कोरोना संकट: बिहार का प्रवासियों के लिए क्या प्लान है?

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    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए

लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मज़दूरों के मामले पर स्वत: संज्ञान नेते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को एक आदेश सुनाया है.

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि "सभी मज़दूरों का रजिस्ट्रेशन किया जाए और आज से 15 दिनों के अंदर सभी को उनके घर भेजा जाए. ट्रेन की माँग के 24 घंटे के अंदर केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त ट्रेनें दी जाएं"

राज्य सरकारों से कोर्ट ने कहा कि लौटकर आने वाले प्रवासी मज़दूरों के लिए काउंसलिंग सेंटर की स्थापना की जाए. उनका डेटा इकट्ठा किया जाए, जो गांव और ब्लाक स्तर पर हों. साथ ही उनके स्किल की मैपिंग की जाए, जिससे रोज़गार देने में मदद हो. अगर मज़दूर वापस काम पर लौटनाचाहते हैं तो राज्य सरकारें मदद करें."

वैसे देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह सुप्रीम आदेश ज़रा देरी से आया है. इसके पहले ही लाखों मज़दूर अपने घर लौट कर आ चुके हैं. फिर भी अदालत का यह आदेश राज्य सरकारों के लिए अहम है क्योंकि 15 दिनों के अंदर उन्हें अपने यहां की विस्तृत कार्ययोजना पेश करनी है.

सुप्रीम कोर्ट के इन्हीं आदेशों को मद्देनज़र रखते हुए आइए जानते हैं कि बिहार का प्रवासियों को लेकर क्या प्लान है?

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कौन हैं प्रवासी?

सबसे पहला सवाल यह कि वे लोग जो लॉकडाउन के दरमियान बिहार आए हैं, वे कौन लोग हैं?

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग वाली एक बैठक में यहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन लोगों को "प्रवासी" कहने पर बिगड़ गए.

वे कहते हैं, "ये लौटकर आए लोग हैं जो दूसरे शहरों में काम करने के लिए गए थे. लेकिन लॉकडाउन के दौरान जब काम-धंधे बंद हो गए तो उन शहरों ने उन्हें अपने यहां नहीं रखा. अब ये लोग वापस अपने घर आ गए हैं. हमने उन्हें बुलाया है. उनका सारा इंतज़ाम किया है."

यह कहते हुए मुख्यमंत्री को शायद इस बात का ख़्याल नहीं रहा होगा कि जब लॉकडाउन शुरू हुआ था, साधन के अभाव में हज़ारों लोग पैदल अपने घर आ रहे थे, मीलों के उनके सफ़र के संघर्ष की गाथाएं छप रही थीं, तब मुख्यमंत्री ने ही उन्हें आने के लिए मना कर दिया था, साफ़ कह दिया था कि "जो जहां है वहीं रहे".

रही बात प्रवासी कहने की तो मुख्यमंत्री के आधिकारिक ट्वीटर अकाउंट से यह भी मालूम चलता है कि "प्रवासी" कहने पर बिगड़ने से पहले उन्होंने बिहार लौटकर आए लोगों को हर बार प्रवासी ही कहा है.

बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ 21 लाख से अधिक लोगों को नई दिल्ली के बिहार भवन स्थित कंट्रोल रूम से मदद की गई है. लगभग 22 लाख लोग श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से आए हैं. उनका आना अभी भी बदस्तूर जारी है.

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हालांकि सरकार की तरफ़ से पेश किए जा रहे आंकड़ों में बिहार लौटकर आने वाले और मदद पाने वाले लोगों में सिर्फ़ वही शामिल हैं जिन्होंने ऑनलाइन मदद की गुहार लगाई थी और जो स्पेशल ट्रेनों से आए थे. मगर उनके अलावा भी हज़ारों-लाखों लोग पैदल और अन्य निजी वाहनों से बिहार लौटे हैं. जिनका आंकड़ा ख़ुद सरकार के पास भी नहीं है.

कितने लोग बिहार आए हैं?

प्रवासियों की संख्या को लेकर पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर और राज्य के जाने-माने समाजशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं,

"बिहार सरकार के पास प्रवासियों के लिए कोई प्लान नहीं है, ना ही उसे पता है लौटकर आने वाले सभी लोगों के बारे में. पलायन की तो यहां परंपरा ही रही है. हाल के दिनों में आबादी बढ़ने के साथ-साथ भूमंडलीकरण के कारण पलायन की दर और बढ़ी ही है. लेकिन आज तक यहां की किसी भी सरकार ने पलायन के आंकड़े नहीं जारी किए. मेरी समझ से लॉकडाउन के दरमियान जितने लोग सरकार के इंतज़ामों के ज़रिए आए हैं, उतने ही या उससे अधिक लोग ख़ुद से व्यवस्था करके दूसरे साधनों से आए हैं. लौटकर आने वाले लोगों की संख्या 60-70 लाख से अधिक हो सकती है."

राज्य में काम का संकट तो पहले से था, अब इतनी बड़ी संख्या में बाहर गए श्रमिक वर्ग के लोगों के वापस आ जाने से स्थिति और भी भयावह हो गई है.

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हालांकि, बिहार सरकार कहती है कि वह घर लौटे सभी श्रमिकों को उनके ‌स्किल के आधार पर रोज़गार मुहैया कराएगी.

