क्या गोरखपुर को याद है अमृता शेरगिल और विक्टर की प्रेम कहानी?

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गोरखपुर से

गोरखपुर के मुहाने पर बसे कुसमी जंगल के बीच से गुज़रते वक़्त साल के ऊँचे पेड़ों से छन कर सड़क पर गिरती धूप की आंखमिचौनी ज़हन में एक मायावी दुनिया का आभास कराती है.

शहर से 25 किलोमीटर आगे, सर्दियों की धुंध में डूबे साल के इन कतारबद्ध पेड़ों का सघन विस्तार और गन्ने के खेतों को पार करते हुए हम सरदारनगर पहुंचते हैं. मेरे लिए कुसमी के जंगलों से शुरू हुआ एक विस्मयकारी मायावी दुनिया का सफ़र सरदारनगर के 'मजेठिया एस्टेट डिस्पेंसरी' नामक एक छोटे से स्थानीय अस्पताल तक जारी रहता है.

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इमेज कैप्शन, मजेठिया इस्टेट डिस्पेंसरी

सरदारनगर की कलात्मक विरासत का सिरा इसी अस्पताल से खुलना शुरू होता है. बहुत कम लोगों को मालूम होगा की 'सराया' नाम से भी पहचाने जाने वाले इस छोटे से क़स्बे में बीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली मौलिक चित्रकारों में शुमार मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल 2 साल तक रही थीं.

भारत में आधुनिक कला की पुरोधा और हिंदुस्तान की अपनी 'फ्रीडा काहलो' के तौर पर भी पहचानी जाने वाली अमृता ने दिसंबर 1939 से सितम्बर 1941 तक का वक़्त इस छोटे से गांवनुमा कस्बे में अपने पति डॉ. विक्टर एगान के साथ गुज़ारा था.

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इमेज कैप्शन, 'द ब्राइड' नाम की ये पेंटिंग अमृता ने गोरखपुर में बनाई थी

गोरखपुर में भी रही थीं अमृता

आज से 105 वर्ष पहले 30 जनवरी को बुडापेस्ट में डेन्यूब नदी के किराने अमृता का जन्म हुआ. पेरिस से लेकर बुडापेस्ट, शिमला और लाहौर तक में उनके रहने, पढ़ने और चित्रकारी करने से जुड़े कई प्रकाशित संस्मरण मौजूद हैं. पर सरदारनगर में उनके दो साल के इस प्रवास के बारे में सार्वजानिक जानकारी लगभग न के बराबर उपलब्ध है. इसलिए उनके जन्मसप्ताह के मौके पर गोरखपुर से 'सराया' की यह यात्रा मेरे लिए अमृता से जुड़ी एक अनजान तालेबंद दुनिया के रहस्यों की चाबी बन गई.

सराया गांव में इस दो वर्षीय प्रवास का अमृता के कलात्मक जीवन में निर्णायक महत्व रहा है. यहां रहते हुए उन्होंने 'वीमेन ऑन द चारपॉय', 'द ब्राइड', 'स्विंग', 'रेस्टिंग', 'लेडीज़ एन्क्लोज़र' और 'मदर इंडिया' समेत अपने कलात्मक जीवन के कई महत्वपूर्ण चित्र बनाए.

अपनी प्रकाशित चिट्ठियों में भी अमृता इस बात का ज़िक्र करती हैं कि प्रांतीय जीवन के हाशिये पर खड़े सराया ने उनके सृजन को एक नई दृष्टि दी है. गोरखपुर के इस गांव में बिखरी अमृता की यादों की तलाश हमारे समय की एक असाधारण चित्रकार की कलात्मक यात्रा के साथ-साथ अमृता और विक्टर की अद्भुत प्रेम कहानी के अनछुए पहलू भी सामने लाता है.

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इमेज कैप्शन, गोरखपुर से सराया के रास्ते में पड़ने वाले कुसमी के जंगल

अमृता के पिता सरदार उमराव सिंह मजेठिया पंजाब के एक पुराने जागीरदार रईस परिवार से थे. मिज़ाज से अभिजात्य उमराव सिंह को पढ़ने-लिखने के साथ साथ फ़ोटोग्राफी का भी बहुत शौक था. अपनी पहली पत्नी के देहांत के बाद उनकी मुलाक़ात हंगेरियन मूल की मारी अंतोएनेत से हुई.

