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'धुरंधर: द रिवेंज' के बाद वायरल हुए ल्यारी के 'द ग्रैंड ऑपरेशन' वीडियो का क्या है सच
- Author, शुमाइला ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
जब मार्च 2026 में 'धुरंधर: द रिवेंज' सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, तो फ़िल्म की कहानी को असल ज़िंदगी में सामने आने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा.
इंटरनेट पर एक वीडियो तेज़ी से वायरल होने लगा. इस वीडियो को भारत में बड़े पैमाने पर शेयर किया गया, जिसमें दावा किया गया था कि लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी ने ल्यारी में भारतीय जासूसों को पकड़ने के लिए एक 'ग्रैंड ऑपरेशन' चलाया है.
सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में यह दावा किया गया कि यह ऑपरेशन फ़िल्म की जासूसी वाली कहानी से प्रेरित था.
हालांकि, बीबीसी इस वीडियो के असल स्रोतों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर पाया है.
यह वीडियो क्लिप बहुत नाटकीय लग रहा था. पुलिस सड़क किनारे सो रहे एक आदमी को जगाती है, उसकी जांच करती है और फिर उसे जाने देती है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और नज़र आती है.
वायरल वीडियो में साफ़तौर पर दिखाई दे रहे लोगों में से रेड की अगुवाई करने वाले शख़्स यूनुस अमीन हैं. बीबीसी ने अमीन से बात की. वह पोल्ट्री का कारोबार करते हैं और साथ ही एक एंटी नारकोटिक्स एनजीओ के लिए वॉलंटियर भी हैं.
वह इस तरह के ऑपरेशन्स में 'एंटी नारकोटिक्स एंड क्राइम कंट्रोल' (एएनसीसी) के ऑपरेशनल डायरेक्टर के तौर पर शामिल होते हैं.
यह संस्था सामाजिक जागरूकता और नशा मुक्ति के क्षेत्र में काम करती है.
'दावे पूरी तरह से ग़लत हैं'
अमीन ने साफ़ किया कि वायरल हो रहे दावे पूरी तरह से झूठे हैं.
अमीन के मुताबिक़, इस वीडियो का जासूसी या यहां तक कि ल्यारी से भी कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि यह ड्रग्स एडिक्ट्स की पहचान करने और उन्हें रिहैबिलिटेशन सेंटर में भेजने के लिए चलाए जा रहे अभियानों का ही एक हिस्सा था.
उन्होंने बताया, "हमने पांच साल पहले पुलिस के साथ मिलकर ये अभियान शुरू किए थे, ताकि ड्रग्स एडिक्ट्स की पहचान की जा सके और उन्हें रिहैबिलिटेशन के लिए भेजा जा सके."
उन्होंने बताया, "ये वीडियो असल में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित हैदराबाद का था, न कि ल्यारी का. इसका जासूसों की तलाश से कोई लेना-देना नहीं है."
इन ऑपरेशन्स को अक्सर ऑनलाइन 'बड़े ऑपरेशन्स' कहकर ग़लत नाम दिया जाता है. लेकिन असल में ये ड्रग्स एडिक्ट्स की पहचान करने और उन्हें रिहैबिलिटेशन के लिए भेजने की एक शांत कोशिश का हिस्सा हैं. इसमें कभी-कभी ईधी वेलफेयर फाउंडेशन की मदद भी ली जाती है.
अमीन कहते हैं, "इन वीडियोज़ का मक़सद जागरूकता फैलाना है, न कि सनसनी पैदा करना. हम टिकटॉकर्स नहीं हैं. लोग हमारे वीडियो लेकर उन्हें बिना किसी संदर्भ के वायरल कर देते हैं."
ल्यारी की हक़ीक़त
वायरल वीडियो के दावों से उलट ल्यारी की असली कहानी अस्पतालों और घरों में दिखाई देती है.
एक रिहैबिलिटेशन सेंटर के ठीक बाहर अधेड़ उम्र का शख्स इंतज़ार कर रहा है. वह एक दोस्त के लिए इलाज का इंतज़ाम करने की कोशिश में हैं, जिसकी ज़िंदगी पूरी तरह से बिखर चुकी है.
