कोरोना: क्या भारत के लिए ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन, दूसरे विकल्पों से बेहतर है?

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भारत में कोरोना के बिगड़ते हालात पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की.

इस बैठक में उन्होंने कोरोना से लड़ाई में 'टेस्ट, ट्रेस और आईसोलेट' के मूल मंत्र को फिर से दोहराया. इसके अलावा वैक्सीन पर एक प्रेज़ेंटेशन भी राज्यों के साथ साझा की गई.

उन्होंने कहा, "कोरोना वैक्सीन को लेकर दुनिया भर से ख़बरें आ रही हैं. दुनिया में और हमारे देश में भी कई वैक्सीन रिसर्च का काम आख़िरी स्टेज में पहुँचा है. भारत सरकार हर डेवेलपमेंट पर नज़र रखे हुए है. उनसे सम्पर्क में भी है. अभी ये तय नहीं है कि वैक्सीन की एक डोज़ होगी, दो डोज़ होगी या तीन डोज़ होगी. ये भी तय नहीं है कि इस वैक्सीन की क़ीमत कितनी होगी, उस वैक्सीन की क़ीमत कितनी होगी."

"यानी इन सभी सवालों के जवाब हमारे पास नहीं हैं. जो इसके बनाने वाले हैं उनमें सरकारें भी हैं, कॉरपोरेट वर्ल्ड भी है, अलग-अलग प्रतिस्पर्धा है, देशों के भी अपने-अपने राजनयिक हित भी हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी इंतज़ार करना पड़ता है. इसलिए वैश्विक संदर्भ में ही हमें भी आगे बढ़ना पड़ेगा."

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दरअसल सोमवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कोरोना वैक्सीन को लेकर चार सवाल पूछे थे. उन्होंने लिखा था कि

•भारत सरकार किस कोरोना वैक्सीन कैंडिडेट को चुन रही है और क्यों?

•किन लोगों को वैक्सीन लगाने में प्राथमिकता दी जाएगी और कैसे वैक्सीन को लोगों तक पहुँचाया जाएगा?

•क्या पीएम केयर्स फ़ंड का इस्तेमाल मुफ़्त टीकाकरण के लिए किया जाएगा?

•कब तक भारत के सभी लोगों का टीकाकरण संभव हो पाएगा?

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कोरोना वैक्सीन पर प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?

इनमें से पीएम केयर्स फ़ंड के सवाल के अलावा प्रधानमंत्री ने दूसरे सभी सवालों का जवाब मंगलवार की बैठक में दिया है.

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक़ भारत सरकार ने फ़िलहाल किसी कोरोना वैक्सीन के कैंडिडेट को नहीं चुना है.

वैक्सीन किसको पहले लगेगी, इसका मोटा ख़ाका तैयार है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन और राज्य सरकारों से बातचीत के बाद ही फ़ाइनल ड्राफ़्ट तैयार होगा. इसके पहले भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन कह चुकें हैं कि हेल्थ वर्कर्स और 65 साल से अधिक उम्र वालों को कोरोना के टीकाकरण अभियान में प्राथमिकता दी जाएगी.

उन्होंने ये भी बताया कि टीकाकरण का अभियान लंबा चलने वाला है. कुछ जानकारों की राय में इसमें कई साल लग सकते हैं. लेकिन सब कुछ वैक्सीन आने और उसके कारगर होने, उसके कितने डोज़ की ज़रूरत पड़ेगी, इन सब बातों पर निर्भर करता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये भी साफ़ किया कि वैक्सीन के लिए स्पीड भी ज़रूरी है और सेफ्टी भी. इसलिए जो भी वैक्सीन भारत सरकार अपने नागरिकों को देना तय करेगी, वो सभी वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरेगी.

इस समय वैक्सीन की रेस में दो भारतीय वैक्सीन आगे चल रहे हैं, जिनमें से एक भारत बायोटेक और आईसीएमआर के साथ मिल कर बनाई जा रही कोवैक्सीन है. दूसरे देशों में जो प्रयास चल रहे हैं उनमें से ऑक्सफ़ोर्ड की एस्ट्राजेनेका वैक्सीन पर भारत सरकार का सबसे बड़ा दाँव लगा है.

हालाँकि केंद्र सरकार ने खुल कर इस बारे में कभी नहीं कहा कि उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड की एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के लिए अब तक कोई क़रार किया है या नहीं या फिर वैक्सीन के लिए ऑर्डर भी दिए हैं या नहीं.

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ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन क्या भारत के लिए सबसे बेहतर है?

