उपचुनावों के नतीजे क्या कहते हैं ?
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- Author, श्रवण गर्ग
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
सात राज्यों की नौ विधानसभा सीटों के लिए रविवार को हुए उपचुनावों के गुरुवार को प्राप्त हुए परिणामों का बारीकी से विश्लेषण किया जाए तो देश की भविष्य की राजनीति के संकेत मिल सकते हैं.
उपचुनाव परिणामों का सबसे बड़ा संकेत यह है कि भाजपा को न सिर्फ उन्हीं राज्यों में सफलता मिली है जहाँ वर्तमान में उसकी सरकारें हैं, पार्टी ने अन्य स्थानों पर भी अपनी प्रभावकारी उपस्थिति दर्ज कराई है , मसलन दिल्ली और पश्चिम बंगाल में.
भाजपा ने सबसे बड़ा उलटफेर देश की राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की ज़मानत ज़ब्त करवा कर किया है.
भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस भी उत्साहित है कि उसका प्रत्याशी कम-से-कम दूसरे स्थान पर तो पहुँच गया.
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पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में शिकस्त मिलने के बाद दिल्ली में राजौरी गार्डन की पराजय अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को एक बड़ा धक्का देने वाली साबित हो सकती है.
आम आदमी पार्टी का आगे चलकर क्या भविष्य बनेगा इसका पता आने वाले दिनों में एमसीडी के लिए होने वाले चुनावों के बाद पूरी तरह से चल जाएगा.
उपचुनावों का दूसरा महत्वपूर्ण संकेत यह है कि दक्षिण भारत के राज्यों में अपनी जगह बनाने में भाजपा को अभी वक्त लग सकता है.
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कर्नाटक की दोनों सीटों पर कांग्रेस की जीत ने भाजपा के लिए येदुरप्पा की उपयोगिता पर सवाल खड़ा कर दिया है.
कर्नाटक में भाजपा की वापसी आसान नज़र नहीं आती. वहां अगले वर्ष के अंत में चुनाव होने वाले हैं. मध्य प्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम में भी कर्नाटक के साथ ही चुनाव होंगे.
उपचुनाव परिणामों की तीसरी विशेषता पश्चिम बंगाल में भाजपा उम्मीदवार का तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए दूसरे स्थान पर आना और वामपंथी और कांग्रेस उम्मीदवारों की ज़मानतों का ज़ब्त होना है.
पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को जिस सीट पर सिर्फ़ 15,000 वोट मिले थे उसी पर इस उपचुनाव में बढ़कर 52,843 हो गए. यह बताता है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में ममता को किस तरह की चुनौती देने की तैयारी में है.
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भाजपा को अपनी सरकारों की उपस्थिति के बावजूद दो सीटों पर पराजय का सामना भी करना पड़ा है. ये सीटें मध्य प्रदेश और झारखंड की हैं.
अपनी समूची ताक़त झोंक दिए जाने के बावजूद शिवराज सिंह मध्य प्रदेश में भिंड जिले की अटेर सीट को कांग्रेस के हाथों में जाने से रोक नहीं सके. एक तरह से यह भाजपा के लिए ठीक भी हुआ. कारण कि इसी सीट से इवीएम की विश्वसनीयता को लेकर देश भर में बहस छिड़ी थी.
मध्य प्रदेश की तरह ही झारखंड में भी भाजपा के मुख्यमंत्री रघुबरदास लिट्टीपारा सीट को झारखंड मुक्ति मोर्चा के हाथों में जाने से रोक नहीं सके.
इसी साल के अंत तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात के साथ ही हिमाचल,त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय की विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं.
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उत्तर प्रदेश के उत्साहजनक चुनाव परिणामों के बाद उपचुनावों ताजा के नतीजे भी भाजपा की ताकत को बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं.
ममता बनर्जी और केजरीवाल के लिए शायद भाजपा और प्रधानमंत्री के प्रति अपनी राजनीति और रणनीति पर फिर से विचार करने का वक्त आ गया है.
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