परमाणु हमले में ब्रिटेन-चीन बर्बाद हो गए तो?

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन के पहले परमाणु परीक्षण के बाद वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के मॉन्टे बेलो द्वीप के ऊपर धुएं का गुबार
    • Author, रूथ एलेक्ज़ेंडर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कहा जाता है कि दुनिया में 9 देशों के पास न्यूक्लियर बम और मिसाइलें हैं. भारत इन देशों में से एक है.

आपके मन में ये सवाल आ सकता है कि आख़िर एटमी मिसाइल लॉन्च कैसे की जाती हैं?

इस लेख की पिछली कड़ी में हमने रूस और अमरीका में न्यूक्लियर मिसाइल छोड़ने की प्रक्रिया पर बात की थी.

लेकिन ये सवाल फिर भी रह जाता है कि ब्रिटेन और चीन जैसे बाक़ी देशों में न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च करने की क्या प्रक्रिया है.

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन के पहले परमाणु परीक्षण से पहले ट्रेनिंग लेते रॉयल एयरफोर्स के मेंबर, तस्वीर 20 मार्च 1956 की है

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री

ब्रिटेन के रहने वाले प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी ने साइलेंट डीप नाम की क़िताब लिखी है, जो ब्रिटिश नौसेना की पनडुब्बियों की कहानी है. ब्रिटेन भी एटमी हथियारों से लैस देश है.

ब्रिटेन के पास ट्राइडेंट एटमी मिसाइलों से लैस वैनगार्ड नाम की चार पनडुब्बियां हैं. इनमें से एक हमेशा ही उत्तरी अटलांटिक महासागर में तैनात रहती है.

इसकी ज़िम्मेदारी, ब्रिटेन पर हमले को रोकना और पलटवार करना है.

प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी बताते हैं कि ब्रिटेन में प्रधानमंत्री को न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च करने का आदेश देने का अधिकार होता है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, रॉयल नेवी को एटमी हमले का आदेश देते हैं. ये हमला ब्रिटेन की वैनगार्ड क्लास की पनडुब्बी से किया जा सकता है.

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लास्ट रिजॉर्ट

इसके लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री, नौसेना के दो अधिकारियों को मिसाइल लॉन्च का अपना कोड बताते हैं. इसके बाद वो दोनों नेवल ऑफ़िसर, अपने-अपने कोड बताते हैं.

कोड बताने की ये प्रक्रिया, लंदन के बाहर स्थित एक बंकर में पूरी की जाती है. यहीं से महासागर में तैनात पनडुब्बी को एटमी मिसाइल लॉन्च करने का आदेश जारी किया जाता है.

प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी बताते हैं कि पनडुब्बी में भी दो अधिकारी, वायरलेस के ज़रिए संदेश पाते हैं और फिर अपने-अपने कोड का मिलान करके मिसाइल लॉन्च के लिए तैयार करते हैं.

ब्रिटेन में जब कोई प्रधानमंत्री बनता है, तो वो एटमी मिसाइलों वाली चार पनडुब्बियों को ख़त लिखता है. इस चिट्ठी को लास्ट रिजॉर्ट कहा जाता है.

ये चिट्ठी पनडुब्बी के सेफ में रखी जाती है. इसे तभी पढ़ा जाना होता है जब ब्रिटेन का किसी हमले में पूरी तरह से नाश हो गया हो.

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इमेज कैप्शन, चीन के जनरल चियांग काई-शेक अमरीकी पनडुब्बी स्वोर्डफिश पर, तस्वीर 19 अप्रैल 1960 की है

चीन की नीति

जब ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बदलते हैं, तो ये चिट्ठी नष्ट कर दी जाती है. फिर नए प्रधानमंत्री अपनी तरफ़ से चिट्ठी लिखते हैं. इसमें क्या होता है, ये अब तक किसी को नहीं पता.

