क्या बीजेपी हरियाणा विधानसभा में भी जीतेगी?
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- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीजेपी ने हरियाणा में पहली बार अपने दम पर 1991 में विधानसभा चुनाव लड़ा था. तब बीजेपी को 90 में से सिर्फ़ 2 सीटें मिल पाईं थीं और 70 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. उसके बाद आए कई चुनावों में बीजेपी गठबंधन के भरोसे ही राज्य में बनी रही. साल 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 47 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाया.
2019 के लोकसभा चुनावों में पहली बार बीजेपी ने अपने दम पर सभी 10 सीटें हासिल कर लीं और अपने 58% वोटों के साथ ही आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी जीत की उम्मीदें खड़ी कर दी हैं.
कांग्रेस ने अपने सभी बड़े नेताओं को चुनाव में उतारा था जिनमें से ज़्यादातर नेता सीएम पद के उम्मीदवार भी माने जाते हैं लेकिन कोई भी उम्मीदवार कांग्रेस के लिए सीट नहीं जीत पाया.
कांग्रेस की ग़लती बीजेपी की जीत?
हालांकि संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे काफ़ी हावी होते हैं लेकिन बीजेपी की जीत के लिए हरियाणा के राजनीतिक विश्लेषकों ने हरियाणा कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाज़ी को प्रमुख तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया.
हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार बलवंत तक्षक कहते हैं कि हरियाणा कांग्रेस के बड़े नेता अब ख़ुद को सीएम पद पर देखना चाहते हैं और पार्टी के लिए काम करने की इच्छा उनमें कम दिखाई देती है.
वे कहते हैं, "सिरसा सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक तंवर पिछली बार भी लोकसभा चुनावों में हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष थे और इस बार भी थे. कांग्रेस में बहुत ज़्यादा गुटबंदी हैं. इतनी गुटबंदी थी कि वे ज़िला ईकाई भी नहीं गठित कर सके. कांग्रेस इस बार बिना संगठन के चुनाव में उतरी थी."
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हरियाणा कांग्रेस के एक गुट के मुखिया अशोक तंवर तो दूसरे गुट के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा माने जाते हैं. इन चुनावों में भूपेंद्र हुड्डा ने जाट हार्टलैंड की दो प्रमुख सीटें- रोहतक, सोनीपत की टिकट अपने और अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा के लिए झटक ली. साथ ही करनाल और कुरूक्षेत्र भी अपने क़रीबी कुलदीप शर्मा और निर्मल सिंह को दिलाई थी.
भूपेंद्र हुड्डा की सीट को कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित सीट माना जा रहा था लेकिन उन्हें डेढ़ लाख से भी ज़्यादा वोटों से बीजेपी के रमेश कौशिक ने हरा दिया. इसी सीट पर पिछली बार रमेश कौशिक तक़रीबन 77 हज़ार वोटों से जीते थे.
वहीं रोहतक में पहली बार बीजेपी को सीट मिली है. दीपेंद्र हुड्डा ने 2014 में कांग्रेस की लिए ये एकमात्र सीट जीती थी लेकिन इस बार लगभग सात हज़ार के अंतर से हार गए. इससे पहले जनसंघ की टिकट पर दो सांसद यहां से बने हैं.
बीजेपी कोजाट बनाम गैर-जाट की राजनीति का फायदा हुआ?
हरियाणा की राजनीति को सालों से देखते आ रहे राजनीतिक विश्लेषक नरेंद्र विद्यालंकर कहते हैं कि जाट बनाम ग़ैर-जाट का मुद्दा था तो लेकिन इसका असर नतीजों पर नहीं था.
वे कहत हैं, "विपक्ष बिखरा हुआ था. कांग्रेस की गुटबाज़ी के अलावा इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का बिखराव भी एक फैक्टर था. उसके दो-फाड़ होने के बाद जो वेक्यूम आया, उसे कांग्रेस नहीं भर पाई. इस बार जाट वोट दुविधा की वजह से बंट गए कि वे इनेलो में जाएं या कांग्रेस में.
इसी मुद्दे पर बलवंत तक्षक कहते हैं कि जाटों ने भी बीजेपी को वोट दिया है.
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तक्षक कहते हैं, "हरियाणा की राजनीति का इतिहास देखें तो भजनलाल अपने आप को जाट साबित करने की कोशिश करते रहते थे. लेकिन जब जाटों ने उन्हें जाट स्वीकार करने से मना कर दिया तो उन्होंने जाट बनाम ग़ैर जाट की राजनीति शुरू कर दी थी और उन्हें इसका फ़ायदा भी हुआ. 2009 के चुनाव में वे कांग्रेस से अलग हो गए थे."
वे अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, "2009 में कांग्रेस को 9 सीटें तो मिली और एक भजनलाल को भी और कुछ महीने बाद ही विधानसभा में कांग्रेस को 40 सीटें ही आईं. बहुमत से 5 सीटें कम रही थी. यानी गैर-जाटों ने कांग्रेस को नहीं अपनाया था. इस बार ये मुद्दा बीजेपी के लिए काम कर रहा है."
बलवंत कहते हैं कि हरियाणा में राष्ट्र की सुरक्षा का मुद्दा भी काम करता है क्योंकि यहां से बहुत लोग फौज में जाते हैं, इसलिए ये कहना ग़लत नहीं होगा कि जाटों ने भी बीजेपी को इस चुनाव में वोट दिया है.
