उत्तर प्रदेश: अतीक़-अशरफ़ हत्याकांड में चार्जशीट दाख़िल, क्या हैं अनसुलझे सवाल?

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    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इस साल 15 अप्रैल को वकील उमेश पाल की हत्या के अभियुक्त अतीक़ अहमद और उनके भाई अशरफ़ अहमद की प्रयागराज के कॉल्विन अस्पताल के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

दोनों भाइयों को पुलिस दिन भर पूछताछ के बाद मेडिकल जांच के लिए अस्पताल लेकर आई थी.

उन्हें गोली मारने वाले तीनों अभियुक्त मीडियाकर्मी बनकर अस्पताल के इमरजेंसी विभाग के बाहर पहुँचे थे.

ये हमला, हत्या और तीनों हमलावरों का पकड़ा जाना महज़ चंद सेकेंड्स में हुआ और सारा घटनाक्रम दुनिया ने टीवी चैनलों पर लाइव देखा.

इस घटना के लगभग तीन महीने गुज़रने के बाद अब उत्तर प्रदेश पुलिस की एसआईटी ने प्रयागराज के सीजेएम कोर्ट में चार्जशीट दायर कर दी है.

कब क्या हुआ?

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13अप्रैल, 2023, 11.43 PM

उमेश पाल की हत्या और उसकी साज़िश के अभियुक्त अतीक़ अहमद और उसके भाई अशरफ़ को पूछताछ के लिए पुलिस थाने लाया गया.

14 अप्रैल:

दोनों से पूछताछ की गई लेकिन ज़्यादा बात नहीं हो पाई क्योंकि दोनों भाई उमेश पाल की हत्या के मामले में वांटेड अतीक़ के बेटे असद के मुठभेड़ मारे जाने की ख़बर को लेकर शोक में थे.

इसके बाद उन्हें मेडिकल जांच के लिए कॉल्विन अस्पताल लाया गया और फिर वापस थाने ले जाया गया.

15 अप्रैल को फिर पूछताछ

पुलिस का कहना है कि दोनों से मिली जानकारी के बाद पुलिस ने भारी मात्रा में असलहा की बरामदगी भी की.

15 अप्रैल, 10 :25 PM

अतीक़ और अशरफ़ ने घबराहट महसूस होने के बारे में पुलिस को बताया. उनकी बिगड़ती हालत देखते हुए 19 पुलिस कर्मी उन्हें एक बोलेरो गाड़ी और पुलिस जीप में लेकर प्रयागराज के कॉल्विन अस्पताल पहुंचे.

15 अप्रैल, 10:30 PM

मीडिया कर्मी बनकर आए मौके पर मौजूद हमलावर लवलेश, अरुण मौर्य और सनी ने ऑटोमेटिक बंदूकों से फायरिंग करके अतीक़ और अशरफ की हत्या कर दी.

हत्या की साज़िश और उससे जुड़े सबूत

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समाप्त

पुलिस ने फ़िलहाल अभियुक्त लवलेश, सनी और अरुण मौर्य के ख़िलाफ़ हत्या, हत्या का प्रयास, साज़िश, धोखाधड़ी की धाराओं में अदालत में चार्ज़शीट दाखिल की है.

अतीक़ और अशरफ़ की हत्या से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह था कि बांदा के रहने वाले लवलेश तिवारी, हमीरपुर के रहने वाले सनी, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कासगंज के रहने वाले अरुण मौर्य ने कैसे सुनियोजित तरीके से अतीक़ और अशरफ़ पर हमला किया?

उत्तर प्रदेश पुलिस सूत्रों की मानें तो अतीक़-अशरफ़ हत्याकाण्ड का मास्टरमाइंड अभियुक्त सनी है.

सनी ने ही लवलेश और अरुण मौर्य के साथ इस हत्याकांड की योजना बनाई.

सबूत के तौर पर एसआईटी ने अदालत को सीसीटीवी फुटेज भी सौंपी है. इस फ़ुटेज में तीनों हमलावरों को साफ़ देखा जा सकता है.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ तीनों अभियुक्तों ने हत्या के पांच दिन पहले से अतीक़ और अशरफ़ की आवाजाही लाइव मीडिया कवरेज के ज़रिए ट्रैक की और उनका पीछा करते हुए प्रयागराज पहुंचे.

पुलिस सूत्रों का यह भी कहना है कि जिस दिन दोनों की हत्या की गई, उस दिन भी अभियुक्त मौक़े पर दो से तीन घंटे पहले से ही मौजूद थे. हत्या के ठीक पहले सनी ने सभी के फ़ोन के सिम तुड़वा दिए थे.

एसआईटी ने अपनी जांच में क्राइम सीन रीक्रिएट करवाया. वो एसआईटी ने घटना के ठीक बाद किया था और उसकी मीडिया ने रिपोर्टिंग भी की थी.

