डॉ. सवीरा प्रकाश, पाकिस्तान चुनाव में पहली हिन्दू महिला प्रत्याशी से मिलें
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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
डॉक्टर सवीरा प्रकाश पाकिस्तान के उत्तर पूर्वी ख़ैबर पख़्तूनख्वा प्रांत में बूनेर की सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाली पहली हिंदू महिला हैं.
बूनेर एक पश्तून बहुल क़स्बा है और विभाजन से पहले यह स्वात की रियासत का हिस्सा रहा है.
बूनेर ज़िला पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के उत्तर में क़रीब 100 किलोमीटर दूर है.
साल 2009 में तहरीक-ए-तालिबान, जिसने पास की स्वात घाटी को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था, उसने इस्लामिक क़ानून लागू करने के बहाने बूनेर में अपना विस्तार करने की कोशिश की.
उन्होंने प्रमुख जगहों पर चेक पोस्ट स्थापित किए और पहाड़ियों के ऊपर कब्ज़ा कर लिया. बाद में सैन्य अभियान के द्वारा उन्हें वहाँ से खदेड़ा गया.
सवीरा बताती हैं, “पहले बूनेर को ऑपरेशन ब्लैक थंडरस्टॉर्म के लिए जाना जाता था. अब यह अन्य कारणों, ख़ासकर सकारात्मक वजहों से चर्चा में है. एक सामान्य सीट पर उम्मीदवार के रूप में मेरा नामांकन ऐसी ख़बरों में से एक है. मुझे ख़ुशी होती है कि मेरी वजह से अपना क़स्बा चर्चा में है.”
ये बताते हुए उनकी आंखों में चमक दिखती है.
स्वात, बूनेर, निचला दीर और शांगला ज़िलों को तहरीक-ए-तालिबान से छुड़ाने के लिए पाकिस्तानी सेना, एयर फ़ोर्स और नेवी द्वारा संयुक्त रूप से अभियान चलाया गया था, जिसका नाम ब्लैक थंडरस्टॉर्म रखा गया.
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पिता से मिली प्रेरणा
सवीरा प्रकाश के पिता एक डॉक्टर हैं और समाजसेवी हैं. वो 30 सालों से अधिक समय से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सदस्य हैं.
सवीरा कहती हैं कि सामाजिक कार्यों की प्रेरणा उन्हें उनके पिता से मिली है. सवीरा ने अभी अभी अपना काम ख़त्म करके पीपीपी के टिकट पर प्रांतीय विधानसभा सीट के लिए काग़ज़ात जमा कराए हैं.
वो कहती हैं, “जब मैंने राजनीति में जाने का फ़ैसला किया तो उसके पीछे मानवीय पहलू अधिक अहम थे. डॉक्टरी की पढ़ाई के पीछे भी यही प्रेरणा थी. मैं अपने लोगों की मदद करना चाहती थी लेकिन घर के कामों के दौरान मुझे लगा कि मैं बहुत कुछ बदल नहीं सकती. मैं मरीज़ों का इलाज कर सकती थी लेकिन मैं और अधिक करना चाहती थी. मैं सिस्टम बदलना चाहती थी. इसलिए मैंने राजनीति में जाने का तय किया.”
सवीरा बहुत सारे मुद्दों के लिए काम करना चाहती हैं जैसे, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण लेकिन उन्हें महिलाओं के सशक्तीकरण की ज़रूरत अधिक महसूस होती है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, “मेरे इलाक़े में आम तौर पर शिक्षा एक मुद्दा है लेकिन लड़कियों के लिए बहुत कम मौक़े हैं. बहुत सारे लोग अपने बच्चों की शिक्षा का भार नहीं वहन कर सकते, इसलिए वे अपने लड़कों को मदरसा भेजते हैं, जहां शिक्षा निःशुल्क है, लेकिन लड़कियां घर पर भी रह जाएंगी. कुछ मामलों में उन्हें देश के अन्य हिस्सों में घरेलू नौकरानी के रूप में भेज दिया जाता है. मैं इन चीज़ों को ठीक करना चाहती हूं और केवल डॉक्टरी पेशे में रह कर इस बारे में कुछ नहीं कर सकती.”
बूनेर के बारे में सवीरा ने कहा कि यह एक संकीर्ण ज़िला है, जहाँ महिलाओं को अपने घर से बिना पूरी तरह शरीर ढंके या परिवार के किसी सदस्य के बिना साथ के बाहर जाने की इजाज़त नहीं है.
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पार्टी लाइन से अलग मिल रहा समर्थन
ये पूछे जाने पर कि ऐसे माहौल में वो अपना चुनावी अभियान कैसे चलाएंगी, डॉक्टर सवीरा कहती हैं कि शुरू में वो डरी हुई थीं लेकिन नामांकन भरने के बाद मिली प्रतिक्रियाओं से अब उनका सारा डर ख़त्म हो गया है.
वो कहती हैं, “बूनेर से कोई महिला राजनीतिज्ञ नहीं है. कुछ इलाक़ों में तो, पहले महिलाओं को वोट देने की भी इजाज़त नहीं थी. जब मैंने पहली बार नुक्कड़ सभा की, मैं बहुत डरी हुई थी. वहां भाषण देने वाले कुछ पुरुष भी थे, लेकिन मुझे सबसे अधिक तालियां मिलीं. जब मैंने अपना भाषण ख़त्म किया तो लोग एक मिनट तक ताली बजाते रहे.”
सवीरा के अनुसार, केवल अपने परिवार और समर्थकों से ही उन्हें प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है.
“अपनी राजनीतिक लाइन से ऊपर उठकर चारों ओर से लोगों ने अपने पूरे दिल से मेरा समर्थन किया. उन्होंने मुझे ‘बूनेर की बेटी’ और ‘बूनेर का गर्व’ नाम दिया."
"अलग अलग दलों के लोगों ने मेरे पिता से मिलकर बताया कि वे चुनाव में मेरे खड़े होने को लेकर कितने ख़ुश हैं और आने वाले चुनावों में मुझे वोट देने का वादा किया.”
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मानसिकता में बदलाव
सवीरा कहती हैं, “लोगों की मानसिकता बदल रही है. लोगों को अब अहसास होने लगा है कि युवा, महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को मुख्यधारा में लाने और शामिल करने ज़रूरत है. और मैं इन मानदंडों पर खरी उतरती हूं. हर कोई बिना भेदभाव के मेरा समर्थन कर रहा है.”
सवीरा कहती हैं कि एक हिंदू के तौर पर उन्हें कभी भेदभाव नहीं झेलना पड़ा और अपने धार्मिक विश्वासों के कारण न ही कभी उन्हें ग़लत व्यवहार का निशाना बनाया गया.
वो कहती हैं, “हम पश्तून हैं. हमारी अपनी परम्पराएं और रीति रिवाज हैं और वे बहुत समावेशी हैं. हिंदू होने की वजह से कभी भेदभाव नहीं हुआ और न तो हमारे पूर्वज ने विभाजन के बाद भारत पलायन करने के बारे में सोचा. हम हमारा घर है, हम यहीं के रहने वाले हैं.”
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