बॉलीवुड में नेपोटिज़्म और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर-3' की मांग पर क्या बोले नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी
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- Author, अनुराग कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पहाड़ों पर बसा एक छोटा सा कस्बा, जहां ज़िंदगी बड़े शहरों के मुकाबले थोड़ी ठहरी-ठहरी सी लगती है.
वहां अचानक होता है एक मर्डर और फिर शुरू होती है पुलिस की इन्वेस्टिगेशन और इसी इन्वेस्टिगेशन के इर्द-गिर्द बुनी गई है फिल्म 'रौतू का राज़' की कहानी.
बीबीसी हिंदी ने इस फ़िल्म और बॉलीवुड से जुड़े अन्य कई मुद्दों को लेकर बात की फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी से.
'रौतू का राज़' 28 जून को ZEE5 पर रिलीज़ होने वाली है. इस फ़िल्म का निर्देशन किया है आनंद सुरापुर ने.
फ़िल्म में नवाज़ुद्दीन एक पुलिसवाले के रोल में हैं और उनके सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं साराभाई VS साराभाई फ़ेम अभिनेता राजेश कुमार.
इस फ़िल्म के बारे में नवाज़ कहते हैं,'' ये फ़िल्म ऐसी जगह की है, जहां लोग थोड़े स्लो हैं और वैसा ही डिपार्टमेंट (पुलिस) भी है. वहां अचानक से एक घटना घटती है और लोग कैसे हरकत में आते हैं, वो इस फ़िल्म का इंटरेस्टिंग प्वाइंट है. इसकी शूटिंग मसूरी के पास एक गांव रौतू की बेली में हुई है.''
जब मुंबई पुलिस से हुआ सामना
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आम-लोगों का अग़र पुलिस से सामना हो, तो कई बार लोग घबरा जाते हैं. इसी से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया नवाज़ ने हमसे बातचीत में साझा किया, जब पुलिस से उनका सीधा सामना हुआ.
वो कहते हैं, '' एकबार रात के वक़्त हम मुंबई की सड़कों पर घूम रहे थे, अचानक पुलिवालों ने हमें उठा लिया. फिर उन्होंने हमें लाइन से खड़े करके पूछताछ करनी शुरू की कि क्या कर रहे थे, कहां जा रहे थे?''
''हमलोग कुछ ऐसा गलत काम कर नहीं रहे थे तो थोड़ा कॉन्फ़िडेंस में थे. हमने उन्हें बताया कि एक नया प्रोजक्ट स्टार्ट हो रहा था, उसी की खुशी थी इसलिए थोड़ा घूम रहे थे. वो हमारी बात समझ गए.''
फ़िल्म में उनका कैरेक्टर एक मानसिक समस्या पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से जूझ रहा होता है.
इस बारे में नवाज़ कहते हैं,'' ये एक ट्रॉमा है जो किसी घटना की वजह से रह जाता है. कैसे आप इसे खत्म करते हैं, इससे निकलने की जद्दोजहद करते हैं. कुछ लोग इससे निकले जाते हैं, कुछ नहीं निकल पाते. लेकिन मेरे हिसाब से इंसान वहीं है जो इन सब चीज़ों से बाहर निकलकर नॉर्मल ज़िंदगी जीता है और दूसरों को सबक देता है.''
पिछले कुछ सालों में ज़िंदगी में आए बदलावों के सवाल पर वो कहते हैं, '' कई तरह के बदलाव मेरी ज़िंदगी में आए हैं. जैसे-जैसे समय बीतता है, आप दयालु होते जाते हैं. मेरे हिसाब से दूसरे की रिस्पेक्ट करना बहुत ज़रूरी है. आप जो दुनिया को दोगे, वो आपको किसी ना किसी रूप में वापस मिलता है.''
नवाज़ का मानना है कि भारत में इंडिपेंडेंट सिनेमा को उतनी मदद और प्रोत्साहन नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए.
वो कहते हैं,'' ये बात सही है कि इंडिपेंडेंट फ़िल्मों को लोगों से सपोर्ट मिलता नहीं मिलता है. रिलीज़ के वक़्त भी उन्हें मदद नहीं मिलती.बड़े-बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म से भी समर्थन नहीं मिलता.''
क्या आएगी 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर-3?
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'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में फैज़ल ख़ान के किरदार ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई और कई बार फ़ैन्स की तरफ़ से इसके सीक्वल की मांग उठती है, लेकिन नवाज़ इस मांग से इत्तेफाक़ नहीं रखते.
वो कहते हैं, '' एक चीज़ खत्म हो गई, वो ख़त्म हो गई. इसे खींचना और उसकी क्रेडिबिलटी को अगली सिरीज़ के लिए कैश करना वो मेरे या अनुराग कश्यप के लिए मायने नहीं रखता.'
''जब हम 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' कर चुके थे तो बहुत से लोगों ने कहा कि गैंग्स ऑफ़ वासेपुर 3 आनी चाहिए, लेकिन अनुराग ने कभी इजाज़त नहीं दी. वो इस तरह की चीज़ों में विश्वास नहीं करते. वो नया कुछ ढूंढने लगते हैं.''
नेपोटिज़्म की बहस पर क्या सोचते हैं नवाज़?
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बॉलीवुड में नेपोटिज़्म की बहस पर नवाज़ कहते हैं, 'किसी का बेटा या बेटी ऐक्टर बनना चाहता है तो वो इसके मेहनत करते हैं. वो उसके लिए सीखते भी हैं.'
वो आगे कहते हैं और वैसे भी आप लोग ही (ऑडियंस) उन्हें देखते जाते हो. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि किसी स्टार के बच्चे को क्यों रोल मिल गया और मैं क्यों संघर्ष कर रहा हूं.
संघर्ष हमारी नियति में था इसलिए हमने संघर्ष किया.वो लोग (स्टार किड्स) भी काफ़ी मेहनत करते हैं. और वैसे भी हमारी फ़िल्मों को कितने ही लोग देखने जाते हैं.'
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