कोरोना: क्या भारत में वैक्सीन की कमी है? दूसरी वैक्सीन को क्यों नहीं मिल रही मंज़ूरी?
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- Author, सिंधुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
साल भर पहले जब दुनिया कोरोना महामारी की पहली लहर झेल रही थी तब भी सब को सिर्फ़ एक चीज़ का बेसब्री से इंतज़ार था- वैक्सीन.
वैज्ञानिकों की रात-दिन की मेहनत के बाद अब आख़िरकार दुनिया भर में कई तरह की कोरोना वैक्सीन उपलब्ध हैं, जो कोविड-19 पर प्रभावी होने को लेकर अलग-अलग तरह के दावे करती हैं.
भारत में भी टीकाकरण अभियान साल 2021 की शुरुआत से जारी है. लेकिन तीन महीने बाद ही वैक्सीन की कमी की ख़बरें आ रही हैं.
कई राज्यों ने इस कमी को दूर करने की गुहार केंद्र सरकार से लगाई है लेकिन केंद्र सरकार ऐसी किसी कमी से इनकार रही है.
ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं: क्या वैक्सीन की वाक़ई कमी है? वैक्सीन निर्माता क्या कहते हैं? भारत टीकाकरण के अपने लक्ष्य से पीछे क्यों चल रहा है?
एक नज़र डालते हैं उन सभी सवालों पर जो वैक्सीन को लेकर उठ रहे हैं:
क्या देश में वैक्सीन की कमी है?
पिछले कुछ दिनों से कुछ राज्यों में वैक्सीन की कमी और आपूर्ति में बाधा से जुड़ी ख़बरें आई हैं.
राज्य सरकारों का पक्ष
महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा ने वैक्सीन की सप्लाई में कमी की शिकायत की है.
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को लिखे पत्र में कहा कि राज्य में बस दो दिन की वैक्सीन डोज़ ही बची है और वैक्सीन की कमी के कारण उसे 700 टीकाकरण केंद्र बंद करने पड़े हैं.
पटनायक ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि ओडिशा में रोज़ाना तक़रीबन ढाई लाख लोगों को टीका लगाया जा रहा है.
नवीन पटनायक ने केंद्र सरकार से अगले 10 दिनों के लिए वैक्सीन की कम से कम 25 लाख ख़ुराकें भिजवाने की अपील की है.
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महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने गुरुवार की सुबह कहा कि राज्य में बस तीन दिनों की वैक्सीन डोज़ बची है इसलिए केंद्र को जल्द से जल्द और वैक्सीन सप्लाई का इंतज़ाम करना चाहिए.
टोपे ने कहा कि वैक्सीन की कमी के कारण मुंबई जैसे शहरों में टीकाकरण केंद्र बंद करने पड़ रहे हैं और वैक्सीन लगवाने आए लोगों को वापस लौटाना पड़ा रहा है.
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने वैक्सीन की कमी के इन दावों को पूरी तरह नकार दिया है.
उन्होंने कहा कि कुछ राज्य और नेता जन स्वास्थ्य जैसे मुद्दे के राजनीतीकरण में लगे हैं और वैक्सीन की कमी जैसी बातें कहकर बेवजह लोगों में घबराहट फैला रहे हैं.
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों पर वैक्सीन को लेकर ‘मिसमैनेजमेंट’ और ‘मनमानी’ का आरोप लगाया.
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डॉक्टर हर्षवर्धन ने वैक्सीन की कमी के दावों को नकारते हुए एक विस्तृत बयान जारी किया है.
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केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी कहा है कि महाराष्ट्र सरकार को वैक्सीन पर राजनीति नहीं करनी चाहिए.
उन्होंने ट्वीट कर बताया कि महाराष्ट्र में अब तक वैक्सीन की कुल 1,06,19,190 खुराकें भेजी गई हैं जिनमें से सिर्फ़ 90,53,523 ख़ुराकें लोगों को दी गई हैं.
उन्होंने कहा कि राज्य को 7,43,280 वैक्सीन भेजी जानी अभी बाक़ी हैं और 23 लाख ख़ुराकें अब भी महाराष्ट्र के पास हैं.
हालाँकि इन सारे आरोपों-प्रत्यारोपों के बाद केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र को वैक्सीन की 7.3 लाख की बजाय 17 लाख ख़ुराकें भिजवाने का निर्णय लिया है.