बिहार सरकार के श्रम मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बीबीसी को कहा, "लॉकडाउन के दौरान वापस लौटकर जिन श्रमिकों ने क्वारंटीन सेंटरों में वक़्त बिता लिया है, उन सभी का स्किल सर्वे किया गया है. हमारे पास 50 लाख श्रमिकों को रोज़गार देने की कार्ययोजना है. इनमें से 30 लाख प्रवासियों के लिए विशेष प्लान है. अभी तक पाँच लाख से अधिक लोगों को काम मिल भी चुका है."

श्रम मंत्री आगे कहते हैं, "मनरेगा, जल-जीवन-हरियाली और कृषि आधारित दूसरी योजनाओं के ज़रिए अधिक से अधिक लोगों को काम/रोज़गार देने की कोशिश हो रही है. श्रम संसाधन विभाग ने प्रवासी मज़दूरों को उनके स्किल के आधार पर काम देने के लिए विशेष तौर पर एक ऑनलाइन पोर्टल की शुरुआत की है. एक लाख से अधिक श्रमिकों ने उसपर अपना निबंधन भी करा लिया है. "

क्या सरकार दे पाएगी सभी को रोज़गार?

ऐसा नहीं है कि राज्य में काम का संकट केवल लॉकडाउन औरप्रवासियों के आने के बाद से ही शुरु हुआ है. यह पहले से है.

पिछले वित्तीय वर्ष में बिहार के केवल 20 हज़ार मज़दूरों को ही 100 दिन काम मिल पाया है. इस बार केंद्र सरकार की तरफ़ से मनरेगा का बजट कहने के लिए 40 हज़ार करोड़ रुपया बढ़ा दिया गया है, जो कि पहले 61 हज़ार पाँच सौ करोड़ रुपए था. कुल एक लाख एक हज़ार पाँच सौ करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं. अगर इस राशि को प्रतिदिन की मज़दूरी की दर जो कि 202 रुपए है से बांट दें तो केंद्र सरकार के बजट के हिसाब से 502 करोड़ दिन काम होगा.

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प्रोफ़ेसर दिवाकर मनरेगा के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद कहते हैं, "इकॉनमिक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मज़दूरों की कुल संख्या 48 करोड़ है. इसमें 10 फ़ीसदी ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करते हैं. और 10 फ़ीसदी अन-ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में नियमित वेतन पर काम करने वाले हैं. बाक़ी बचे 38 करोड़ में आठ फ़ीसदी लोग स्वरोज़गार के क्षेत्र में हैं. आदर्श रूप में देखें तो मनरेगा जैसी योजना अंतिम में बच गए 30 करोड़ मज़दूरों के लिए ही बनी है. और इन 30 करोड़ मज़दूरों के लिए सरकार ने 502 करोड़ दिन काम करने के लिए पैसा आवंटित किया है. एक मज़दूर के लिए लगभग 17 दिनों का काम है."

यह सोचने वाली बात है कि 202 रुपया प्रतिदिन के हिसाब से साल में 17 दिन काम करके किसी मज़दूर का गुज़ारा हो सकता है!

काम नहीं मिलेगा तो क्या?

मनरेगा के आंकड़ों से ही स्पष्ट हो जाता है कि मज़दूरों के लिए काम का संकट कितना अधिक है.

लेकिन, अगर यह संकट लंबे समय तक बरक़रार रहा, जिस तरह भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, तब ऐसी स्थिति में क्या होगा?

बिहार के वरिष्ठ राजनेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, "लोग वापस जाएंगे. जाने भी लगे हैं. यहां के लोगों की यही नियती बन गई है. मुझे किसी भी ऐसे प्रवासी मज़दूर के बारे में बताइए जिसे वापस लौटकर आने पर सरकार की घोषणा वाली आर्थिक मदद मिली हो या काम मिला हो. काम देने और मदद करने की केवल तस्वीरें खींची और खिंचवाई जा रही हैं. जब तक महामारी का डर है तब तक लोग शायद संकोच करें दोबारा जाने में, मगर वे आख़िरकार फिर से जाएंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि यहां काम नहीं है."

हाल ही में बिहार पुलिस मुख्यालय की तरफ़ से जारी हुई एक चिट्ठी बड़े विवादों में रही, जिसमें कहा गया कि लोग काम के अभाव में और पैसे की चाहत में अपराध की तरफ़ उन्मुख होंगे. राज्य में अपराध का ग्राफ़ बढ़ेगा.

हालांकि, पुलिस मुख्यालय ने इसे भूल मानते हुए चिट्ठी वापस ले ली है, लेकिन प्रवासियों के बारें में ऐसी चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही.

इसे मसले पर हमने बात की अपराध जगत की जानी-मानी पत्रकार और अपराधियों के सुधार पर काम करने वालीं वर्तिका नंदा से.

वर्तिका कहती हैं, "यह सच है कि जब समाज में काम और पैसे का अभाव हो जाता है तो अपराध बढ़ जाते हैं. मगर यह बात उन श्रमिकों के लिए कहना उचित नहीं है जो बेहद विषम परिस्थितियों में बहुत कष्ट झेलकर वापस लौटे हैं. ऐसा कहना उनके काम का अपमान होगा. बाहर से लौटे लोग काम करने वाले लोग हैं. अपराधी कोई और है जो पहले से है. अगर श्रमिकों को लेकर ऐसी अवधारणा बनाई गई तो फ़ायदा अपराधियों को होगा."

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लौटकर आए मज़दूरों को काम मिले या न मिले, लेकिन उन्हें सरकार ने कंडोम ज़रूर दे दिया है. उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के मुताबिक़ बिहार के क्वारंटीन सेंटरों में 15 लाख से अधिक कंडोम बांटे गए हैं.

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