You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
श्रीलंका में अराजक हुए हालात, महिंदा राजपक्षे के इस्तीफ़े से क्या होगा
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
एक देश जहां...
लोगों के लिए अनाज कम पड़ रहा है
इलाज के लिए दवाइयां नहीं हैं
विदेशी कर्ज़ चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं
राजनीतिक स्थिरता नहीं रही
16-16 घंटों तक बिजली की कटौती
एटीएम खाली हैं
एक महीने के भीतर दो बार आपातकाल
ये बातें उस देश के संदर्भ में हैं, जिसे एक समय उसकी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए जाना जाता था.
अंग्रेज़ों की 150 साल की हुक़ूमत के बाद साल 1948 में आज़ाद होने वाला श्रीलंका, आज़ादी के बाद के अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है.
सोमवार को देश के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. राष्ट्रपति उसे स्वीकार करते हैं या नहीं, यह आज स्पष्ट हो जाएगा.
स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, राष्ट्रपति भवन में गोटाबाया राजपक्षे के नेतृत्व में सोमवार को हुई बैठक में शामिल महिंदा राजपक्षे से इस्तीफ़ा देने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने मान लिया.
इस्तीफ़ा देने से पहले राजपक्षे ने क्या कहा
श्रीलंका में कैबिनेट को सूचना दी गई कि प्रधानमंत्री राजपक्षे ने देश के ख़राब आर्थिक हालात को संभालने में नाकाम रहने का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दिया है. उनके इस्तीफ़े से कैबिनेट भी भंग हो गई है.
राजपक्षे ने इस्तीफ़ा देने से पहले कहा कि अगर उनके इस्तीफ़े से देश का मौजूदा आर्थिक संकट ख़त्म होता है तो वो इसके लिए तैयार हैं.
हालांकि जानकार इसे सीधे तौर पर जनता के विरोध का नतीज़ा मानते हैं.
मार्च के आख़िर से ही श्रीलंका की राजधानी में प्रदर्शन जारी हैं. परेशान लोग सड़कों पर उतर चुके हैं, वो राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से गद्दी छोड़ने की माँग कर रहे हैं, वो नारे लगा रहे हैं- 'गो गोटाबाया गो'.
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में मौजूद बीबीसी संवाददाता अर्चना शुक्ला बताती हैं कि पीएम राजपक्षे ने इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला जनता के दबाव में तो लिया ही है, साथ ही यह उनकी ख़ुद की पॉलिटिकल पार्टी में आयी दरार की वजह से भी है.
वह कहती हैं, "राजपक्षे का इस्तीफ़ा बिल्कुल जनता के दबाव का नतीजा है. साथ ही उनकी ख़ुद की पार्टी में जिस तरह के दरार की ख़बर आ रही थी, उसके कारण भी है."
अर्चना के मुताबिक़, बीते कुछ दिनों से पीएम और राष्ट्रपति के बीच मनमुटाव की ख़बरें आ रही थीं. जहाँ पर ऐसा भी कहा जा रहा था कि राष्ट्रपति चाहते हैं कि पीएम ख़ुद से इस्तीफ़ा दे दें. अविश्वास प्रस्ताव से पहले. तो अंदरूनी तौर पर काफ़ी दबाव था. इसके अलावा जिस तरह लोग हफ़्तों से प्रदर्शन कर रहे थे, उस दबाव को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है."
लेकिन क्या इस्तीफ़े से यह समस्या सुलझ जाएगी
प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने यह कहते हुए इस्तीफ़ा दिया है कि अगर उनके इस्तीफ़ा देने से हालात बदलते हैं, तो वह इसके लिए तैयार है. लेकिन क्या उनके इस्तीफ़े से कुछ बदलेगा?
अर्चना के मुताबिक़, "फ़िलहाल सुधार की बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती है लेकिन इतना ज़रूर है कि यहाँ अनिश्चितता बहुत बढ़ गई है."
वह कहती हैं, "देश के सामने सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक संकट का है और सबसे पहले उसी से निपटे जाने की ज़रूरत है. लोगों को तेल, गैस, दवाइयां नहीं मिल रही हैं. उसके लिए श्रीलंका अभी दूसरे देशों पर निर्भर है. विश्व बैंक पर निर्भर है. दूसरे देशों से इमर्जेंसी के रूप में मिलने वाले कर्ज़ पर निर्भर है. इस आर्थिक संकट को डील करना सबसे अधिक ज़रूरी है''
''लेकिन वो सारे प्रोग्राम या बातचीत जो राजपक्षे सरकार आर्थिक रिकवरी के लिए प्रयास के तौर पर कर रही थी, उन सब पर अब एक विराम सा लग गया है. अब वो सारे प्रोग्राम आगे कैसे बढ़ेंगे इसे लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, क्योंकि यहाँ कोई सरकार नहीं है. ऐसे में अब अगली सरकार कौन सी होगी और कौन है जो देनदारों से बातें करेगा, इसे लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है. "
वह कहती हैं कि जिस तरह से आज हिंसा भड़की है, वो भी अपने आप में चिंता की बात है. इस लिहाज से इस्तीफ़े से कुछ फ़ायदा फ़िलहाल तो होता नहीं दिख रहा है.
