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सस्ते ड्रोन बने अरबों के निवेश के लिए ख़तरा, ईरान युद्ध के बीच खाड़ी देशों के लिए क्या है आगे का रास्ता?
- Author, लुईस बरूचो
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
खाड़ी के देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, क़तर, ओमान और बहरीन ने बड़ी संख्या में निवेशकों, बड़ी कंपनियों और कुशल कामगारों को अपनी ओर आकर्षित किया है.
इन देशों को लंबे समय से स्थिरता और महत्वाकांक्षा के केंद्र के रूप में देखा जाता है. यहाँ के हवाई अड्डे ग्लोबल हब में बदल गए हैं और इनके शहर दौलत और पर्यटन के केंद्र बन गए हैं.
लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के युद्ध ने इस छवि को हिलाकर रख दिया है, क्योंकि इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने वाली ईरानी मिसाइलों और ड्रोन ने नागरिक और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी नुक़सान पहुँचाया है.
हमलों के बाद इन देशों ने आम ज़िंदगी को जल्द से जल्द पटरी पर लाने की कोशिश की है. मसलन क़तर की सरकार ने रिमोट वर्किंग (घर से काम करना) ख़त्म कर दिया है और यूनिवर्सिटी के क्लास फिर से शुरू कर दिए गए हैं.
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हालाँकि कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भले ही खाड़ी देश इन झटकों को झेलने में सक्षम हों, लेकिन इस युद्ध ने उन्हें अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.
अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट' के एलेक्स वटांका कहते हैं, "आप ईरान की ओर से होने वाले हमलों को रोक नहीं सकते, क्योंकि ये देश ईरान के क़रीब हैं और यह भूगोल से जुड़ा मामला है."
वे कहते हैं, "ये देश अब इस संघर्ष की चपेट में आ गए हैं. वे एक ऐसे युद्ध के सबसे ज़्यादा सामने हैं जो उनका अपना नहीं था, फिर भी उन्हें इसके लिए बहुत भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है."
वे आगे कहते हैं, "भले ही ये देश अपनी सारी दौलत रक्षा-सुरक्षा पर खर्च कर दें, लेकिन हमने देखा है कि ये देश ईरान के लिए बहुत आसान निशाना हैं. इनके अरबों डॉलर के निवेश, कुछ हज़ार डॉलर की कीमत वाले ईरानी ड्रोन के हाथों ख़तरे में हैं."
वटांका का कहना है कि इस असंतुलन के कारण बीमा की लागत बढ़ जाती है, लॉजिस्टिक्स (सामान की आवाजाही) से जुड़ी प्रक्रियाएँ जटिल हो गई हैं, और कंपनियाँ खाड़ी क्षेत्र में अपने निवेश या मौजूदगी के बारे में फिर से सोचने पर मजबूर हो सकती हैं.
स्वायत्तता बनाए रखना
संयुक्त अरब अमीरात स्थित थिंक टैंक एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की अध्यक्ष डॉ. इब्तेसम अल केतबी का तर्क है कि अगर खाड़ी देश अमेरिका और ईरान के बीच एक मुश्किल संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं तो इसका एक तात्कालिक नतीजा यह होगा कि इन देशों को अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध फिर से स्थापित करना होगा.
उनका कहना है कि खाड़ी देशों को "तत्काल सुरक्षा आवश्यकताओं के कारण अमेरिका के क़रीब धकेला जा रहा है और व्यावहारिक तौर पर ख़ामोशी के साथ इसराइल के क़रीब लाया जा रहा है."
हालाँकि वह इस बात पर ज़ोर देती हैं कि यह सहयोग व्यावहारिक है, वैचारिक नहीं.
उनका कहना है, "वे युद्ध में और ज़्यादा गहराई तक घसीटे जाने, प्रमुख निशाना बनने और रणनीतिक स्वायत्तता खोने को लेकर सतर्क हैं."
वटांका चेतावनी देते हैं कि घनिष्ठ सुरक्षा संबंधों की भी सीमाएं हैं - विशेष रूप से खाड़ी देशों की रक्षा करने की अमेरिकी तत्परता के संबंध में.
उनका कहना है कि खाड़ी सरकारों ने संघर्ष से बहुत पहले ही अमेरिका को युद्ध बढ़ने के जोखिमों के बारे में चेतावनी दी थी और वे निराश महसूस कर रहे थे.
वे कहते हैं, "ट्रंप ने युद्ध छेड़ने में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का ज़्यादा ध्यान रखा और खाड़ी देशों की अनदेखी की. वे जानते हैं कि उनके साथ कभी भी इसराइल जैसा व्यवहार नहीं किया जाएगा."
