सागर सोखे CO2, कार्बन बाज़ार से फ़ायदे की उम्मीद

ऑस्ट्रेलिया के नमी वाले तटीय और समुद्री इलाकों की कार्बन सोखने की विशेषताओं पर एक नया <link type="page"><caption> अंतरराष्ट्रीय</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/12/121208_kyoto_doha_vk.shtml" platform="highweb"/></link> शोध होने जा रहा है.
सरकारी वैज्ञानिक और यूनिवर्सिटी शोधकर्ता पड़ताल करेंगे कि दलदल वाले और तटीय क्षेत्र पर्यावरण में पाई जाने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड को किस हद तक नियंत्रित रख सकते हैं.
तीन साल तक चलने वाली 'कोस्टल कार्बन क्लस्टर परियोजना' में ये भी पता लगाया जाएगा कि कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस सागर में कैसे सोख ली जाती है और वहां संरक्षित रहती है.
इस सिलसिले में <link type="page"><caption> ऑस्ट्रेलिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/12/111210_unconf_durban_fma.shtml" platform="highweb"/></link> के उन इलाक़ों के ऊपर से एक विमान उड़ाया गया है जिनकी कार्बन सोखने की क्षमता का वैज्ञानिक पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
ब्लू कार्बन के सिलसिले में ये ऑस्ट्रेलिया का सबसे व्यापक प्रयोग है.
तटीय इलाक़े का पर्यावरण

सिडनी टेक्नोलजी <link type="page"><caption> यूनिवर्सिटी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/10/111018_climate_con_psa.shtml" platform="highweb"/></link> के प्रोफ़ेसर पीटर राल्फ़ कहते हैं, "हम बोटैनी की खाड़ी के उस छोर पर हैं, जहां से ऑस्ट्रेलिया मूल रूप से बसना शुरू हुआ. हम उस क्षेत्र के मध्य में हैं जो कभी समुद्री घास का ज़बरदस्त इलाक़ा हुआ करता था. अब यहां सिर्फ़ 40 फ़ीसदी समुद्री घास ही रह गई है."
उन्होंने बताया कि वनस्पति उगाने से तटीय इलाक़े के पर्यावरण के <link type="page"><caption> कार्बन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2010/11/101125_climate_change_va.shtml" platform="highweb"/></link> को सोख सकते हैं और उसे पौधों या ज़मीन के मुक़ाबले ज्यादा अच्छी तरह संभाल कर रख सकते हैं.
वह कहते हैं, "समुद्री घास का एक एकड़ ज़मीनी जंगल के 40 एकड़ के बराबर होता है, इसलिए ये बहुत ही छोटे इलाक़े हैं. समुद्री घास और जलीय पेड़ पौधों वाला क्षेत्र समूचे समुद्री जल क्षेत्र का सिर्फ़ दो प्रतिशत ही है लेकिन वो कुल समुद्रीय कार्बन का 50 प्रतिशत सोखते हैं और उसे संरक्षित रखते हैं. इसलिए ये बहुत ही छोटा क्षेत्र है लेकिन हमें इसे संरक्षित रखना होगा ताकि जो कार्बन हज़ारों वर्षों से संरक्षित है, उसे हम वापस पर्यावरण में न गंवा दें."
जलवायु परिवर्तन

डॉ. एमिली पिजन पर्यावरण के लिए काम करने वाले एक अमरीकी संगठन ‘कंजरवेशन इंटरनेशनल’ के लिए काम करती हैं.
वह कहती हैं, "ये तटीय पारिस्थितिकी, ये जलीय पेड़ पौधे, समुद्री वनस्पति अंटार्कटिका को छोड़कर सभी द्वीपों पर पाई जाते हैं, तो ये हर उस देश से जुड़ा मुद्दा है जहां समुद्री इलाके हैं."
उन्होंने बताया, "अभी हाल ही में हमने इस बात को महसूस किया है कि ये तटीय तंत्र बड़ी मात्रा में कार्बन को संरक्षित करते हैं और जब हम उन्हें बर्बाद करते हैं या उन्हें नुक़सान पहुंचाते हैं, तो वो कार्बन पर्यावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्रोत बनता हैं और जलवायु परिवर्तन को बढ़ता है. इसलिए इस पारिस्थितिकी को संरक्षित रखना भी जलवायु परिवर्तन का एक समाधान हो सकता है."
इस इरादे से एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्य समूह के सदस्य बोटैनी की खाड़ी में गए ताकि नमी वाले तटीय वाले इलाक़ों में जमा कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा को मापने के नए तरीके तलाश सकें.
विकासशील देश भी तटीय क्षेत्रों में वनस्पति को संरक्षित रख कर अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाज़ार में बड़ी कमाई करने की महत्वकांक्षी योजनाएं बना रहे हैं. हालांकि इसमें कई तरह की दिक्क़तें भी हैं.
किफायती तरीके

कीनियाई वैज्ञानिक जेम्स कैरो बताते हैं, "केन्या सचमुच बहुत ही प्रतिबद्ध है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ख़ासा हताश भी है. कार्बन का व्यापार या कहिए कार्बन का बाज़ार बहुत ही उतार चढ़ावा वाला है. आप अभी अपनी लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं, लेकिन अगले एक साल में वो ध्वस्त हो जाएगा."
इस बीच ऑस्ट्रेलियाई प्रयोगों के परिणामों को सिडनी के एक केंद्र में परखा जाना है.
इनमें CO2 से भरपूर हरे भरे समुद्री घास के मैदानों की तुलना उन समुद्री घास के मैदानों से की जाएगी जिन्हें प्रदूषण या विकास की वजह से नुक़सान हुआ है और जिनसे कार्बन रिस रहा है.
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ता ऐसे किफायती तरीके तैयार कर रहे है जिनसे विकासशील देशों में CO2 के स्तर की निगरानी रखना आसान होगा.
अनुमान है कि दुनिया भर में समुद्री घास के क्षेत्रों और समुद्री पेड़ पौधों की बर्बादी से <link type="page"><caption> पर्यावरण</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070409_greenpeace_energy.shtml" platform="highweb"/></link> में लगभग एक अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड आएगी.
ये जापान के कुल सालाना उत्सर्जन के बराबर है.
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