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वैक्सीन निर्माता क्या कहते हैं?
इस बीच पुणे स्थित सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा है कि अमेरिका और यूरोप ने वैक्सीन बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगा दी है इसलिए वैक्सीन के उत्पादन पर असर पड़ा है.
उन्होंने इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “यह एक ऐसी समस्या है जिससे हम पिछले कुछ समय से जूझ रहे हैं.”
वहीं, एस्ट्राज़ेनेका ने वैक्सीन सप्लाई में हो रही देरी को लेकर अपनी भारतीय सहयोगी कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया को लीगल नोटिस भी भेज दिया है.
सीरम इंस्टिट्यूट का कहना है कि भारत सरकार के वैक्सीन के निर्यात पर रोक लगाए जाने के कारण उसे वैक्सीन ब्रिटेन भेजने में देरी हो रही है और फ़िलहाल वो घरेलू ज़रूरतों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहता है.
वैक्सीन लगवाने की आयु सीमा क्यों नहीं घटा रही है सरकार?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने कुछ राज्यों और नेताओं के वैक्सीन लगाने की तय आयु सीमा को घटाने की माँग पर भी जवाब दिया.
उन्होंने कहा, “चूँकि वैक्सीन की सप्लाई सीमित है इसलिए हमारे पास प्राथमिकताएं तय करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को अलग-अलग प्राथमिकता श्रेणी में रखना अंतरराष्ट्रीय चलन है और यह सुरक्षित भी है.’’
हर्षवर्धन ने अपने एक ट्वीट में कहा, “कुछ राज्य 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू करने की माँग कर रहे हैं, तो इसका मतलब ये लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने-अपने राज्यों में सभी स्वास्थ्य कर्मियों, फ्रंटलाइन वर्कर्स और वरिष्ठ नागरिकों का टीकाकरण कर लिया है. लेकिन तथ्य बिल्कुल अलग हैं.”
उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट करके बताया कि कैसे कई राज्य निर्धारित आयु वर्ग को टीका लगवाने में असफल रहे हैं.
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हालाँकि इन्हीं ट्वीट्स के जवाब में लोग कह रहे हैं कि चूँकि हर राज्य में आबादी और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या अलग-अलग है इसलिए उनके टीकाकरण प्रतिशत की तुलना दूसरे राज्यों के टीकाकरण प्रतिशत से करना सही नहीं होगा.
भारत की ‘वैक्सीन मैत्री’ पर सवाल
कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारत सरकार ने पिछले महीने वैक्सीन के निर्यात पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी थी लेकिन इसके बावजूद देश के भीतर वैक्सीन की कमी से जुड़ी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
ऐसे में ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या भारत की ‘वैक्सीन डिप्लोमैसी’ से इसकी घरेलू ज़रूरतों को नुक़सान पहुँचा है?
विदेश मंत्रालय के हालिया आँकड़ों के अनुसार भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के अंतर्गत अब तक 6.45 करोड़ वैक्सीन डोज़ का निर्यात किया है.
इनमें से 1.04 करोड़ ख़ुराकें अनुदान के तौर पर, 3.57 करोड़ ख़ुराकें व्यापारिक तौर पर और 1.82 करोड़ ख़ुराकें संयुक्त राष्ट्र की ‘कोवैक्स पहल’ के अंतर्गत निर्यात की गई हैं.
संक्रमण में लगातार आती तेज़ी के मद्देनज़र कुछ विपक्षी पार्टियों ने माँग की है कि जब तक भारत की पूरी आबादी का टीकाकरण नहीं हो जाता, वैक्सीन के निर्यात पर रोक लागू रहनी चाहिए.
कोरोना वैक्सीन के निर्यात पर रोक कब तक लगी रहेगी, इस बारे में भारत सरकार ने फ़िलहाल स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा है लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने पिछले महीने संसद में एक बयान में कहा था कि ‘कोरोना वैक्सीन का निर्यात भारतीयों की क़ीमत पर नहीं किया जाएगा.’
क्या भारतीयों के लिए दो वैक्सीन काफ़ी है?
भारत में फ़िलहाल सिर्फ़ दो वैक्सीनों को मंज़ूरी मिली है. सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया और ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की स्वदेशी कोवैक्सीन.