उनका तर्क है कि अमेरिका की घरेलू राजनीति भी इस बात को लेकर एक सीमा तय करती है कि वह दीर्घकालिक रूप से खाड़ी सहयोगियों की रक्षा के लिए कितना आगे बढ़ेगा.
वटांका कहते हैं, "क्या अमेरिकी जनता खाड़ी क्षेत्र में सैन्य अड्डों की संख्या बढ़ाना चाहेगी. यह बात उन्हें कैसे समझाया जाए? क्योंकि यह मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) आंदोलन के मूल तर्क के विपरीत है. दुनिया भर में इस तरह के हस्तक्षेप अमेरिका को अंदर से खोखला कर रहे हैं."
कूटनीति
वटांका कहते हैं कि अपनी तरफ से, ईरान खाड़ी देशों पर दबाव डाल रहा है ताकि वे ख़ुद के तटस्थ होने का संकेत दें.
वो कहते हैं, "ईरान के विदेश मंत्री शिकायत कर रहे थे कि खाड़ी के किसी भी देश ने ईरान पर हुए अमेरिका और इसराइल के हमले की निंदा नहीं की. ईरान उनसे कह रहा है कि 'ख़ुद को इस लड़ाई' से बाहर निकालो."
हालांकि वे कहते हैं कि खाड़ी की सरकारें "ईरान से बहुत नाराज़ हैं, फिर भी वे ख़ुद को मुख्य निशाना बनने से बचाना चाहते हैं.
उनका कहना है कि उनकी रणनीति यह है कि वे अमेरिका या इसराइल के ऑपरेशन्स में सीधे तौर पर शामिल हुए बिना, एक डिटरेन्स पावर का निर्माण करें.
वे बिजली और पानी शुद्ध करने के संयंत्रों पर हमला होने के ख़तरे की ओर इशारा करते हुए करते हैं, "ईरान सचमुच इन देशों में लोगों का जीना मुश्किल कर सकता है. पूरी की पूरी पीढ़ियों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ सकता है."
कुवैत सरकार के पूर्व अधिकारी डॉक्टर बदर मूसा अल सैफ के अनुसार, इसका दीर्घकालिक समाधान कूटनीति में निहित है.
डॉक्टर सैफ अब कुवैत विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं और ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक 'चैटहम हाउस' में एसोसिएट फेलो हैं.
वे कहते हैं, "हमें अपने पड़ोसियों के साथ तालमेल बिठाना होगा. हमें ईरान से सीधे बात करनी होगी. हमें इस बात पर एक स्पष्ट योजना बनानी होगी कि हम अपने पड़ोस को आपस में कैसे साझा करें."
आर्थिक उदारता का इम्तिहान
खाड़ी देशों का तेल आधारित अर्थव्यवस्था से बदलकर ग्लोबल सर्विस हब में बदलना, पिछले एक दशक की उनकी सबसे शानदार आर्थिक उपलब्धियों में से एक रही है.
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि भले ही युद्ध ने इस प्रगति की दिशा को बदला न हो, लेकिन इसने इन देशों की कमज़ोरियों को उजागर ज़रूर कर दिया है.
अल केतबी को उम्मीद है कि खाड़ी देश "प्रमुख केंद्र बने रहेंगे, लेकिन बढ़ती शर्तों के साथ", जिनमें बढ़ा हुआ ख़र्च, बीमा और जोखिम की बढ़ती आशंकाएं शामिल हैं.
उनका तर्क है कि यह बदलाव निजी कंपनियों के बजाय सरकारों पर ज़्यादा निर्भर करेगा, और कारोबारी अब बैकअप रणनीतियां अपना रहे हैं, जैसे कि एक से ज़्यादा केंद्रों से अपना काम चलाना.
अल केतबी का मानना है कि समय के साथ, ये देश अपने व्यापारिक साझेदारों का दायरा बढ़ाएंगे, और शायद अमेरिका पर "अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए" चीन और क्षेत्रीय साझेदारों से फिर से संपर्क साधेंगे.
अल सैफ इस बात से सहमत हैं कि इस क्षेत्र की आर्थिक ताक़त इस झटके को झेलने में मददगार साबित होगी, हालांकि इसकी भी कुछ कीमत चुकानी पड़ेगी.
वह कहते हैं, "हमारी राष्ट्रीय बदलाव की योजना को पूरा करने की दिशा में हमारी प्रगति पर इसका बुरा असर पड़ेगा."
