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राजस्थानः नमाज़ियों के लिए जगह कम पड़ी तो हिंदू परिवार के 5 भाइयों ने दान की ज़मीन
- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- ........से, नीमकाथाना से लौटकर
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
राजस्थान के सीकर ज़िले के नीमकाथाना इलाक़े का गुहाला गांव इन दिनों चर्चा में है.
क़रीब सात हज़ार की आबादी वाले इस गांव में हाल ही में एक हिंदू परिवार के पांच भाइयों ने अपनी ज़मीन का एक हिस्सा ईदगाह के लिए दान कर दिया है.
उदयपुरवाटी को जाती मुख्य सड़क पर गुहाला गांव है. गांव के मुख्य बाज़ार के दोनों ओर सदियों पुरानी हवेलियां गांव के इतिहास की गवाही दे रही हैं.
यह रास्ता गांव के भीतर से एक गौशाला के सामने से होता हुआ सांवाली ढाणी तक पहुंचता है. यहीं भोपाल राम सैनी और उनके अन्य भाई रहते हैं.
घर के बाहर पुराना ट्रैक्टर खड़ा है. सामान्य सा घर है वहां अपने पोते के साथ बैठे हैं भोपाल राम सैनी.
उनके घर के दोनों तरफ ही सामान्य से घर उनके भाइयों के हैं. और ठीक सामने लहलहा रही गेहूं की फसल उनके ही खेतों में खड़ी है. खेतों के अंतिम छोर पर एक ईदगाह दिखाई पड़ती है.
खेतों से सटी इसी ईदगाह के लिए उन्होंने अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा दान कर दिया है.
ईदगाह छोटी पड़ने लगी थी
गुहाला समेत आसपास के कई गांवों से बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग ईद के मौके पर यहां नमाज़ अदा करने आते हैं. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ईदगाह की नींव बहुत पुरानी है.
लेकिन, समय के साथ नमाज़ियों की संख्या बढ़ती गई और जगह कम पड़ने लगी.
65 साल के हाजी मोहम्मद तौफ़ीक बताते हैं, "ईद के दिन यहां इतनी भीड़ हो जाती थी कि लोगों को खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती थी. आसपास के कई गांवों में ईदगाह की सुविधा नहीं है, इसलिए सब यहीं आते हैं."
वह कहते हैं कि इस समस्या को लेकर हमने इन भाइयों से बात की. इन भाइयों ने ईदगाह के लिए बिना किसी कीमत के ज़मीन देने की इच्छा ज़ाहिर की.
ईद पर ईदगाह में नमाज के लिए पहुंचे सैकड़ों नमाज़ियों की मौजूदगी में इन भाइयों का स्वागत सम्मान भी किया गया. जिसका वीडियो सामने आने के बाद इस पहल की खूब तारीफ़ हुई.
पैसे लेने से किया इनकार
ईदगाह के बगल में जिन खेतों की बात हो रही है. वे गांव के पांच सैनी भाइयों के हैं. इनमें से एक 45 साल के पूरणमल सैनी बताते हैं, "जब उनसे ईदगाह के लिए थोड़ी ज़मीन देने की बात कही गई. तो उन्होंने बिना हिचक हामी भर दी."
वह कहते हैं, "हमारा मुसलमान भाइयों से पहले से ही प्यार है. उन्होंने ज़मीन मांगी तो हमने कह दिया ले लो. मुसलमान भाइयों ने पैसे देने की पेशकश की लेकिन हमने आपसी प्यार में पैसा लेने से इनकार कर दिया."
पूरणमल के मुताबिक, "उन्होंने न सिर्फ ज़मीन दी बल्कि ईदगाह की बाउंड्री बनवाने में भी खुद हिस्सा लिया."
उनके भाई भोपाल राम सैनी भी इस फ़ैसले से ख़ुश हैं.
वह कहते हैं, "यहां हज़ार-बारह सौ लोग नमाज़ पढ़ने आते हैं. जगह कम थी तो हमने दे दी. इसमें सोचने जैसा कुछ नहीं था और ज़रूरत होगी तो और ज़मीन दे देंगे.
विरोध भी हुआ
अधिकतर लोग इस फ़ैसले को एक संदेश की तरह देख रहे हैं, लेकिन यह फ़ैसला सभी को एक जैसा नहीं लगा.
पूरणमल बताते हैं, "कुछ रिश्तेदारों और परिचितों के फोन आए और उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को ज़मीन क्यों दी. कुछ अन्य लोगों ने भी फोन कर कहा कि मुसलमान को ज़मीन क्यों दी, हिंदुओं के मंदिर के लिए मांगते तो?"
"हमने कहा कि कोई हिंदू भी मांगेगा तो उसे भी देंगे. हमारे लिए सब बराबर हैं."
वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उन्होंने यह कदम किसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपने विश्वास और आपसी प्यार के आधार पर उठाया.
उन्होंने कहा, "हम मज़दूरी और खेती करते हैं. हम यहां सालों से आपसी प्यार प्रेम से रहते आए हैं. हम और हमारे बच्चे सभी भाईचारे के साथ रहते हैं."
