीने तक ज़िंदा रह सकती थी. इन्हें यूरोप और एशिया ले जाकर बेचने की योजना थी.
चींटियों का यह धंधा वैज्ञानिकों और अधिकारियों दोनों के लिए हैरानी की बात है. कीनिया में आमतौर पर हाथी दांत और गैंडे के सींग की तस्करी जैसे बड़े मामले सामने आते थे लेकिन चींटियों की तस्करी किसी ने नहीं सोची थी.
'एंट्स आर अस' नाम की एक ब्रिटिश दुकान इस चींटी को 'कई लोगों की ड्रीम स्पेशीज़' कहती है. फिलहाल रानी चींटियां उनकी दुकान पर उपलब्ध नहीं हैं. दुकान का कहना है कि इन्हें ढूंढना बहुत मुश्किल है.
कीनिया के जीवविज्ञानी डिनो मार्टिंस कीट-विशेषज्ञ (एंटोमोलॉजिस्ट) हैं. वे कहते हैं, "मैं खुद भी इस व्यापार की इतनी बड़ी पहुंच देखकर हैरान हूं,"
कीनिया में करीब 600 तरह की चींटियां पाई जाती हैं, लेकिन वो यह भी समझते हैं कि लोग इन चींटियों की तरफ क्यों खिंचते हैं. इनकी रानी "फाउंड्रेस क्वीन" कहलाती है.
यह 25 मिलीमीटर (करीब एक इंच) तक बड़ी हो सकती है और पूरी ज़िंदगी अंडे देती रहती है.
मार्टिंस कहते हैं, "ये चींटियों की सबसे रहस्यमयी और दिलचस्प प्रजातियों में से एक हैं. ये बड़ी कॉलोनी बनाती हैं. इनका व्यवहार देखने लायक होता है और इन्हें पालना आसान है. ये आक्रामक भी नहीं होतीं."
रानी चींटी कई नर चींटियों के साथ मिलन करती है. मार्टिंस कहते हैं, "उसके बाद नर चींटियों का काम खत्म हो जाता है. उनमें से ज़्यादातर को शिकारी खा लेते हैं या फिर वे मर जाते हैं. इसके बाद रानी चींटी एक छोटी सुरंग खोदती है और अंडे देकर अपनी कॉलोनी बनाना शुरू करती है."
इस काम में रानी की मदद करने वाली सभी चींटियां मादा होती हैं और आगे चलकर इनकी संख्या लाखों तक पहुंच जाती है.

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मार्टिंस बताते हैं, "एक कॉलोनी 50 से 70 साल तक जी सकती है. कीनिया की राजधानी नैरोबी के पास कुछ बांबियां ऐसी हैं जिन्हें मैं 40 साल से देख रहा हूं."
यानी रानी भी उतने ही साल जीती है. जैसे ही रानी चींटी मरती है, पूरी कॉलोनी बिखर जाती है और बची हुई चींटियां कोई दूसरी बांबी यानी घर ढूंढने लगती हैं.
कीनिया के जो किसान चींटियों से परेशान रहते हैं, वो यह बात अच्छी तरह जानते हैं. कॉलोनी खत्म करनी हो तो रानी को ढूंढना पड़ता है, जो बांबी की गहरी सुरंगों में छिपी रहती है.
पूर्व बिचौलिए ने बताया कि बांबी को थोड़ा हिलाओ तो चींटियां बाहर निकलने लगती हैं. ऐसा करने पर उन्हें पकड़ना आसान होता है.
उन्होंने बताया, "जब मैंने न्यूज़ में देखा कि लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है, तब मुझे समझ में आया कि मैं क्या कर रहा था. इसके तुरंत बाद मैंने वह काम छोड़ दिया."
पकड़े गए लोगों पर 'बायोपाइरेसी' का मुकदमा चला. आसान भाषा में इसका मतलब किसी देश के जीवों या प्राकृतिक संसाधनों की ग़ैरक़ानूनी चोरी करना है.
दो हफ्ते पहले नैरोबी के जोमो केन्याटा एयरपोर्ट पर एक चीनी नागरिक को पकड़ा गया. वह पिछले साल की तस्करी का कथित मास्टरमाइंड था.
वह अलग पासपोर्ट की मदद से देश छोड़कर भागा था. उसके पास 2 हजार रानी चींटियां थीं, जिन्हें टेस्ट ट्यूब और टिशू रोल में पैक किया हुआ था.

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झेंगयांग वांग साल 2023 में चीन में चींटियों के व्यापार पर एक रिपोर्ट लिख चुके हैं. वे इस धंधे को बेहद ख़तरनाक मानते हैं. उनका कहना है कि यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम को 'तबाह' कर सकता है.
वांग सिचुआन विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वे कहते हैं, "पहले हम खुश थे कि लोग चींटियां पाल रहे हैं. चींटियों को एक पारदर्शी प्लास्टिक बक्से में रखा जाता है जिसे 'फार्मिकेरियम' कहते हैं.
"लोग उन्हें सुरंग खोदते, खाना इकट्ठा करते और रानी की रखवाली करते देख सकते हैं. यह काफी रंगीन शौक है और कीड़ों के बारे में जानने का अच्छा तरीका भी है."
वे कहते हैं, "लेकिन फिर हमें अहसास हुआ कि रुको, क्या किसी दूसरे देश की प्रजाति को पालना ख़तरनाक नहीं है? यानी जो चींटी जहां की नहीं है, उसे वहां लाना पर्यावरण के लिए बड़ा ख़तरा बन सकता है."
शोधकर्ताओं ने छह महीने तक चीन में ऑनलाइन बिक्री पर नज़र रखी. उन्होंने पाया कि 58 हजार से ज़्यादा कॉलोनियां बिकी थीं. इनमें से एक चौथाई से ज़्यादा प्रजातियां चीन की नहीं थीं, जबकि उन्हें देश में लाना गैरकानूनी है.
वांग चेतावनी देते हुए कहते हैं, "यह बात तय है कि अगर यह धंधा इसी तरह बढ़ता रहा तो एक दिन कुछ चींटियां अपने बक्सों से निकल जाएंगी और जंगल में फैल जाएंगी. बस बात वक्त की है."