श्रीलंका की राजनीति को नज़दीक से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार टीआर रामचंद्रन कहते हैं, "श्रीलंका के मौजूदा हालात बहुत ही गंभीर हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि आर्थिक तौर पर उनकी हालत बहुत ख़राब है. उनके पास सरकार चलाने के लिए पैसे नहीं हैं. वे जहाँ-जहाँ से क़र्ज़ ले सकते हैं, उसकी तलाश में हैं. लोगों में जो निराशा है, अपनी लीडरशिप को लेकर, उसे नेता ले नहीं पा रहे है. ऐसी स्थिति में श्रीलंका ऐसी जगह आकर खड़ा हुआ है कि उसके पास पैसे नहीं हैं और आम जनता की रोज़मर्रा की चीज़ें काफ़ी महंगी और पहुंच से दूर हो गई हैं. अगले कुछ दिनों में ये चीज़ें इनकी पहुँच से और भी बाहर हो सकती हैं."
वह कहते हैं, "स्थिति सुधरने की उम्मीद में ये इस्तीफ़े मांगे जा रहे हैं. लेकिन इस्तीफ़ा दे दिया गया तो हालात तुरंत तो दुरस्त नहीं हो जाएंगे. इसे सुधारने में वक़्त लगेगा और क़दम भी उठाने होंगे. आर्थिक मोर्चे पर उनकी हालत इतनी गई गुज़री है कि आसानी से ठीक नहीं होने वाली. मेरे ख़याल से श्रीलंका की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति अभी इतनी ख़राब है कि उन्हें बहुत सख़्ती से काम लेना होगा. नहीं तो श्रीलंका की हालत अभी तो ख़राब है ही, उससे पता नहीं कितना ख़राब होगा."
भारत के साथ रिश्तों पर क्या असर होगा
अब जबकि श्रीलंका में कैबिनेट भंग हो गई है तो श्रीलंका और भारत के रिश्ते का भविष्य क्या होगा? इस सवाल के जवाब में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फ़ॉर साउथ इंडियन स्टडीज़ के चेयरपर्सन संजय भारद्वाज कहते हैं कि भारत, श्रीलंका को लेकर हमेशा से सकारात्मक रहा है और इस मुश्किल घड़ी में भी वो श्रीलंका के साथ बना रहेगा.
संजय भारद्वज कहते हैं, "श्रीलंका की मौजूदा स्थिति के लिए राजपक्षे बंधुओं की नीतियां काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार रही हैं. उनका चीन के प्रति झुकाव भी भारत की तुलना में अधिक रहा लेकिन इस संकट की घड़ी में जिस तरह भारत ने राशनिंग से लेकर पेट्रोलियम ख़रीद तक के लिए श्रीलंका की मदद की, भारत की छवि और स्पष्ट हो गई है."
संजय भारद्वाज मानते हैं कि भारत नेबरहुड-फ़र्स्ट की पॉलिसी का पालन आगे भी जारी रखेगा. वह कहते हैं, "जैसी श्रीलंका की स्थिति है और जिस तरह भारत बड़े भाई की भूमिका में मददगार बनकर खड़ा है, उससे श्रीलंका में अगर कोई नई सरकार भी आती है तो उसके लिए यह तय कर पाना बहुत आसान होगा कि उसका दोस्त कौन है."
टीआर रामचंद्रन कहते हैं कि श्रीलंका के ऐसे हालात को और देश के साथ भारत भी जान रहा है. भारत बहुत क़रीब से उसके हालात पर नज़रें बनाए हुए है. भारत अपनी ओर से कोशिशें कर रहा है कि वे जितनी मदद कर सकता है कर रहा है.
वह कहते हैं, "भारत और श्रीलंका के रिश्ते बहुत ख़राब नहीं होने वाले. भारत उनकी मदद करने को तैयार है. भारत ने उनकी मदद पहले भी की है और आने वाले दिनों में जो भी ज़रूरत होगी उसे पूरी करने को तैयार है. श्रीलंका के कई ऐसे नेता हैं जो मानते होंगे कि भारत उनकी जो मदद कर रहा है वो बड़े भाई के नाते नहीं बड़े देश के नाते घमंड से मदद कर रहा है. लेकिन श्रीलंका के पास कोई और चारा नहीं है. भारत के अलावा कोई और बड़ा देश नहीं है जो उनकी मदद कर रहा है. भारत ने तो हर लिहाज से मदद की है. बड़े देश तो उनकी मदद के लिए आए ही नहीं हैं."