वह बताते हैं कि क़तर के रास लाफ़ान गैस प्लांट पर हुए मिसाइल हमलों से जो नुक़सान हुआ है, उसे ठीक करने में "कुछ साल लग जाएंगे" और मरम्मत के दौरान हर साल क़रीब 20 अरब डॉलर के राजस्व का नुक़सान होगा.
वो कहते हैं, "यह तो बस एक छोटा सा उदाहरण है. लेकिन मुझे लगता है कि हमारे पास इतनी आर्थिक क्षमता है कि हम इस चुनौती का सामना कर सकें. इसके लिए शायद हमें अपने कुछ प्रोजेक्ट्स में कटौती करनी पड़े और अपने निवेश की प्राथमिकताओं को फिर से तय करना पड़े."
हालांकि कुवैत सरकार के पूर्व अधिकारी अल सैफ का मानना है, "जिस तरह से हमारी व्यवस्था बनी हुई है. चाहे वह हमारी राजनीतिक प्रणाली हो, हमारी आर्थिक ताक़त हो, या फिर हमारे पास मौजूद बड़ी पूंजी हो, साथ ही हमारी कम आबादी और हमारे स्पष्ट लक्ष्य हों. इन सब कारणों से हमारे यहां निवेश के ढेरों अवसर मौजूद हैं."
एकीकृत रक्षा प्रणाली
अल सैफ कहते हैं कि आपस में लड़ रहे पक्षों के बीच फंस जाना कोई नई बात नहीं है.
वह 1990 के दशक की शुरुआत में इराक़ के कुवैत पर किए गए हमले और उसके बाद हुए खाड़ी युद्ध का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "2000 के दशक की शुरुआत में हम आतंकवाद का भी शिकार हुए थे और हमने उस चुनौती का भी सफलतापूर्वक सामना किया था."
वह आगे कहते हैं, "अगर आपको याद हो, तो साल 2010 और 2011 की शुरुआत में अरब देशों में विरोध प्रदर्शन हुए थे. इस क्षेत्र में, यानी खाड़ी देशों में भी ऐसे प्रदर्शन हुए थे और हम उन मुश्किल हालात से भी सफलतापूर्वक बाहर निकलने में कामयाब रहे थे."
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संघर्ष का एक नतीजा यह होगा कि खाड़ी देशों की रक्षा व्यवस्था ज़्यादा एकजुट और तकनीकी रूप से ज़्यादा उन्नत हो जाएगी.
अल केतबी का अनुमान है कि शुरुआती वॉर्निंग नेटवर्क, ड्रोन और साइबर क्षमताओं का इस्तेमाल करके लेयर्ड मिसाइल डिफ़ेंस में भारी निवेश किया जाएगा.
अल सैफ का तर्क है कि रक्षा के एकीकरण को और आगे बढ़ना चाहिए.
वे कहते हैं, "हमें अपनी खरीद में तालमेल बिठाने की ज़रूरत है, खाड़ी में एक सेंट्रलाइज़्ड ख़रीद प्रणाली होनी चाहिए. साथ ही, स्थानीय रक्षा उत्पादन पर भी ध्यान देना चाहिए, एक ऐसी प्रक्रिया जो हमारी अपनी क्षमता को बढ़ाए."
हालाँकि इसके बावजूद भी खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता इस महत्वाकांक्षा को मुश्किल बना देती है.
वटांका बताते हैं कि "कुछ खाड़ी देश असल में एक-दूसरे के उतने ही बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं जितने कि वे ईरान के हैं, जो रक्षा सहयोग के मामले को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना देता है."
सतर्कता भरा भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी का भविष्य न केवल ईरान पर, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर भी निर्भर करेगा. जिसमें खाड़ी देशों के आपसी तनाव भी शामिल हैं.
वटांका चेतावनी देते हैं, "यह मान लेना एक भूल होगी कि क्षेत्रीय व्यवस्था के रास्ते में केवल ईरान ही एकमात्र बाधा है. इन देशों का इतिहास एकता से ज़्यादा आपसी फूट का रहा है."
फिर भी, विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी एक प्रमुख वैश्विक केंद्र बना रहेगा, भले ही वह अब ज़्यादा सेना वाले और जोखिमों से भरे संवेदनशील माहौल में काम करेगा.
अल केतबी कहती हैं, "वे पटरी से नहीं उतरेंगे बल्कि उन्हें नए सिरे से व्यवस्थित किया जाएगा. खाड़ी समय के साथ ज़्यादा मज़बूत तो बनेगा, लेकिन साथ ही ज़्यादा उघड़ा और सैन्यीकरण वाला भी हो जाएगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.