नज़रिया: जब टीवी सीरियल में हुई स्वप्नदोष की बात
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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, संवाददाता, दिल्ली
"मैं 15 साल का हूं, पिछले कुछ दिनों से मुझे कुछ अजीब-अजीब से ख़्याल आने लगे हैं, रात में मेरे शरीर में कुछ अजीब सा होने लगा है, पढ़ाई में भी मन नहीं लगता, फिर पता लगा कि मुझे स्वप्नदोष (नाइटफ़ॉल) हुआ है."
जब एक भारतीय टीवी सीरीयल में मैंने ये डायलॉग सुना तो हैरान रह गई.
स्वप्नदोष और माहवारी जैसे मुद्दों पर तो 15 साल के लड़के-लड़कियां आपस में बात करने से कतराते हैं, फिर ये तो टीवी है जहां 'सेनिटरी नैपकिन' के विज्ञापनों में सफ़ेद कपड़ों में फ़ुर्ती से भागती लड़कियों के अलावा माहवारी की चर्चा कहीं नहीं दिखती.
जहां 'हिप हिप हुर्रे', 'जस्ट मोहब्बत' और 'बनेगी अपनी बात' जैसे जवां दिलों के बड़े होने, मिलने-बिछड़ने वाले सीरियल तो आए, पर उनमें उस उम्र की इन उलझनों पर कभी कोई बात नहीं हुई.
सवाल ये कि अगर कहानियों में ऐसी बातें जोड़ दी जाएं तो वो किताबी ज्ञान से तो नहीं भर जाएंगी? फिर उन्हें देखेगा कौन?
यहीं कहानी में 'टविस्ट' है. क्योंकि दूरदर्शन का दावा है कि इस सीरियल, 'मैं कुछ भी कर सकती हूं', की पहुंच 40 करोड़ लोगों तक है जो उनके मुताबिक 'दूरदर्शन के इतिहास में मील का पत्थर है'.
इसीलिए इस सीरियल का अब तीसरा सीज़न बनने जा रहा है.
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ये टीवी सीरियल सिर्फ़ जवान होते लड़के-लड़कियों के शरीर और 'सेक्सुआलिटी' यानी यौनिकता से जुड़े मिथकों को ही अपनी कहानी में नहीं पिरोता बल्कि औरतों के स्वास्थ्य से जुड़ी कई बातें भी उभारता है.
सीरियल का 'प्लॉट' सरल है. ये एक महिला डॉक्टर की कहानी है. जिसमें उसके अपने प्यार, करीयर और परिवार से जुड़े उतार-चढ़ाव हैं.
पर ये आम सीरियल्स के सास-बहू के झगड़े, काम की जगह पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की औरतों की होड़ या घर में ईर्ष्या और नफ़रत से भरे औरतों के षडयंत्र से दूर रहता है.
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औरतों की असल ज़िंदगी भी तो ऐसी नहीं होती ना. अक़्सर नौकरीपेशा बहू जब घर लौटती है तो घर के काम में ससुर नहीं, सास ही हाथ बंटाती है.
जब माहवारी के चलते बहुत दर्द हो और दफ़्तर में छुट्टी मांगनी हो तो महिला बॉस के पास जाने में कम शर्म महसूस होती है.
औरतें साथ ज़्यादा होती हैं, ख़िलाफ़ कम. पर टीवी पर घर घर की कहानी कुछ और ही दिखाई जाती रही है.
हाल में 'बालिका वधू' और 'इश्क का रंग सफ़ेद' जैसे सीरियल भी बने हैं लेकिन उनमें भी समाज में औरतों के दर्जे और रिश्तों को उसी पुराने आमने-सामने वाले आइने से देखा गया है.
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मेक्सिको, ब्राज़ील और कई देशों में हुए शोध बताते हैं कि टीवी सीरियल में छिपे संदेशों का आम जनता पर बहुत असर पड़ता है.
'मैं कुछ भी कर सकती हूं' सीरियल बनानेवाले संस्थान 'पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया' की पूनम मतरीजा ने मुझे बताया कि इसके लिए रिसर्च करते हुए जब वो गांवों और छोटे शहरों में गईं तो पाया कि सीरियलों की देखादेखी सास-बहू के रिश्ते कड़वे होने लगे थे.
इसलिए तय किया गया कि सीरियल बने तो ऐसा जो जानकारी दे, समाज में औरत के दर्जे को बेहतर दिखाए, सिर्फ़ परेशानियां नहीं उनके हल भी दिखाए और जिनमें मर्दों की भी पूरी हिस्सेदारी हो.
औरतें कब शादी करें, कितने बच्चे पैदा करें, कब गर्भपात करवाएं, पति के नशे की लत से वो कैसे प्रभावित होती हैं, करीयर के फ़ैसलों में उन्हें कितनी आज़ादी मिलनी चाहिए ये सब सवाल इस सीरियल में हैं.
और इनके जवाब में मर्द अपना रवैया बदलते हुए दिखाए गए हैं. यानी औरतें उनके ख़िलाफ़ नहीं बल्कि वो औरतों के साथ हैं. शायद इसीलिए इस सीरियल को देखनेवालों में 48 फ़ीसदी मर्द हैं.
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सही तो है. हमने औरतों और मर्दों का खांचा ना जाने क्यों अलग-अलग खींच रखा है.
मानो मेरा शरीर मेरी परेशानी, और तुम्हारे से मुझे कोई सरोकार नहीं.
शर्मिंदगी और हिचक से फ़ासला ऐसा बन गया है कि या तो प्यार या हिंसा, इन्हीं दो धुरियों की बीच झूलते रहते हैं.
दूरदर्शन का वो सीरियल आपको चाहे जैसा लगे, ये तो मानेंगे कि खांचे बदलने की ज़रूरत है.
क्योंकि बातचीत के खुले रास्तों में ही नए रिश्तों की उम्मीद है.
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