इनेलो और जेजेपी का क्या है भविष्य
हरियाणा में आमतौर पर तिकोना मुक़ाबला होता रहा था जिसमें इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला की एक भूमिका होती थी. चौधरी देवीलाल की विरासत पर चल रही पार्टी अचानक पिछले साल दो फाड़ हो गई. ओमप्रकाश चौटाला के पौत्र दुष्यंत चौटाला ने अलग होकर जननायक जनशक्ति पार्टी बना ली.
लेकिन इन चुनावों में इनेलो के सभी उम्मीदवारों की ज़मानत भी ज़ब्त भी हो गई. साथ ही इस बार जेजेपी को भी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का कोई फ़ायदा नहीं हुआ.
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बलवंत तक्षक कहते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में जेजेपी और इनेलो को इन चुनावों में फायदा नहीं होगा क्योंकि मतदाता नाराज़ है.
उनका कहना है, "जब इनेलो के बिखराव से पहले बसपा का समझौता हुआ तो लगा कि इनकी सरकार आ सकती है. लेकिन इनेलो के बिखराव ने मतदाता को बेचैन कर दिया और इन लोकसभा चुनाव में उनका वोट कांग्रेस और बीजेपी में चला गया."
वे कहते हैं, "वहीं फिलहाल इनेलो संभाल रहे अभय चौटाला की इतनी स्वीकार्यता नहीं है. हालांकि उनके पिता ओम प्रकाश चौटाला को भी अपनी स्वीकार्यता बनाने में वक्त लगा था. जब देवीलाल ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया तो उनके ख़िलाफ़ पार्टी में भी विद्रोह हुआ था. एमएलए पार्टी छोड़ गए थे और आज एक बार फिर वही स्थिति है."
बीजेपी दोहरा पाएगी विधानसभा में प्रदर्शन
इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस हिसार सीट को छोड़कर सभी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही है. इसलिए माना जा रहा है कि विधानसभा में कांग्रेस और बीजेपी में ही सीधी टक्कर देखने को मिलेगी.
वरिष्ठ पत्रकार पवन बंसल कहते हैं कि सिर्फ़ पांच महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं और इतनी जल्दी कांग्रेस के लिए वापसी करना मुश्किल है.
वे कहते हैं, "लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 90 हल्कों में से 79 हल्कों में बढ़त मिली है. पिछली बार भी बीजेपी ने 47 सीटें जीती थी. ऊपर से कांग्रेस में अभी दोषारोपण का दौर चल रहा है. हुड्डा कैंप के लोग अशोक तंवर के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं."
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नरेंद्र विद्यालंकर कहते हैं कि विधानसभा के नतीजे लोकसभा से थोड़े अलग होंगे क्योंकि मतदाता समझदार है कि उसे पंचायत चुनाव में किसे चुनना है, नगर निगम में किसे चुनना है और लोकसभा में किसके लिए वोट करना है.
लेकिन वे राज्य की खट्टर सरकार को भी श्रेय देते हैं कि बीजेपी सरकार ने ग्रुप डी की नौकरियों का जो नतीजा निकाला उसका असर मतदाता पर पड़ा.
बलवंत तक्षक भी कहते हैं कि मनोहर लाल खट्टर के कार्यकाल को भी लोगों ने सराहा है ख़ासकर नौकरियों में पारदर्शिता और ऑनलाइन तबादलों की वजह से. लेकिन ये भी है कि लोकसभा में लोग उम्मीदवार के नाम पर कम और मोदी के नाम पर वोट कर रहे थे. तो अभी नतीजों को लेकर कुछ साफ़ नहीं कहा जा सकता.
वरिष्ठ पत्रकार सोमनाथ शर्मा कहते हैं फरवरी 2016 जाट आंदोलन की हिंसा में जातिवाद का जो ज़हर घुला, उसका फ़ायदा बीजेपी को मेयर और लोकसभा के चुनावों में हुआ. वहीं कांग्रेस अभी संगठन के नाम पर बहुत कमज़ोर है.
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आंकड़े के हिसाब से किस को बढ़त
बीजेपी ने 2009 विधानसभा से लगातार अपने वोट शेयर में बड़ा इज़ाफ़ा किया है. 2009 में बीजेपी के पास महज़ 9 फीसदी वोट थे और सिर्फ़ 4 सीटें मिली थी.
लेकिन 2014 में 47 सीटें मिली और वोट शेयर 34.7 फीसदी हो गया जो कि 2014 लोकसभा चुनावों के वोट शेयर के आस-पास ही था.
वहीं कांग्रेस ने 2009 विधानसभा चुनाव में 40 सीटें जीती थी और वोट शेयर लगभग 36 फीसदी था.
लेकिन 2014 में सिर्फ 15 सीटें मिली और वोट शेयर 21 फीसदी पर आ गिरा जो कि लोकसभा चुनावों के वोट शेयर के आस-पास ही था.
लेकिन इस बार 2019 लोकसभा चुनावों में बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस के वोट शेयर में भी इज़ाफ़ा हुआ है जिसका एक फैक्टर इनेलो के वोटों का बंट जाना भी हो सकता है.
बीजेपी ने 58 फीसदी वोट हासिल किए हैं और कांग्रेस ने 28 फीसदी. लगभग 30 फीसदी वोटों के अंतर को पाटना कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल होगा.
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