सीरम इंस्टिट्यूट महीने में वैक्सीन की तक़रीबन 6.5 करोड़ ख़ुराकें ही बना सकती है. उसे ‘कोवैक्स कार्यक्रम’ तहत निम्न आय वाले देशों को भी वैक्सीन की दो अरब ख़ुराकें पहुँचानी हैं.
वहीं, कोवैक्सीन भारत में मौजूद वैक्सीन का महज़ 10 फ़ीसद है. उसमें भी भारत सरकार ने मार्च महीने में कोवैक्सीन की सिर्फ़ दो करोड़ ख़ुराकों का ऑर्डर दिया था.
दोनों ही कंपनियों ने वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत सरकार से मदद माँगी है.
वहीं, भारत सरकार ने जुलाई 2021 तक लोगों तक वैक्सीन की 50 करोड़ ख़ुराकें देने का लक्ष्य रखा है जिसे पूरा कर पाना तेज़ी से फैलते संक्रमण को देखते हुए चुनौतीपूर्ण नज़र आ रहा है.
भारत में फ़ाइज़र और मॉडर्ना की वैक्सीन की एंट्री क्यों नहीं?
वैक्सीन से जुड़े इन तमाम विवादों के बीच अब एक और सवाल ज़ोर-शोर से पूछा जाने लगा है: फ़्री मार्केट और फ़्री इकॉनमी होने के बावजूद भारत में फ़ाइज़र, मॉडर्ना और जॉनसन ऐंड जॉनसन की वैक्सीन को एंट्री क्यों नहीं मिली है?
यह सवाल ख़ुद केंद्र में क़ाबिज़ भारतीय जनता पार्टी के सासंद भी पूछ रहे हैं.
बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने ट्वीट कर कहा है कि वो दूसरी कंपनियों की वैक्सीन को भारत में लाने का मुद्दा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में उठाएंगे.
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उन्होंने लिखा, “आत्मनिर्भर भारत मंत्र के बहाने इसे टाला नहीं जा सकता. अगर S400 मिसाइल सिस्टम आयात कर सकते हैं तो ज़रूरत पड़ने पर वैक्सीन क्यों नहीं?”
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लोगों का एक वर्ग ज़ोर देकर कह रहा है कि अगर देश में वैक्सीन की कमी हो रही है तो सरकार दूसरी वैक्सीन को भारतीय बाज़ार में क्यों नहीं ला रही है?
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सोशल मीडिया पर एक तबक़ा यह सवाल भी उठा रहा है कि अगर उसके पास पैसे हैं और भारत फ़्री मार्केट है तो वो अपनी पसंद की वैक्सीन क्यों नहीं लगवा सकता?
लोगों का कहना है कि जो ख़र्च करने में सक्षम हैं वो पैसे देकर फ़ाइज़र, मॉडर्ना या जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन लगवा सकते हैं ताकि मुफ़्त वैक्सीन ज़रूरतमंद लोगों को आसानी से मिल सके.
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अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार कोविड वैक्सीन से जुड़ी भारत की सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी ने 24 फ़रवरी को रूस में बनी स्पुतनिक V को आपातकालीन इस्तेमाल की मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया था.
कमेटी ने भारत में स्पुतनिक V का ट्रायल कराने वाली फ़ार्मा कंपनी से और डेटा साझा करने के लिए कहा था.
हाल ही में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत दौरे पर थे और जब उनसे स्तुपतनिक V को भारत में मंज़ूरी न मिलने से जुड़ा सवाल पूछा गयातो उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला दोनों देशों की ड्रग रेग्युलेटर कंपनियाँ मिलकर ही लेंगी.
अमेरिकी फ़ार्मा कंपनी फ़ाइज़र ने भी भारत में अपनी वैक्सीन की मंज़ूरी के लिए अर्ज़ी दी थी लेकिन कमेटी ने इससे अतिरिक्त डेटा माँगा, जिसके बाद कंपनी ने अपनी अर्ज़ी वापस ले ली थी.
मॉडर्ना और जॉनसन ऐंड जॉनसन ने फ़िलहाल भारत में मंज़ूरी के लिए अर्ज़ी नहीं दी है.
हालाँकि बढ़ते संक्रमण और वैक्सीन की कमी की ख़बरों के बीच भारत क्या दूसरी वैक्सीन को मंज़ूरी देने के बारे में सोचेगा या नहीं, इस बारे में अभी आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है.
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