बचपन से ही थीं विद्रोही

उन दिनों भारत यात्रा पर आई हुई मारी खुद एक प्रशिक्षित ओपेरा सिंगर होने के साथ-साथ पियानो बजाने में भी प्रवीण थीं. दोनों में प्रेम हुआ और 1912 में उन्होंने सिख रीति-रिवाजों से लाहौर में शादी कर ली और फिर 30 जनवरी 1913 को अमृता का जन्म हुआ.

अमृता बचपन से ही बहुत संवेदनशील, सृजनात्मक और विद्रोही स्वभाव की थीं. उदाहरण के तौर पर बचपन में उन्हें एक मिशनरी कॉन्वेंट स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि क्लास में धर्म पूछे जाने पर उन्होंने खुद को नास्तिक बताया था. पेंटिंग के साथ-साथ उन्हें संगीत और भाषाएं सीखने का भी शौक था.

उनकी कलात्मक शिक्षा पेरिस के प्रतिष्ठित कला विद्यालय में जाने पहचाने कलाकार प्रोफ़ेसर लुसियन साइमन के निर्देशन में हुई. शिक्षा पूरी होने के बाद जुलाई 1938 में अमृता ने बुडापेस्ट में अपने ममेरे भाई डॉ. विक्टर एगान के साथ विवाह कर लिया. विवाह के बाद अमृता, विक्टर के साथ भारत वापस लौटीं और सराया में बस गईं.

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इमेज कैप्शन, सराया में अमृता के घर का एक हिस्सा

सराया मूलतः अमृता के पिता के परिवार को अंग्रेजों से मिली पुश्तैनी जागीर थी. मजेठिया परिवार ने सराया में तत्कालीन उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्कर मिल बनवाकर फ़ैक्ट्री के आसपास एक पूरा नगर बसा दिया.

सरदारनगर नाम से मशहूर इस छोटी सी औद्योगिक टाउनशिप में शक्कर की फ़ैक्ट्री के साथ-साथ मिल में काम करने वाले कर्मचारियों के रहने के लिए घर, अस्पताल, बाज़ार और मजेठिया परिवार के सदस्यों के रहने के लिए बड़ी-बड़ी आलिशान कोठियां बनवाई गई थीं. इन्हीं में एक कोठी में अमृता और विक्टर रहने लगे.

अमृता दिन भर सराया में घूम-घूम कर ग्रामीण जीवन को देखतीं और पेंट करती. विक्टर ने 'मजेठिया एस्टेट डिस्पेंसरी' के नाम से बनवाए गए सराया टाउनशिप के अस्पताल में प्रमुख डॉक्टर की तरह काम करना शुरू कर दिया. नव दम्पति के लिए यूरोप से सीधे गोरखपुर के इस अलग-थलग गांव में रहना चुनौतीपूर्ण था.

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इमेज कैप्शन, मजेठिया एस्टेट डिस्पेंसरी आज कुछ ऐसी नज़र आती है

दो साल बाद अमृता को लगा कि विक्टर और उनके व्यावसायिक और कलात्मक जीवन के लिए कोई बड़ा शहर ज़्यादा ठीक रहेगा. यही सोचकर दोनों ने लाहौर में रहने का निर्णय किया. 1941 के सितंबर महीने में दोनों सराया छोड़ कर लाहौर रहने तो चले गए पर वहां साल के बाकी तीन महीने भी पूरे नहीं गुज़ार पाए.

लोग विक्टर को जानते हैं, अमृता को नहीं

5 दिसम्बर 1941 को अमृता की तबीयत अचानक बिगड़ी और कुछ ही घंटों में उनकी मृत्यु हो गई. अमृता के बाद विक्टर वापस सराया लौट आए और 1997 में अपनी मृत्यु तक शक्कर मिल के उसी अस्पताल में अपनी प्रैक्टिस करते रहे.