अभियुक्तों के फ़ोन की फॉरेन्सिक जांच से भी क्या कई पहलू सामने आए हैं.

हत्या का मकसद: 'नाम और पहचान बनाना'

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इमेज कैप्शन, अतीक़ अहमद को इसी गाड़ी में साबरमती जेल से नैनी जेल लाया गया था

हत्या के मकसद के बारे में घटना की एफआईआर कहती हैं कि "तीनों अभियुक्तों ने बताया कि हम लोग अतीक़ और अशरफ़ गैंग का सफाया करके, प्रदेश में अपनी पहचान बनाना चाहते थे, जिसका लाभ भविष्य में निश्चित रूप से मिलता."

एफ़आईआर के अनुसार अभियुक्तों ने पुलिस को बताया, "जब से अतीक़ और अशरफ़ की पुलिस रिमांड की सूचना मिली थी तब से हम लोग स्थानीय मीडिया कर्मियों की भीड़ में रहकर इन दोनों को मारने की फ़िराक में थे लेकिन मौका नहीं मिल पाया. आज मौका मिलने पर हमने घटना को अंजाम दिया."

हत्या के वायरल वीडियो में साफ़ देखा गया था कि गोलियां चलाने के बाद अभियुक्तों ने हवा में हाथ उठा लिए थे. उन्होंने घटनास्थल से भागने का कोई प्रयास नहीं किया था.

हथियार लोडेड थे और अपनी जान बचने के लिए लवलेश, सनी और अरुण पुलिस वालों पर भी फायरिंग कर सकते थे लेकिन ऐसा न तो मौके पर मौजूद मीडिया के कवरेज़ में दिखाई दिया. और ना ही पुलिस की एफआईआर में ऐसी कोई जानकारी शामिल है.

अतीक़ और अशरफ़ पर गोलियां चलाने के बावजूद पुलिस की तरफ से जवाबी फायर में गोली चलाने की फिलहाल कोई जानकारी नहीं है, और कैमरे में कैद घटनाक्रम में भी पुलिस फायरिंग करती नहीं दिख रही है.

आज कल पुलिस सबूत इकठ्ठा करने के लिए अभियुक्तों का लाई डिटेक्टर टेस्ट या नार्को टेस्ट जैसी जांच भी कराती है जिससे जांच को सही दिशा में ले जाने में मदद मिल सके.

फ़िलहाल ये यह पता नहीं चल पाया है कि पुलिस ने अभियुक्त लवलेश, सनी और अरुण का लाई डिटेक्टर या नार्को टेस्ट करवाया है कि नहीं.

कहाँ से मिले हथियार

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इमेज कैप्शन, गोली चलाता लवलेश तिवारी

अप्रैल में उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से जारी की गई प्रेस रिलीज़ में लिखा था कि तीनों हमलावरों ने अतीक़ और अशरफ़ पर ऑटोमेटिक हथियारों से हमला किया.

अरुण मौर्य, सनी और लवलेश तिवारी के पास से :-

- एक 7.62 बोर की कंट्री मेड पिस्टल

- एक 9 एमएम गिरसान (तुर्की में बनी) पिस्तौल

- एक 9 एमएम जिगाना (तुर्की में बनी) पिस्तौल बरामद की गई.

घटना के समय एक सवाल यह भी उठा था कि आख़िरकार अभियुक्तों को विदेशी बंदूकें कहाँ से मिलीं.

पुलिस सूत्रों की मुताबिक़ 'मास्टरमाइंड' सनी को यह बंदूकें माफिया जितेंद्र गोगी गैंग से मिलीं और एसआईटी ने तीनों पिस्तौलों की बैलिस्टिक जांच रिपोर्ट भी कोर्ट को सौंपी है.

लेकिन जितेन्द्र गोगी की 2021 में रोहिणी अदालत में पेशी के दौरान हमले में हत्या कर दी गई थी.

उत्तर प्रदेश पुलिस ने फ़िलहाल इस बारे में भी कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है.

क्या पुलिसवालों पर कोई कार्रवाई हुई?

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हत्या की रात अतीक़ और अशरफ को 19 पुलिस कर्मी दो गाड़ियों में लेकर मेडिकल परीक्षण करवाने के लिए कॉल्विन अस्पताल पहुंचे थे.

हमले में हुई गोलीबारी में एक कांस्टेबल को भी दाहिने हाथ में गोली लगने की बात एफआईआर में लिखी है.

लेकिन इतनी बड़ी घटना के बाद भी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की बात अभी तक सामने नहीं आई है.

पुलिस के घेरे के बावजूद मीडिया को सुरक्षा घेरे को बार-बार भेद कर अतीक़ और अशरफ़ से सवाल पूछने की कोशिशें काफ़ी दिनों तक टीवी चैनलों पर नज़र आईं.