टोंग जाओ, बीजिंग स्थित कार्नेगी चिन्हुआ सेंटर फॉर ग्लोबल पॉलिसी से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि चीन भले ही एटमी ताक़त हो, मगर उसकी नीति पहले न्यूक्लियर अटैक करने की नहीं है. इसकी एक वजह ये भी है कि चीन के पास अभी ऐसी क्षमता नहीं है कि वो अपने ऊपर होने वाले संभावित परमाणु हमले का पहले पता लगा सके.

टोंग जाओ कहते हैं कि चीन एटमी हमला तभी करेगा, जब उसके ऊपर ख़ुद परमाणु हमला हो चुका हो. यानी चीन में न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च, दुश्मन से पहले करने की नीति नहीं है.

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कंट्रोल किसके पास?

टोंग के मुताबिक़ चीन पर परमाणु हमला होने पर, वहां के ज़िम्मेदार लोग पहले हमले की तस्दीक़ करेंगे. फिर इस परमाणु हमले से हुए नुक़सान की समीक्षा करेंगे. इसके बाद वो बदले की कार्रवाई के विकल्पों के बारे में सोचेंगे.

मगर तब क्या होगा अगर किसी एटमी हमले में चीन के सभी बड़े नेता और सैन्य कमांडर मारे जाएं? या दुश्मन के हमले में चीन की एटमी मिसाइलें तबाह कर दी जाएं.

ऐसी आशंका से निपटने के लिए चीन ने काफ़ी तैयारी कर रखी है. किसी हमले की सूरत में बड़े नेताओं को बचाने के लिए पहाड़ों के नीचे, गहरी सुरंगें बनाई गई हैं.

चीन में एटमी हमले का आख़िरी फ़ैसला किसके हाथ में होता है, ये बात किसी को पता नहीं.

टोंग जाओ अंदाज़े से बताते हैं कि हमला होने पर शायद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का पोलित ब्यूरो, चीन के सैन्य आयोग से मशविरा करके इसका फ़ैसला करे. इसमें चीन के राष्ट्रपति का क्या रोल होगा, किसी को नहीं पता.

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थिंक टैंक की राय

टोंग जाओ के मुताबिक़, हो सकता है कि अपने ऊपर हमला होने के कई हफ़्तों या महीनों बाद चीन पलटवार करे, क्योंकि शुरुआत से ही चीन, पहले एटमी हमला करने की पश्चिमी देशों की नीति का विरोधी रहा है.

हाल ही में चीन की रॉकेट फ़ोर्स ने एटमी हमला होने की सूरत में पलटवार की ड्रिल की थी. जिसमें उन्होंने न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च करने का आदेश आने का हफ़्तों इंतज़ार किया था.

हालांकि अब चीन की नीति में भी बदलाव के संकेत हैं. चीन के कई थिंक टैंक मानते हैं कि अमरीका या रूस के राष्ट्रपतियों की तरह चीन के राष्ट्रपति के पास भी एटमी हमले का आदेश देने का अधिकार होना चाहिए. ताकि वो दुश्मन के हमले की आशंका देखकर बचाव में पहले ही हमला करने का आदेश जारी कर सकें.

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इंसानियत की तबाही

चीन इन दिनों बड़े ताक़तवर रडार विकसित कर रहा है, जो चीन की तरफ़ आने वाली मिसाइलों का पता लगा सकेंगे.

हो सकता है कि अगले कुछ सालों में एटमी हमले को लेकर चीन भी पहले इस्तेमाल न करने की अपनी नीति बदल दे.

इन मिसालों से साफ़ है कि एटमी हमला करने के लिए आपके पास ऐसा कमांड और कंट्रोल सिस्टम होना चाहिए, जिसकी मदद से कहीं से भी, कभी भी न्यूक्लियर अटैक का आदेश जारी किया जा सके.

हालांकि जानकार कहते हैं कि सही-सलामत दिमाग़ वाले किसी भी शख़्स के ज़हन में एटमी हमला करने का ख़याल नहीं आएगा. क्योंकि उसे पता है कि न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च करने का मतलब होगा, इंसानियत की तबाही.

यानी एटमी मिसाइल लॉन्च करने के लिए किसी भी शख़्स को अपने दिमाग़ का सेफ्टी कैच हटाना होगा. और ऐसा करने वाला कोई पागल ही होगा.

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