वो बताते हैं, "वह एक साल से क्रिस्टल मेथ ले रहा है. पहले वह यह सब छिपकर करता था, अब तो खुलेआम करता है. वह रात को सोता नहीं और बाहर निकल जाता है. जब हमने उसका पीछा किया, तो हमें पता चला कि वह ड्रग्स ले रहा है."
वह कभी अच्छी खासी कमाई करते थे. उनकी शादी हो चुकी है और वह एक बच्चे के पिता हैं. अब जब वह अपनी लत का ख़र्च नहीं उठा पाते तो चोरी करने लगते हैं.
वहां से कुछ ही कदम दूर, एक महिला पूरे बुर्के में खड़ी थी. उनकी सिर्फ आंखें दिखाई दे रही थीं. और वह चुपचाप अपनी कहानी सुना रही थीं.
यह एक ऐसी कहानी थी जिसे उस इलाके के बहुत से लोग जानते हैं. उनका 20 साल का बेटा पहले कभी रिक्शा चलाकर घर-खर्च में हाथ बंटाता था. लेकिन अब अपनी रातें सड़कों पर भटकते हुए बिताता है.
वो बताती हैं, "वह सो नहीं पाता और उसकी वजह से हम भी जागते रहते हैं. उसे सबसे ज़्यादा इस बात की तकलीफ है कि वह कितना बदल गया है. वह पूरे घर का गुज़ारा चलाता था और अब नशे ने उसे बर्बाद कर दिया है."
वो कहती हैं, "उसे सुधारने की बार-बार की कोशिशें भी नाकाम रही हैं. यह लत छूटती ही नहीं."
जैसे-जैसे वह उसे दिन-ब-दिन कमज़ोर होते देखती हैं, वह बस इतना ही कहती हैं, "उसे इस हाल में देखना बहुत तकलीफ़ देता है."
मोहम्मद इक़बाल जैसे बुज़ुर्गों को यह बदलाव पीढ़ियों का बदलाव लगता है. वह कहते हैं, "पहले हालात इतने बुरे कभी नहीं थे. आज उन्हें हर जगह नशा ही नशा दिखता है. क्रिस्टल मेथ से लेकर गुटखा और तंबाकू तक. पूरी-पूरी पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं."
उन्होंने सवाल उठाया कि गैंगवार खत्म होने के बाद भी नशा बाज़ार में मौजूद कैसे है?
एक नई चुनौती
ल्यारी में पहले गैंग, कब्ज़े और हथियारों वाले झगड़े जैसी समस्याएं थीं. लेकिन वह दौर अब काफी हद तक गुज़र चुका है. लेकिन जिन लोगों ने वह दौर देखा है, उनका कहना है कि आज की चुनौतियां ज़्यादा पेचीदा हैं.
इंस्पेक्टर मुनव्वर हुसैन ने चौधरी असलम की ल्यारी टास्क फ़ोर्स में काम किया था. वो इस इलाके में बदलती नशे की लत के बारे में बताते हैं.
वो बतातें हैं, "पहले अफीम मुख्य नशा हुआ करता था. लेकिन अब लोग 'आइस' और 'क्रिस्टल मेथ' का इस्तेमाल करते हैं. चूंकि नशे के बड़े अड्डों को खत्म कर दिया गया है, इसलिए अब यह समस्या छोटे स्तर पर मौजूद है."
पत्रकार सुल्तान मंध्रो कहते हैं कि किसी चीज़ का गायब हो जाना, उसका पूरी तरह से खत्म हो जाना नहीं होता.
वह समझाते हैं, "2005 से 2013 तक, ल्यारी ड्रग्स बेचने वालों के लिए एक जन्नत जैसा था. जिस तरह आज पान के खोखे और स्टॉल मौजूद हैं, उसी तरह एक ज़माने में नशीले पदार्थ भी खुलेआम बेचे जाते थे. अब इनकी बिक्री अलग-अलग तरीकों से चोरी-छिपे की जाती है. हाल के सालों में नशीले पदार्थ बेचते हुए महिलाओं को भी पकड़ा गया है. ये पुलिस रिकॉर्ड में भी दर्ज है."
बदलाव के संकेत
चुनौतियों के बीच इस संकट से निपटने के प्रयास जारी हैं. ल्यारी में करीब दस लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं. यहां छह से आठ रिहैबिलिटेशन सेंटर हैं- कुछ बड़े और कुछ छोटे. ये न केवल इस इलाके के लिए, बल्कि आस-पास के इलाकों के लोगों के लिए भी काम करते हैं.