गांव का ताना-बाना
गुहाला गांव का सामाजिक ढांचा भी इस कहानी को समझने में अहम भूमिका निभाता है. बीती जनगणना के मुताबिक गुहाला गांव की आबादी करीब सात हज़ार की है.
अब्दुल रशीद कहते हैं, "यहां छत्तीस कौम रहती हैं. इनमें करीब पच्चीस प्रतिशत मुसलमान, इतने ही अनुसूचित जाति और पच्चीस प्रतिशत ही सैनी समुदाय के लोग हैं. बाकी अन्य समुदायों के लोग भी यहां रहते हैं."
गुहाला गांव का इतिहास भी दिलचस्प रहा है, यहां पर सदियों पुरानी हवेलियां यहां की संपन्नता की कहानी बयान करती हैं.
अब्दुल रशीद और ग्रामीणों के मुताबिक साल 1990 से पहले गुहाला गांव सीकर ज़िले की एक बड़ी पंचायत हुआ करती थी और परिसीमन के बाद आस-पास के कई गांव इसी से अलग होकर पंचायत बने हैं.
कभी यह गांव गुड़ की बड़ी मंडी के रूप में भी जाना जाता था. हरियाणा के नारनौल के बाद बड़ी गुड़ मंडी यही कहलाती थी.
हालांकि, पानी की कमी के चलते यहां से लोगों का पलायन हुआ और गांव की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ा. इसके बावजूद गांव के सामाजिक रिश्तों में कोई दरार नहीं आई.
गांव के एक बुजुर्ग भीमा राम करीब 60 साल के हैं. खेतों से काम कर लौट रहे थे. वह बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "यहां का माहौल हमेशा से ऐसा ही रहा है. हम बचपन से देख रहे हैं कि सब साथ रहते हैं. कोई भेदभाव नहीं है. हमारे यहां तो यही तरीका है और हमारे बुजुर्ग भी इसी भाईचारे के साथ रहते आए हैं."
वह एक पुराना किस्सा याद करते हैं. मुस्कुराते हुए कहते हैं, "एक मुसलमान भाई निजामुद्दीन थे. वह फेरी करने दूसरे गांवों में जाते थे. जब लौटने में रात हो जाती थी तो हमारे घर आकर रुक जाते थे. इतना विश्वास और प्यार रहा है हमारे बीच."
'झोली फैलाकर मांगी थी ज़मीन, भाई बनकर दी'
भोपाल राम सैनी के घर के ठीक सामने उनके खेतों के बगल बनी ईदगाह पर मौजूद हाजी मोहम्मद तौफ़ीक इस पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं.
वह बीबीसी से ईदगाह के बारे में बात करते हुए कहते हैं, "हमने इनसे झोली फैलाकर ज़मीन मांगी थी. इन्होंने दिल खोलकर दे दी, बड़ी दरियादिली दिखाई हमारे भाइयों ने."
तौफ़ीक बताते हैं, "जब उन्होंने ज़मीन देने की बात कही तो हमने इसकी कीमत चुकाने की पेशकश भी की थी. हमने कहा था कि पैसे ले लो लेकिन इन्होंने मना कर दिया."
वह यह भी बताते हैं कि ज़मीन मिलने के बाद ईदगाह की बाउंड्री बनाने का काम भी इन भाइयों की देख-रेख में हुआ. नींव खुदवाने से लेकर पत्थर लगाने तक ये लोग हमारे साथ खड़े रहे.
अब्दुल रशीद कहते हैं, "कुछ ही दिनों में ईदगाह के नाम पर रजिस्ट्री कराने की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी."
गांव के निवासी अब्दुल रशीद इस पहल को एक बड़े संदेश के तौर पर देखते हैं. वो कहते हैं, "आजकल माहौल जैसा है उसमें यह बहुत बड़ी बात है. इन्होंने दिखाया है कि भाईचारा क्या होता है."
मोहम्मद ईशाक कांवट बीबीसी से कहते हैं, "इस फ़ैसले का असर आस-पास के गांवों पर भी पड़ा है. लोग यहां आकर देख रहे हैं और बात कर रहे हैं. एक अच्छा संदेश गया है."
"हमारी शेखावाटी धरती का हमेशा से इतिहास रहा है कि राजस्थानी संस्कृति में हम एक दूसरे के धार्मिक विवाह समारोह में भात भरना जैसे रिवाजों में भी सहभागिता करते हैं."
आगे कहते हैं कि, देश के मौजूदा माहौल में जहां अक्सर धार्मिक पहचान के आधार पर खींची गई लकीरें गहरी होती दिखती हैं. गुहाला की यह कहानी एक अलग तस्वीर पेश करती है. यह कहानी सिर्फ़ ज़मीन दान करने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है जो सालों में बनता है.
गुहाला के लोग इसे कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मानते. उनके लिए यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है. लेकिन, शायद यही इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत भी है जहां इंसानियत किसी बहस का विषय नहीं बल्कि एक सामान्य व्यवहार है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.