भारत अब तक जिन वैक्सीन के शुरुआती नतीजे सामने आई है, उनमें से ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन सबसे उपयुक्त मानी जा रही है, जानकार इसके पीछे तरह तरह की दलीलें दे रहे हैं. जैसे -

ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन को स्टोर करना आसान है

भारत सरकार अगर ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन ख़रीदने का फ़ैसला करती है, तो भारत सरकार को वैक्सीन स्टोर करने के लिए अलग से बहुत मशक्क़त नहीं करनी पड़ेगी. ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन को नार्मल फ्रिज़ कंडीशन में स्टोर किया जा सकता है. जबकि फ़ाइज़र और मॉडर्ना वैक्सीन के लिए अलग से कोल्ड स्टोरेज पर काम करना होगा. इन दोनों वैक्सीन को माइनस 20 से माइनस 70 डिग्री के तापमान की ज़रूरत पड़ेगी.

भारत ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन ख़रीदेगा तो वैक्सीन और पैसों की बर्बादी कम होगी

अगर स्टोरेज के तरीक़े बहुत ही स्पेसिफिक होते हैं, तो वैसी सूरत में ग़लत तरीक़े से रखने पर वैक्सीन की बर्बादी की आशंका बढ़ जाती है. किसी भी कारण से वो तापमान नहीं मिल पाया तो वैक्सीन की पूरी खेप बर्बाद हो सकती है. इससे वैक्सीन के साथ-साथ पैसों की भी बर्बादी होगी.

ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन की क़ीमत भारत के हिसाब से कम है

सब जानते है कि ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन के साथ भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ने उत्पादन के लिए क़रार किया है. किसी दूसरे देश में बनने वाली वैक्सीन भारत में बनने वाली वैक्सीन से हर हाल में सस्ती पड़ेगी. भारत की जनसंख्या के हिसाब से वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने में सरकार सफल होंगी. भारत में वैक्सीन बनाने का फ़ायदा इस तरह से भी मिल सकता है कि वैक्सीन दूसरे देशों के मुक़ाबले भारत सरकार को पहले मिले.

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ऊपर लिखे दावों में कितना दम है?

लेकिन आईसीएमआर के साथ पूर्व में जुड़े वैज्ञानिक रमन गंगाखेडकर कहते हैं, "आज की तारीख़ में उपलब्ध डेटा के आधार पर ये कहना बहुत ही मुश्किल है कि भारत सरकार किस वैक्सीन को ख़रीदेगी."

"अभी तक जिन तीन-चार वैक्सीन के शुरुआती ट्रायल के नतीजे सामने आए हैं, वो ये बताने के लिए काफ़ी नहीं हैं कि वो वैक्सीन सुरक्षित हैं. वैक्सीन इस्तेमाल के लिए सुरक्षित है इसका पता कम से कम छह महीने के फॉलो-अप के बाद ही चलता है. अभी तक किसी वैक्सीन के फ़ाइनल ट्रायल को छह महीने नहीं हुए हैं. हर दूसरी वैक्सीन आज दावा कर रही है कोरोना से बचाव में वो 90 फ़ीसद सफल है, कोई 95 फ़ीसद सफल है. लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नतीजे बहुत कम दिनों के आधार पर निकले हैं. समय बीतने के साथ इस दर में कमी आना स्वाभाविक है."

रमन गंगाखेडकर फ़िलहाल पुणे के सीजी पंडित नेशनल चेयर से जुड़े हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "समय बीतने के साथ वैक्सीन लगाने के बाद भी लोग वायरस के सामने एक्सपोज़ होंगे, तब असल में पता चलेगा कि वैक्सीन कितने वक़्त के लिए कारगर है."

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इसलिए हमें हर वैक्सीन कैंडिडेट के फ़ाइनल रिपोर्ट का इंतज़ार करना होगा. इतना ज़रूर है कि ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन के तीसरे फ़ेज़ का ट्रायल फ़ाइज़र और मॉडर्ना के मुक़ाबले ज़्यादा दिनों तक चला. लेकिन औसतन कितने दिन तक वॉलेंटियर का फॉलो-अप किया गया, ये अभी भी साफ़ नहीं है.

रमन गंगाखेडकर कहते हैं, आज की तारीख़ में ये कहना कि ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन ही भारत के लिए सबसे अच्छी है, ये ऐसा ही है कि चुनाव से पहले अख़बार में उम्मीदवारों की स्टोरी पढ़ कर ये बता दें कि जीत किसकी हुई है. इस समय में ऐसा कुछ भी कहना बेमानी है.

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