और हत्या की रात भी सवाल पूछने के बहाने हमलावर अतीक़ और अशरफ़ के बिलकुल क़रीब पहुँच गए थे.

ऐसे में ये सवाल अब भी कायम है कि इन सभी घटनाओं और उनके पहलुओं पर क्या कोई विभागीय जांच की जा रही है या नहीं.

अतीक़ की बहन की सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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इमेज कैप्शन, अतीक़ अहमद की बहन आयशा नूरी

सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले बीबीसी के सहयोगी पत्रकार सुचित्र मोहंती के मुताबिक़, अतीक़ और अशरफ़ की बहन आईशा नूरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने भाइयों की हत्या को पुलिस हिरासत में हुई "एक्स्ट्रा ज्युडिशियल स्टेट स्पॉन्सर्ड" हत्या बताया है.

इसमें वो अपने भतीजे और अतीक़ के बेटे असद के एनकाउंटर की भी निष्पक्ष जांच की मांग की है.

आईशा नूरी ने अपनी याचिका में गंभीर आरोप लगाए हैं.

उन्होंने याचिक में लिखा है कि अतीक़-अशरफ़ की हत्या और असद के एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच इसलिए ज़रूरी है ताकि "हाई लेवल स्टेट एजेंट्स" को पकड़ा जा सके.

याचिका में दावा किया गया है कि इन्हीं एजेंट्स ने एक 'सुनियोजित अभियान' के तहत उनके परिवारवालों को अभियुक्त बना कर उन्हें गिरफ़्तार कर परेशान किया और उनकी हत्या कराई.

सुप्रीम कोर्ट जुलाई में आईशा नूरी की याचिका और उत्तर प्रदेश में हुए एनकाउंटर्स की जांच से जुड़ी जनहित याचिका की भी सुनवाई कर सकता है.

न्यायिक जांच कहाँ तक पहुँची?

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उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने इस मामले में एक जांच आयोग गठित किया था जिसे अतीक़ और अशरफ़ की हत्या के पूरे घटनाक्रम की दो महीने में जांच करने का ज़िम्मा सौंपा गया था.

पहले इस आयोग की अध्यक्षता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज अरविंद कुमार कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी सुबेष कुमार और पूर्व जज बृजेश कुमार सोनी सदस्य बनाए गए.

लेकिन बाद में इस आयोग का विस्तार किया गया और दो और सदस्य बनाए गए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस दिलीप बाबासाहेब भोसले को आयोग की कमान सौंपी गई.

न्यायिक जांच कहाँ तक पहुँची, इस पर भी मीडिया से कोई औपचारिक जानकारी साझा नहीं की गई है.

मीडिया में ख़बरें आई हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ ही दिन पहले जांच आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए तीन महीने का एक्सटेंशन दिया है.

अब कमीशन की रिपोर्ट सितम्बर तक आने की उम्मीद है.

मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से छपा है कि कमीशन के सामने फिलहाल 38 गवाह पेश हुए हैं और अभी 45 और गवाहों के बयान दर्ज होना बाकी हैं.

क्या चार्जशीट सार्वजनिक दस्तावेज़ है?

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जो आपराधिक मामले सुर्ख़ियों में होते हैं, उनमें अक्सर मीडिया मुकदमे में दाखिल होने वाली चार्ज़शीट के आधार पर और उसमे सबूतों के बुनियाद पर घटना की और गहराई से रिपोर्टिंग करने की कोशिश करता है.

यह मीडिया के काम करने का काफ़ी आम तरीका है.

अतीक़ और अशरफ़ की हत्या के मामले में दाखिल हुई चार्ज़शीट के बाद भी मीडिया में उसके कुछ अंश छप रहे हैं.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में दिए अपने एक फैसले में किसी भी आपराधिक मुकदमे में चार्जशीट को सरकारी वेबसाइट पर अपलोड कर साझा करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि एफआईआर एक सार्वजनिक दस्तावेज़ होता है लेकिन चार्जशीट को सार्वजनिक करने की बाध्यता नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि इससे पीड़ित पक्ष और अभियुक्त, दोनों के अधिकारों का हनन होगा और यह सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट के प्रावधानों के विरुद्ध है.

बीबीसी ने एसआईटी का नेतृत्व कर रहे उत्तर प्रदेश के एडीजी भानु भास्कर और प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर रमित शर्मा से जानकारी लेना चाही लेकिन फिलहाल उनसे चार्जशीट और उसके तमाम पहलुओं पर बात नहीं हो पाई है.

बीबीसी औपचारिक माध्यम से जानकारी मिलने पर इस ख़बर को अपडेट करेगा.

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