मसूद अज़हर पर बैन कूटनीति का असर या लेन-देन?: नज़रिया
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- Author, एसडी गुप्ता
- पदनाम, बीजिंग से, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 3 मिनट
पुलवामा हमले की घटना के बाद मसूद अज़हर ने दावा किया था कि उनके संगठन ने इस घटना को अंजाम दिया है. इसके बाद ब्रिटेन, अमरीका और फ़्रांस मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लेकर आए थे.
ऐसे में चीन इसका विरोध करता तो ऐसा संदेश जाता कि वह आतंकवाद का समर्थन कर रहा है. चीन के लिए यह अंतरराष्ट्रीय छवि का मसला था.
पाकिस्तान में चीन की कई परियोजनाएं चल रही हैं कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चीन के दौरे पर आए तो वहां दोनों देशों के नेताओं के बीच मसूद अज़हर पर बातचीत हुई होगी.
चीन इस नतीजे पर पहुंचा कि मसूद अज़हर अब बहुत पाकिस्तान में बहुत अधिक प्रभाव नहीं रखता उसके विरुद्ध कुछ होने पर बहुत ज़्यादा विरोध का सामना करना पड़ेगा.
यह भी माना जा सकता है कि पाकिस्तान और चीन की सेना के बीच भी इस मसले पर बातचीत हुई होगी.
वैसे भी साल 2011 में ही जैश-ए-मोहम्मद को एक आतंकी संगठन घोषित किया जा चुका है सिर्फ़ इस संगठन के नेता को आतंकी घोषित किया जाना था.
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भारत-पाकिस्तान पर क्या असर
दुनिया में कोई आपको कुछ दे और बदले में कुछ ना मांगे, ऐसा संभव नहीं होता. अमरीका ने भारत और चीन दोनों से कहा कि ईरान से तेल ना खरीदें.
चीन ने अमरीका की बात नहीं सुनी जबकि भारत ने नुकसान उठाने के बावजूद ईरान से तेल लेना बंद कर दिया.
तो भारत ने इतना बड़ा बलिदान इसी वजह से दिया था ताकि अमरीका मसूद अज़हर वाले मामले में भारत का समर्थन करेगा.
मीडिया भले यह बताती रहे कि भारत ने अपनी सच्चाई के दम पर मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी साबित करवा दिया, जबकि हक़ीक़त में कूटनीति सच्चाई से बढ़कर लेन-देन का विषय होता है. यहां हर देश को दूसरे देश से कुछ लेने के लिए कुछ देना ही पड़ता है.
इसलिए अगर हम यह सोच लें कि आज चीन ने मसूद अज़हर पर अपना वीटो ताकत का इस्तेमाल नहीं किया, इसके बदले में भारत को चीन के लिए कुछ नहीं करना पड़ेगा. यह तो कूटनीति की मासूमियत समझी जाएगी.
दूसरी तरफ पाकिस्तान पर दबाव पड़ेगा कि वो मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ कदम उठाए. अगर पाकिस्तान ऐसा नहीं करेगा तो सीधा संदेश जाएगा कि वह संयुक्त राष्ट्र के ख़िलाफ़ जा रहा है.
साथ ही साथ चीन पर भी दबाव पड़ेगा कि वह पाकिस्तान जैसे देश की मदद क्यों कर रहा है.
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भारत के नज़दीक आना चाहता है चीन
यह बात तो सर्वज्ञात है कि अगर चीन हमेशा भारत का बाज़ार चाहता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत में राजनीतिक तौर पर हमेशा चीन का विरोध दिखाया जाता है.
कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसके कार्यकाल के दौरान चीन वन रोड वन बेल्ट में कामयाब हो सके. खुद विपक्ष के नेता राहुल गांधी कई बार बोल चुके हैं कि 'मोदी जी चीन से डरते हैं.'
भारत के लिए कितनी बड़ी कामयाबी
आज भले ही भारत में इस बात का शोर मचाया जा रहा है कि मसूद अज़हर पर बड़ी कामयाबी प्राप्त कर ली है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि साल 2009 से भारत इसकी मांग कर रहा था. भारत को अपनी यह मांग मनवाने में पूरे 10 साल लग गए.
इसलिए यह भारत के लिए खुश होने का विषय ज़रूर हो सकता है, लेकिन यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि भी नहीं है.
चुनाव पर कितना असर
हम सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी बहुत ही कुशल वक्ता हैं, वो किसी भी बात को अपने भाषण में शामिल करने की कला जानते हैं.
अपने चुनावी भाषणों में कह चुके हैं कि उनकी सरकार घर में घुसकर मारती है. इसलिए मोदी इस पूरे मामले का फायदा उठाने से बिलकुल भी नहीं चूकेंगे.
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पाकिस्तान और चीन के रिश्तों पर असर
मसूद अज़हर के मामले में चीन के इस कदम का विरोध पाकिस्तान नहीं कर पाएगा क्योंकि वह कभी यह नहीं दर्शाना चाहेगा कि चीन के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में किसी भी तरह की खटास आई है.
चीन और पाकिस्तान एक दूसरे को लोहे के भाई बोलते हैं, उनका मानना है कि उनके रिश्ते समुंदर से भी गहरे हैं. इस तरह दो प्रेमी भी एक दूसरे को नहीं बोलते.
इसलिए पाकिस्तान कभी भी चीन के इस कदम का विरोध नहीं करेगा. हालांकि पाकिस्तान की सरकार से ज़्यादा यह मामला आईएसआई के लिए चिंता का विषय बनेगा.
(बीबीसी संवाददाता सिंधुवासिनी के साथ बातचीत पर आधारित)
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