अपनी यात्रा के दौरान मैं सराया में जिन स्थानीय लोगों से मिली उनमें से आधे लोगों के बच्चे डॉ विक्टर के हाथों से पैदा हुए. कई लोगों के रिश्तेदारों ने अस्पताल में उनकी गोद में दम तोड़ा. लेकिन आज सराया में डॉक्टर विक्टर को सब जानते हैं, लेकिन अमृता को कोई नहीं जानता.

विक्टर की मृत्यु के बाद से एक उजाड़ इमारत में तब्दील हो चुके मजेठिया अस्पताल के खंडहरनुमा बरामदों में घूमते हुए मुझे लगा जैसे अमृता और विक्टर के प्रेम की तरह उनसे जुड़ी यादों का चक्र भी सराया और सराया के इस अस्पताल की धुरी के आसपास ही घूमता रहा है.

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद यासीन

तभी मेरी मुलाक़ात अस्पताल के सामने खेल रहे बच्चों के बीच टहल रहे 75 वर्षीय मोहम्मद यासीन से होती है. यासीन ने अपने जीवन के 40 वर्ष मजेठिया परिवार की सेवा में बिताए. वो कहते हैं, "हम डॉक्टर साहब के यहां अस्पताल में भी स्वीपर का काम करते थे और कोठियों पर भी. जहां बोला जाता वहां जाकर काम करते थे".

अमृता के बारे में पूछने पर यासीन की मलीन आखों में अचानक चमक आ जाती है.

"हमारे यहां आने से पहले ही वो गुज़र गई थीं इसलिए हम मिले तो नहीं हैं उनसे, पर उनके बारे में लोगों से बहुत सुना है. बताते हैं कि बहुत भारी चित्र बनाती थीं. आपको देखकर तुरंत आपका फोटो बना देंगी. लोग कहते हैं कि उनके साथ हमेशा दो आदमी चला करते थे. एक उनका ब्रशों से भरा मटका उठाता था तो दूसरा उनके रंग और कागजों के गट्ठर. पूरे सराया में घूम-घूम कर चित्र बनातीं थीं. सुना है बहुत सुन्दर थीं".

यासीन बताते हैं कि उनके 40 साल के कार्यकाल में मजेठिया परिवार के किसी व्यक्ति से उन्होंने कभी अमृता का ज़िक्र नहीं सुना.

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इमेज कैप्शन, यही वो बेंच है जहां बैठकर अमृता पेंट किया करती थीं

कोठी में अमृता की तस्वीरें

अमृता की मृत्यु के दस साल बाद विक्टर ने दूसरा विवाह किया था. उनकी दूसरी पत्नी नीना एगन से जुड़ी एक याद बताते हुए यासीन आगे जोड़ते हैं...

"मैडम ने एक बार हमें उनकी बनाई कुछ तस्वीरें रखने के लिए दी थी. उनमें अमृता के साइन नहीं थे इसलिए. उनकी बनाई बहुत सी तस्वीरें अभी भी कोठियों में बंद करके रखी हुई हैं. पुराने लोग बताते थे कि वो ज़्यादातर औरतों, हाथियों और तालाबों की तस्वीर बनाती थीं. डॉक्टर साहब ने हमारे सामने उनका कभी नाम नहीं लिया. बाकी अब तो गांव में डॉक्टर साहब को जानने वाले भी कम ही बचे हैं. अमृता को जिन्होंने देखा हो वो सब तो दसियों साल पहले गुज़र गए.''

अस्पताल से आगे बढ़ते हुए हम उस कोठी पर पहुंचते हैं जहां अमृता, विक्टर के साथ रहा करती थीं. ताला बंद होने के कारण कोठी के अन्दर तो नहीं जा सके पर स्थानीय मैनेजर ने बताया, ''कोठी में आज भी अमृता की कई तस्वीरें बंद हैं. कोठी के पीछे बने एक बड़े से बागीचे में आज भी वह कुर्सीनुमा सफ़ेद बेंच मौजूद है जहां बैठकर अमृता चित्र बनाया करती थीं.''

ठंडी ओस से भीग चुकी उस सफ़ेद बेंच पर बैठकर मुझे अपने कमरे में लगी अमृता की वह तस्वीर याद आई जिसमें हाथों में ब्रश पकड़े वो एक ऐसे ही बगीचे में बैठकर चित्र बना रही हैं.

