अमेरिका चुनाव 2020: डोनाल्ड ट्रंप की हार की ये वजहें रहीं
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- Author, निक ब्रायंट
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, न्यूयॉर्क (अमेरिका) से
2020 का अमेरिकी चुनाव बहुत से लोगों की उस ग़लत धारणा को हमेशा-हमेशा के लिए दूर करता है जो यह मानते रहे कि '2016 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत एक ऐतिहासिक दुर्घटना थी.'
डोनाल्ड ट्रंप को इस बार 70 मिलियन यानी 7 करोड़ से ज़्यादा वोट मिले हैं जो अमेरिका के इतिहास में दूसरा सबसे बड़ा वोटिंग नंबर है.
राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें 47 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं और फ़्लोरिडा-टेक्सस जैसे अपने पसंदीदा राज्यों समेत 24 राज्यों में उनकी जीत हुई है.
अमेरिका के कुछ समूह हैं जिन पर डोनाल्ड ट्रंप की बेजोड़ पकड़ है. इन समूहों की ट्रंप में गज़ब की आस्था है, इन लोगों ने चार साल तक बतौर राष्ट्रपति उन्हें देखा और उनके काम करने के स्टाइल पर अपनी मोहर लगाई है.
साल 2020 में उनकी राजनीतिक कमज़ोरियों का कोई भी विश्लेषण उनकी राजनीतिक ताक़तों को स्वीकार किये बिना संभव नहीं है.
हालांकि, वे चुनाव हार गये हैं और अब उनका नाम आधुनिक युग के उन चार राष्ट्रपतियों में शामिल हो गया है जो राष्ट्रपति पद पर होते हुए चुनाव हार गये, यानी जनता से उन्हें दूसरा मौक़ा नहीं मिला.
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माना जाता है कि डोनाल्ड ट्रंप साल 2016 में राष्ट्रपति पद का चुनाव इसलिए जीते थे क्योंकि वे लीक से हटकर चलने वाले और ग़ैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार थे जिन्होंने उन विषयों पर भी खुलकर बात की जिनपर पहले राजनीतिक तौर पर बात नहीं होती थी.
लेकिन 2020 में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद का चुनाव हार गये क्योंकि वे लीक से हटकर चलने वाले नेता थे जिसने उन विषयों पर भी बड़े आक्रामक ढंग से बयान दिये जिनपर बोलने से राजनीतिक लोग बचते थे.
एग्ज़िट पोल्स में भी यह बात सामने आयी थी कि '2016 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को वोट करने वालों में से कुछ प्रतिशत लोग उनके अति-आक्रामक रवैये के कारण उनसे दूर हो गये.'
उनके बहुत से पुराने समर्थकों ने कहा कि 'डोनाल्ड ट्रंप ने जिस आक्रामक तरीक़े से इतने सारे मानदण्डों को ख़ारिज किया, वो उन्हें पसंद नहीं आया.'
अमेरिकी उपनगरों में विशेष रूप से यह बात सच साबित हुई, जहाँ जो बाइडन की उम्मीदवारी में डेमोक्रैटिक पार्टी का प्रदर्शन काफ़ी सुधरा है.
विशेष रूप से उपनगरों की महिलाओं में डोनाल्ड ट्रंप को लेकर काफ़ी नाराज़गी सुनने को मिली थी और शायद इसी वजह से पेंसिल्वेनिया, मिशीगन, विस्कॉन्सिन में जीत के साथ-साथ एरिज़ोना और जॉर्जिया में भी जो बाइडन को बढ़त हासिल हुई.
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2020 के राष्ट्रपति चुनाव में हमने फिर से वह देखा, जो हमने 2018 के मध्यावधि चुनावों में देखा था कि अधिक उच्च-शिक्षित रिपब्लिकन, जिनमें से कुछ ने चार साल पहले डोनाल्ड ट्रंप को वोट दिया था. पर इनमें से कई लोगों को लगने लगा कि डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही आक्रामक तरीक़े कई मानदण्ड ख़ारिज कर रहे हैं, जिसके कारण उनका मन ख़राब हुआ.
फिर नस्लीय तनाव का मज़ाक बनाना, ट्विटर पर नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल करते हुए काले लोगों को बदनाम करना और जिन मौक़ों पर गोरे वर्चस्ववादी लोगों की एक राष्ट्रपति द्वारा आलोचना की जानी चाहिए थी, वहाँ चुनी हुई चुप्पी बनाये रखना - डोनाल्ड के ख़िलाफ़ गया.