श्रीलंका में यह स्थिति बनी कैसे?
पिछले कई महीनों से देश में महंगाई दर दहाई अंकों में हैं. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद श्रीलंका का संकट कहीं ज़्यादा गहराया है.
अधिकारियों का कहना है कि कोरोना महामारी के असर और यूक्रेन युद्ध के कारण क़र्ज़दारों को क़र्ज़ों की अदायगी 'असंभव' बन गई है. हालांकि जानकारों का कहना है कि श्रीलंका में संकट कई सालों से पनप रहा था, जिसकी एक वजह सरकार का ग़लत प्रबंधन भी माना जाता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, पिछले एक दशक के दौरान श्रीलंकाई सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं के लिए विदेशों से बड़ी रक़म कर्ज़ के रूप में ली. बढ़ते कर्ज़ के अलावा कई दूसरी चीज़ों ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट की. जिनमें भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं से लेकर मानव निर्मित तबाही तक शामिल है. इसमें रासायनिक उर्वरकों पर सरकार का प्रतिबंध शामिल है, जिसने किसानों की फसल को बर्बाद कर दिया.
कुछ जानकार देश के मौजूदा हालात के लिए राजपक्षे परिवार और उसकी ग़लत नीतियों को भी वजह मानते हैं.
दिल्ली की जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में सेंटर फोर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर पी सहदेवन ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि इस संकट के लिए राजपक्षे परिवार को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
उनका मानना है कि जो सरकार सत्ता में है, उसी को ग़लत ठहराना होगा क्योंकि उन्हें पता था कि चुनौतियाँ क्या हैं और उन्होंने कुछ नहीं किया, बल्कि लुभावनी नीतियाँ चलाते रहे.
श्रीलंका में सड़कों पर उतरे लोग
बढ़ते आर्थिक संकट और रोज़ाना की ज़रूरतों के पूरी नहीं होने के कारण मार्च के अंत में लोगों का ग़ुस्सा फूट पड़ा. ग़ुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए.
मार्च के अंत में राजधानी कोलंबो की सड़कों पर उतरकर सरकार से कार्रवाई और जवाबदेही की मांग की. प्रदर्शन कर रहे लोगों ने राष्ट्रपति के निजी आवास के बाहर ईंटें फेंकीं और आग लगा दी.
पुलिस ने विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया और उसके बाद 36 घंटे का कर्फ्यू लगा दिया. ये प्रदर्शन अब भी जारी हैं. हालांकि वे काफ़ी हद तक शांतिपूर्ण रहे हैं.
राष्ट्रपति राजपक्षे ने एक अप्रैल को राष्ट्रव्यापी आपातकाल की घोषणा की, जिससे अधिकारियों को बिना वॉरंट के लोगों को हिरासत में लेने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने का अधिकार मिल गया.
लेकिन कर्फ्यू की परवाह किए बिना प्रदर्शन अगले दिन और बढ़ गए, जिसके बाद पुलिस ने सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया.
इसके बाद आपातकाल के अध्यादेश को पाँच अप्रैल को रद्द कर दिया गया. लेकिन प्रदर्शन जारी रहे. 29 अप्रैल को सरकार पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बढ़ाते हुए सैकड़ों ट्रेड यूनियन ने बड़े पैमाने पर हड़ताल और प्रदर्शन किए. इसकी वजह से देशभर में स्कूल, दुकानें, बैंक और ट्रांसपोर्ट सेवाएं बंद रहीं.
इसके बाद एक महीने के भीतर ही छह मई की मध्यरात्रि से एक बार फिर देश में आपातकाल लागू कर दिया गया. यह आपातकाल अब भी जारी है.
श्रीलंका की सरकार का क्या कहना है
राष्ट्रपति राजपक्षे ने चार अप्रैल को एक बयान जारी किया और सभी दलों से "जनता और आने वाली पीढ़ियों के लिए मिलकर काम करने" की अपील की थी.
उन्होंने कहा था, "मौजूदा संकट कई आर्थिक और वैश्विक कारणों का नतीजा है और लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर इसका समाधान खोजा जाना चाहिए."
इसके अलगे दिन कैबिनेट फेरबदल की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा कि राजपक्षे ने "देश के सामने खड़ी आर्थिक चुनौती से उबरने के लिए सभी लोगों का समर्थन मांगा है."
इससे पहले, राजपक्षे ने पिछले महीने राष्ट्र के नाम एक संबोधन में कहा था कि वो इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा था कि "ये संकट मैंने खड़ा नहीं किया है."
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)