सराया में अमृता को देखने और जानने वालों की खोज हमें गोरखपुर शहर के ट्रांसपोर्ट मोहल्ले तक ले गई. यहां रहने वाले तारकेश्वर श्रीवास्तव उर्फ़ तारा बाबू ने लगभग 27 साल सराया में रहकर विक्टर के अस्पताल में उनके सचिव की तरह काम किया था. फ़िलहाल जिगर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे तारा बाबू गोरखपुर में विक्टर के ज़रिए अमृता के जीवन में झांक पाने वाले आख़िरी ज़िंदा आदमी हैं.

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इमेज कैप्शन, तारकेश्वर श्रीवास्तव उर्फ़ तारा बाबू

तारा बाबू के पिता भी मजेठिया परिवार की शक्कर मिल में काम करते थे. अमृता के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, "हमारे पिताजी ने अमृता को देखा था. वो कई बार उनके बारे में बताते हुए कहते कि अमृता शक्कर मिल में आकर भी पेंट किया करती थीं. उनके साथ एक मटका भर के ब्रश होते. वह गांव घूमती और जहां मन हुआ वहां पेंट करना शुरू कर देतीं. डॉक्टर साहब हमारी ही गोद में मरे, इतने साल हमने साथ काम किया. पर उन्होंने अमृता का कभी कोई ज़िक्र नहीं किया."

आगे जोड़ते हुए ताराबाबू कहते हैं, "हाँ, पर एक बात है. डॉक्टर एगन विदेशी थे. अमृता के साथ आये थे यहां. पर उनके बाद वो यहीं रह गए. हिंदी सीख ली. यहीं गांव वालों का इलाज करते-करते जीवन गुज़ार दिया. मैं उनसे कहता भी कि डॉक्टर साहब आप अपने देश क्यों नहीं जाते, एक बार अपने लोगों से मिलने. तो कहते की तारा अब मेरा कौन है वहां. मेरा जो कुछ है वह यहीं सराया में हैं. मुंह से तो कभी नहीं कहा पर आप खुद ही सोचिए. एक विदेशी डॉक्टर इतने छोटे से गांव में पूरा जीवन क्यों बिताएगा?"

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इमेज कैप्शन, सराया का यह रास्ता विक्टर के घर को जाता है

विक्टर और अमृता का रिश्ता

कन्हैयालाल नंदन द्वारा लिखी अमृता की जीवनी के शुरूआती पन्नों में ही विक्टर और अमृता के संबंध पर लेखक ने विस्तार से बात की है.

इस जीवनी के अनुसार अमृता और विक्टर का रिश्ता आपसी समझ, सम्मान और गहरे विश्वास से उपजने वाले प्रेम पर टिका हुआ था. विक्टर अमृता के प्रेम संबंधों और अंतरंग जीवन में कभी हस्तक्षेप नहीं करते थे. अमृता के जीवन पर आई उनकी लगभग सारी जीवनियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि विक्टर ने हर मुश्किल समय में अमृता का साथ दिया.

विक्टर डॉक्टर थे. अपने प्रेम संबंधों के कारण मुश्किल में फंसने पर अमृता का गर्भपात करवाकर उनके इलाज में उनकी मदद भी करते. शायद यही वजह थी कि अमृता को विक्टर पर अटूट विश्वास था.

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इमेज कैप्शन, आख़िरी वक्त तक विक्टर सराया के इसी घर में रहे

कन्हैयालाल नंदन की जीवनी के अनुसार शादी के बाद अमृता ने विक्टर से कहा, "मैं तुम्हारे सिवा और किसी के साथ रहने के बारे में सोच भी नहीं सकती क्योंकि हम दोनों एक दूसरे के साथ ऐसे 'फिट' हैं जिसके बारे में सोचकर मुझे खुद ही ताज्जुब होता है."

जीवनी आगे कहते है कि अमृता की मृत्यु के बाद भी विक्टर उनसे अपनी निकटता को सहेज कर रखना चाहते थे.