लोगों ने यह भी नोटिस किया कि डोनाल्ड ट्रंप बीच-बीच में व्लादिमीर पुतिन जैसे सत्तावादी नेताओं की प्रशंसा करते हैं.
साथ ही यह भी कि उन्हें जो लोग समझ नहीं आते, उन्हें वो भद्दी उपाधियाँ दे देते हैं. जैसे, उन्होंने अपने पूर्व वकील माइकल कोहेन को एक बार 'चूहा' कहकर बुलाया. उनकी इस भाषा से भी काफ़ी लोगों को आपत्ति थी.
डोनाल्ड ट्रंप के कुछ आलोचक अब उन्हें 'तानाशाही का समर्थक' भी कह रहे हैं क्योंकि उन्होंने चुनाव के परिणामों को स्वीकार करने से ही इनकार कर दिया है.
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चुनाव अभियान के दौरान जब मेरी बात पिट्सबर्ग में चक होनस्टीन से हुई थी, जिन्होंने 2016 में ट्रंप का समर्थन किया था और अब वे जो बाइडन के साथ हैं, तो उन्होंने कहा था कि 'लोग थक चुके हैं.'
वे बोले, "लोग देश में सामान्य स्थिति को फिर से देखना चाहते हैं. वो शालीनता देखना चाहते हैं. वो इस घृणा को रोकना चाहते हैं. वो देश को एकजुट देखना चाहते हैं. और ट्रंप की वजह से लोगों में जो यह भावना आयी है, उसी की वजह से जो बाइडन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतेंगे."
ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक समस्या यह थी कि वे अपने मूल बेस से परे अपने समर्थन का विस्तार करने में विफल रहे और ऐसा लगता है कि उन्होंने कोशिश भी नहीं की.
साल 2016 में वो 30 राज्य जीते थे, पर उन्होंने अक्सर ऐसे शासन किया, जैसे वे केवल रूढ़िवादी अमेरिकी लोगों के राष्ट्रपति हैं. उन्होंने उन 20 राज्यों के लोगों को कभी अपनी ओर लाने का मज़बूत प्रयास नहीं किया, जिनमें हिलेरी क्लिंटन को ज़्यादा वोट मिले थे.
यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप के आलोचक उन्हें बीते 100 वर्षों के सबसे विभाजनकारी राष्ट्रपति के तौर पर भी संबोधित करते हैं.
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चार थका देने वाले वर्षों के बाद, बहुत से अमेरिकी मतदाता चाहते थे कि उनकी पृष्ठभूमि में एक ऐसा राष्ट्रपति हो, जो व्हाइट हाउस में रहे और अधिक परंपरागत तरीके का व्यवहार रखे.
लोग नाम लेकर की जाने वाली बयानबाज़ी, धमकाने वाली भाषा और निरंतर जारी रहने वाले टकराव से थक चुके थे. वे किसी भी तरह की सामान्य स्थिति में वापसी चाहते थे.
हालांकि, उनके पक्ष में यह संभावना भी शुरू से थी कि इस बार के चुनाव में, वे 2016 की तरह नये उम्मीदवार नहीं, बल्कि पद पर बैठे राष्ट्रपति थे जिनका दूसरी बार जीतना का रिकॉर्ड रहा है.
वहीं दूसरा पहलू यह था कि ट्रंप हिलेरी क्लिंटन की ख़राब छवि बना पाये थे, पर जो बाइडन के साथ ऐसा करना आसान नहीं था, यही वजह थी कि डेमोक्रैटिक पार्टी ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम फ़ाइनल किया.
77 वर्षीय जो बाइडन ने भी काम बखूबी किया. बिना किसी ग़लती के किया. इसी वजह से जो बाइडन अमेरिकी की 'रस्ट बेल्ट' (पेंसिल्वेनिया, मिशीगन और विस्कॉन्सिन) में भी रिपब्लिकन पार्टी को सेंध लगाने में सफ़ल हुए.
पर इस सवाल का जवाब कि 'डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव क्यों हार गये?' एक और दिलचस्प सवाल पर निर्भर करता है कि 'उन्होंने प्रेसिडेंसी को कब खोया?'
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2016 में ट्रंप की जीत के तुरंत बाद जिन लोगों ने कहीं ना कहीं उन्हें अमेरिका की सत्ता के ख़िलाफ़ वोट देकर जिताया, क्या उसके तुरंत बाद उनमें अपने फ़ैसले को लेकर कोई शक़ पैदा हो गया?