बायोलॉजिकल कंजर्वेशन जर्नल में छपी इस स्टडी में बताया गया कि अगर अफ्रीकी हार्वेस्टर चींटी चीन में फैल गई तो क्या होगा. यह दुनिया की सबसे बड़ी बीज-संग्रह करने वाली चींटियों में से है और दक्षिण-पूर्वी चीन की अनाज आधारित खेती को बर्बाद कर सकती है.
कीनिया में भी पर्यावरण को लेकर चिंता है. मार्टिंस कहते हैं, "हार्वेस्टर चींटियां इकोसिस्टम की नींव हैं. ये घास और पौधों के बीज इकट्ठा करती हैं और उन्हें फैलाने में भी मदद करती हैं. इस तरह ये घास के मैदानों को हरा-भरा और जीवंत बनाए रखती हैं."
कीनिया के वाइल्ड रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक मुकोन्यी वताई भी इसी डर की बात करते हैं. वे कहते हैं, "अगर रानी चींटिया बेहिसाब तरीके से पकड़ी जाती रहीं तो पूरी कॉलोनियां खत्म हो जाएंगी, जिससे इकोसिस्टम बिगड़ जाएगा और जैव विविधता को ख़तरा होगा."
कीनिया में चींटियां कानूनी तरीके से भी इकट्ठा की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए खास परमिट लेना होता है. इसमें स्थानीय समुदाय के साथ मुनाफा साझा करने का समझौता भी करना होता है.
केडब्ल्यूएस के मुताबिक अब तक किसी ने भी ऐसा परमिट नहीं मांगा है, जबकि इसके लिए यह भी बताना होता है कि कितनी चींटियां कहां भेजी जाएंगी.

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कुछ पर्यावरणविद अब मांग कर रहे हैं कि सभी चींटियों को दुनिया भर के वन्यजीव व्यापार को नियंत्रित करने वाली संधि कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज में शामिल किया जाए.
शोधकर्ता सेर्जियो हेन्रिक्स बताते हैं, "सच्चाई यह है कि अभी कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज में कोई भी चींटी प्रजाति सूचीबद्ध नहीं है."
वे कहते हैं, "जब तक कोई अंतरराष्ट्रीय संधि इस पर नज़र नहीं रखती, इस व्यापार की असली तस्वीर दुनिया की सरकारों और जनता से छुपी रहेगी."
केडब्ल्यूएस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कीड़ों की तस्करी अक्सर रिपोर्ट ही नहीं होती. उनका सुझाव है कि एयरपोर्ट और सीमाओं पर बेहतर जांच उपकरण लगाए जाएं.
मार्टिंस भी मानते हैं, "जितनी चींटियां पकड़ी जाती हैं, वो असली व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा है. इस धंधे की पूरी तस्वीर का अभी सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है."
पत्रकार चार्ल्स ओनयांगो-ओब्बो का नज़रिया कुछ अलग है. वे कहते हैं कि कीनिया के सामने यह एक बड़ा मौका है जिससे वह अच्छा पैसा कमा सकता है.
कीनिया के अखबार डेली नेशन में उन्होंने लिखा, "चींटियां सोने या हीरे जैसी सीमित चीज़ नहीं हैं. इन्हें रोज़ाना हजारों की संख्या में पाला जा सकता है. बावजूद इसे हम चोरी के सामान की तरह देखते हैं."
कीनिया की सरकार ने पिछले साल ऐसी नीतियां मंज़ूर की हैं जो चींटियों सहित वन्यजीव व्यापार को कानूनी और व्यापारिक रूप देने की दिशा में हैं.
मुकोन्यी वताई कहते हैं, "इन नीतियों का मकसद चींटियों जैसी वन्य प्रजातियों का टिकाऊ तरीके से व्यापार करना है. इससे नौकरियां, आमदनी और स्थानीय समुदायों को रोज़ी-रोटी मिलने में मदद होगी."
अगर निगरानी सही हो तो हो सकता है कि गिलगिल के रहने वाले किसान एक दिन अपनी फसल के साथ-साथ खास बक्सों में रानी चींटियां भी पालने लगें और यह उनकी कमाई का एक अच्छा ज़रिया बन जाए.
लेकिन यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है कि क्या दुनिया भर के शौकीनों को चींटियां बेचना सही है या ख़तरनाक? इसका जवाब अभी बाकी है.
इस रिपोर्ट में सिंगापुर से ओस्मोंड चिया ने भी सहयोग किया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