"मेरे हिस्से में सिर्फ दो चीज़ें आईं. एक उनकी स्केच बुक और दूसरी उनकी वह सिल्क साड़ी जो उन्हें बहुत पसंद थी. उन्हें पैसे की परवाह कभी नहीं रही, न वह कभी हिसाब रख पाती थीं. जब हम विदेश से हिन्दुस्तान लौट रहे थे तब हमारे पास कुछ जर्मन सिक्के बचे थे. हमने वह सारे सिक्के समंदर में फेंक दिए."

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इमेज कैप्शन, विरान पड़ी मजेठिया इस्टेट डिस्पेंसरी

जीवनी में विक्टर आगे कहते हैं, "उनके मरने के काफी दिनों बाद तक मैं यह सपना देखता रहा कि मैं उसे रोक रहा हूँ...और वह कह रही है कि मुझे जाना होगा... उनके मरने का दिन मुझे ठीक से याद है. रात को जब उन्होंने बार बार उठकर बाथरूम जाना शुरू किया, मैं तभी समझ गया था कि हालत बिगड़ चुकी है. पर मैं क्या करता? आज कि तरह एंटी बायोटिक दवाएं तो थीं नहीं जो उन्हें बचा लेता. वह डूबती चली गई और हम उन्हें डूबते देखने के सिवा कुछ न कर सके".

अमृता की तस्वीरें लोगों को असहज कर देती थीं

अपनी मृत्यु के वक़्त अमृता सिर्फ 28 साल की थीं. पर अपने छोटे से जीवन में उन्होंने अपने काम से भारतीय कला की दुनिया में एक ऐसी मौलिक छाप छोड़ी जिसका समानांतर उनकी मृत्यु के 70 साल बाद भी खड़ा नहीं हो पाया है. पर तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि उनकी कर्मभूमि रहा गोरखपुर का सराया गांव आज उन्हें भुला चुका है.

स्थानीय पत्रकार मनोज कुमार सिंह बताते हैं कि उन्होंने गोरखपुर में रहने वाले अमृता के दूर के रिश्तेदारों से बात करने का कई बार प्रयास किया पर दो बार तो लोग उन्हें समय देकर भी उनसे नहीं मिले.

अमृता के चित्रों में स्त्री की शारीरक बनावट, उसकी उदासी और दुःख के साथ साथ स्त्री की अपनी शारीरिक इच्छाओं को भी एक महिला चित्रकार की दृष्टि से उभारा गया है.

अमृता ने निर्वस्त्र स्त्रियों के कई साहसिक और संवेदनात्मक तौर पर सघन पोर्ट्रेट बनाए. उनके काम के इस पहलू को एक ओर जहां अन्तरराष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली, वहीं भारत में उनके इन चित्रों ने कई लोगों को असहज भी किया.

मनोज बताते हैं कि गोरखपुर में उनके परिवार से दूर की रिश्तेदारी रखने वाले लोग भी अमृता के बारे में बात नहीं करना चाहते. उनका गैर पारंपरिक काम, स्वतंत्र जीने का तरीका और विद्रोही स्वभाव भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक आत्मा पर गहरी चोट करता है.

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इमेज कैप्शन, सराया का वो घर, जहां विक्टर और अमृता साथ रहते थे

विक्टर ने अमृता को बिना शर्त प्रेम किया.

जाते जाते तारा बाबू कहते हैं, "जब डॉक्टर साहब जवान थे तब उन्होंने हंगरी की वायुसेना में कुछ दिन काम किया था. तब ही अमृता ने उनका एक बड़ा सा पोर्टेट बनाया था जिसमें वह वायुसेना की यूनीफ़ॉर्म पहने खड़े हैं. बहुत छोटे लगते हैं देखने में. यह पोर्टेट बुडापेस्ट में ही छूट गया था. पर अमृता के जाने के बाद डॉक्टर साहब ने किसी से कहकर उसे बुडापेस्ट से गोरखपुर तक मंगवाया. तस्वीर आने में थोड़ी खराब हो गई थी तो उसे मरम्मत के लिए दिल्ली भेजा. तीन लाख रूपये लगे थे उस वक़्त तस्वीर को ठीक करवाने में. फिर जब तक डॉक्टर साहब जिंदा रहे, तब तक सिर्फ़ यह एक तस्वीर उनके बेडरूम में टंगी रही.''

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