आख़िरकार उन्हें वोट देने वाले कई लोग तो उनकी जीत की उम्मीद ही नहीं कर रहे थे.
क्या ये इसलिए हुआ क्योंकि राष्ट्रपति बनने के 24 घंटे के अंदर उन्होंने अपना 'अमेरिकी नरसंहार' वाला भाषण दिया जिसमें बर्बाद फ़ैक्टरियों का ज़िक्र, मज़दूरों के पीछे लेफ़्ट का होना और मध्य-वर्गीय घरों से पैसे छीन लिये जाने की बात थी, इसके बाद उन्होंने भीड़ के साइज़ पर बात की और ट्विटर का इस्तेमाल जारी रखने की कसम खाई थी.
उनके राष्ट्रपति के तौर पर पहले दिन ही ये साफ़ हो गया था कि डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद को बदलना चाहते हैं, ना कि राष्ट्रपति पद उनमें कोई बदलाव ला पायेगा.
क्या ये धीरे-धीरे बढ़ता गया, कई निंदनीय घटनाओं का प्रभाव, घटिया बयानबाज़ी, स्टाफ़ के कई लोगों का छोड़ जाना और अराजकता?
या फिर कोरोना वायरस संकट ने उनके राष्ट्रपति कार्यकाल को निगल लिया?
जब तक ये संकट नहीं आया था, तब तक ट्रंप मज़बूत राजनीतिक स्थिति में दिख रहे थे.
वे महाभियोग केस में भी बच निकले थे. उनकी अप्रूवल रेटिंग भी 49 फ़ीसदी थी. वे मज़बूत अर्थव्यवस्था और अपने कार्यकाल का प्रचार कर सकते थे और अमूमन ये दोनों फ़ैक्टर किसी राष्ट्रपति को दूसरा कार्यकाल दिला ही देते हैं.
राष्ट्रपति चुनावों में एक सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या देश पिछले चार साल की तुलना में बेहतर हुआ है.
कोविड के बाद आर्थिक संकट भी आया तो ज़ाहिर है ट्रंप का केस कमज़ोर हो गया.
लेकिन ये कहना भी गलत होगा कि ट्रंप को कोरोना वायरस की वजह से हारना पड़ा. राष्ट्रपति किसी देशव्यापी संकट से अक्सर मज़बूत होकर निकलते हैं.
संकट कई बार किसी नेता में बड़प्पन ले आता है. जैसे फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने अमेरिका को ग्रेट डिप्रेशन कहे जाने वाले आर्थिक संकट से निकाला और उन्हें इसका राजनीतिक फ़ायदा मिला.
जॉर्ज बुश की 11 सितंबर वाले हमले पर शुरूआती प्रतिक्रिया ने उनकी लोकप्रियता बढ़ाई और उन्हें दूसरा कार्यकाल भी मिला.
तो ये कहना सही नहीं होगा कि कोरोना वायरस की वजह से ट्रंप हार गये. उनके इस संकट से निपटने में नाकामी की वजह से वे हारे हैं.
फिर भी ये कहना ज़रूरी है कि डोनाल्ड ट्रंप आख़िर तक राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक रहे, जबकि देश पिछले 100 साल में सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट झेल रहा था,
1930 के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट और 1960 के बाद सबसे बड़े 'नस्लवाद के मुद्दे' पर अशांति से घिरा था.
रिपब्लिकन अमेरिकी उनकी वापसी देखना चाहेंगे. आने वाले कई सालों तक रूढ़िवादी आंदोलन में वे एक मुख्य भूमिका में रहेंगे.
ट्रंपवाद के ख़त्म होने पर अमेरिकी रूढ़िवादी पर वही प्रभाव हो सकता है, जैसा रीगनवाद के ख़त्म होने पर हुआ.
ट्रंप ध्रुवीकरण के एक पुरोधा रहेंगे और 2024 में दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं. ये 'विभाजित' राज्य एकदम से दोबारा एक नहीं हो जाएंगे. बहुत से अमेरिकी ट्रंप को लेकर अलग-अलग भावना रखते हैं, भक्ति से लेकर नफ़रत तक.
यह ज़रूर है कि अमेरिका ने ऐसा राष्ट्रपति आख़िरी बार नहीं देखा है.
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