इनमें से एक है 'बेनज़ीर शहीद एएनएफ़ मॉडल एडिक्शन ट्रीटमेंट एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर'. ये एंटी नारकोटिक्स फोर्स और सिंध सरकार की संयुक्त देख-रेख में चलता है.
2010 में 100 बिस्तरों के साथ शुरू हुआ यह सेंटर पुरुषों, महिलाओं और युवाओं, सभी का इलाज करता है. यहां के डॉक्टरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में स्थिति में सुधार हुआ है, हालांकि चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं.
डॉक्टर मोहम्मद अली, जो इस केंद्र की शुरुआत से ही यहां सेवा दे रहे हैं, इस बदलाव के बारे में बताते हैं.
वह कहते हैं, "अब स्थिति में काफी सुधार हुआ है. पहले एक ही दिन में 50 से 60 मरीज़ आते थे. अब पूरे एक हफ़्ते में सिर्फ़ 10 से 15 मरीज़ ही लाए जाते हैं."
वह यह भी कहते हैं कि हालांकि सुधार साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संकट पूरी तरह से खत्म हो गया है.
कहानी का बोझ
दशकों से ल्यारी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसा का पर्याय माना जाता रहा है.
यहां के कई लोगों का मानना है कि 'धुरंधर: द रिवेंज' जैसी फिल्में हिंसा और कानून-व्यवस्था की कमी वाली एक पुरानी छवि को ही और मज़बूत करती हैं.
अब्दुल सामी का परिवार यहाँ पीढ़ियों से रह रहा है. वो इस तरह के तस्वीर को सिरे से खारिज करते हैं.
वो बताते हैं, "फिल्म में जो दिखाया गया कि आतंकवादी खुलेआम हथियार लेकर घूम रहे थे, जैसे यहां सरकार का कोई राज ही न हो. असल में ऐसा बिल्कुल नहीं था. यह कोई बिना कानून वाला जंगल नहीं था."
वहीं, कुछ लोग ल्यारी की एक बिल्कुल ही अलग पहचान की ओर इशारा करते हैं.
सोशल एक्टिविस्ट दानिश सूमरो कहते हैं, "ल्यारी दुनिया भर में अपने खेलों के लिए मशहूर है, इसे 'मिनी ब्राज़ील' भी कहा जाता है. ल्यारी की असली पहचान फ़ुटबॉल है, न कि 'धुरंधर' जैसी फ़िल्में."
फिर भी इसके पीछे एक ऐसी आलोचना छिपी है जो रिप्रेजेंटेशन को इकोनॉमिक्स में बदल देती है.
सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद हाशिम कहते हैं, "ये फिल्में, 'धुरंधर वन' और 'टू' भारतीय हैं."
"पाकिस्तान-विरोधी फिल्में वहां अच्छा कारोबार करती हैं. हमारे लिए, ये महज़ कॉमेडी फिल्में हैं. असलियत यह है कि इन्होंने ज़ोरदार कमाई की है. इसलिए, जब इन्होंने ल्यारी के नाम पर इतना कुछ कमाया है, तो इन्हें हमें भी उसमें से कुछ हिस्सा देना चाहिए. हम उसके कुछ हिस्से के हकदार हैं."
ल्यारी के रहने वाले युवा मोहम्मद इरफान ने बेहद तीखे शब्दों में कहा, "जैसा फिल्म में ल्यारी को दिखाया है, वैसा ही ल्यारी हमारे लिए बनाकर दिखाओ."
वह फिल्म में दिखाए गए ज़्यादा साफ-सुथरे और ज़्यादा विकसित ल्यारी की ओर इशारा कर रहे थे.
आज भी ल्यारी रहने के लिए कोई आसान जगह नहीं है. यहां गरीबी बहुत ज़्यादा है, बुनियादी ढांचा कमज़ोर है और ज़रूरी सेवाएं अक्सर भरोसे लायक नहीं होतीं.
अतीत की परछाइयां अब भी यहां मौजूद हैं. 'गैंग हिंसा' से लेकर सालों की अनदेखी तक. लेकिन असलियत इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा है. ल्यारी गलत जानकारियों और खुद को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहे एक समुदाय के बीच उलझा हुआ है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.