कोरोना वायरस से ख़ुद को मुक्त घोषित करने की जल्दबाज़ी क्यों है इन देशों को?
इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
दुनिया के तक़रीबन 188 देश कोरोना वायरस से संक्रमित हैं. न्यूज़ीलैंड और फ़िजी जैसे कुछ देशों ने ख़ुद को हाल ही में कोरोना के संक्रमण से मुक्त घोषित किया है. लेकिन न्यूज़ीलैंड में पिछले 24 घंटों में दो नए मामले सामने आ चुके हैं.
न्यूज़ीलैंड में 24 दिनों के बाद संक्रमण के ये नए मामले सामने आए हैं. जब न्यूज़ीलैंड ने 8 जून को कोरोना से पूरी तरह मुक्त होने की घोषणा की थी तब वहाँ पिछले 17 दिनों से कोई मामला सामने नहीं आया था और आख़िरी मरीज़ उस दिन संक्रमण से पूरी तरह से ठीक हुआ था.
न्यूज़ीलैंड के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, जिन दो नए लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है, वे दोनों ही ब्रिटेन से लौटे थे और दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं.
न्यूज़ीलैंड ने ख़ुद को पिछले हफ़्ते ही कोरोना मुक्त घोषित करते हुए लॉकडाउन की सभी पाबंदियाँ हटा ली थीं लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर अब भी रोक लगी हुई है.
प्रधानमंत्री जेसिंडा एडर्न ने कोरोना मुक्त होने की घोषणा के साथ चेताया था कि देश में फिर से मामले सामने आ सकते हैं.
फ़िजी ने भी ख़ुद को 5 जून को कोरोना मुक्त घोषित किया है.
वहाँ के प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनिमारामा ने तब ट्वीट किया था, "फ़िजी ने अपने आख़िरी कोरोना मरीज़ को ठीक कर लिया है. हमारी टेस्टिंग की संख्या भी बढ़ गई है. आख़िरी संक्रमण का मामला सामने आए हुए 45 दिन हो चुके हैं. कोई मौत नहीं हुई है और हमारी रिकवरी रेट 100 प्रतिशत है. दुआओं, कड़ी मेहनत और विज्ञान की मदद का यह नतीजा है."
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
न्यूज़ीलैंड और फ़िजी के अलावा और भी कई देश हैं जिन्होंने ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित किया है. इनमें सेशेल्स,वैटिकन सिटी, तंज़ानिया और मोंटेनेगरो जैसे कई देश शामिल हैं.
इन सभी देशों ने अपने यहां संक्रमण के नए मामले नहीं आने और संक्रमण के पहले से मौजूद मामलों में आख़िरी मरीज़ के ठीक हो जाने की स्थिति में कोरोना मुक्त होने की घोषणा की है.
लेकिन जहां न्यूज़ीलैंड ने 17 दिनों तक नए मामले नहीं आने के बाद कोरोना मुक्त होने की घोषणा की थी तो वहीं फ़िजी ने 45 दिनों तक नए मामलों के सामने नहीं आने के बाद यह क़दम उठाया.
वैसे ही दूसरे देशों ने भी दिनों के मामले में अलग-अलग अंतराल के बाद कोरोना मुक्त होने की घोषणा की है. कोई देश आख़िर ये कैसे तय करता है कि वो अब ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित कर सकता है.
जब यह सवाल हमने पूछा जेएनयू में सेंटर ऑफ़ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ की चेयरपर्सन डॉक्टर संघमित्रा आचार्या से तो उनका कहना था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अप्रैल की शुरुआत में कहा था कि कहीं पर अगर 45 दिनों तक संक्रमण का कोई नया मामला नहीं आया और वहां पर कोई सिम्प्टोमैटिक मरीज़ नहीं है तो उस क्षेत्र को कोरोना मुक्त घोषित किया जा सकता है लेकिन अब अलग-अलग देशों ने इस अंतराल में अपने हिसाब से बदलाव किए हैं.
इमेज स्रोत, Getty Images
आख़िर अलग-अलग देशों ने मापदंड में ये बदलाव क्यों किए हैं?
इस पर संघमित्रा आचार्या कहती हैं, "जिन देशों में रिकवरी रेट बेहतर है, उन देशों ने 45 दिनों के इस अंतराल को अपने यहाँ कम कर दिया है. एक वजह यह भी थी कि इन देशों को दुनिया को बताना था कि हमारे यहाँ रिकवरी रेट बेहतर है. कुछ देशों ने इसलिए 15 दिनों का अंतराल अपनाया तो कुछ देश अब इससे भी कम दिनों के अंतराल में ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित कर रहे हैं."
वो बताती हैं कि भारत ने भी इस अंतराल को कम किया है और अब क़रीब दो हफ़्ते तक अगर किसी क्षेत्र में कोई नया संक्रमण नहीं आता है और उस क्षेत्र के सभी संक्रमित मरीज़ ठीक हो जाते हैं तो फिर उस क्षेत्र विशेष को कोरोना मुक्त घोषित किया जा सकता है.
कोरोना मुक्त घोषित करने की यह जल्दबाज़ी क्यों?
ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित करने की इस जल्दबाज़ी पर वो कहती हैं, "हर देश यह साबित करने में लगा हुआ है कि उसने कोरोना से बेहतर तरीक़े से निपट कर उसे मात दे दी है. इसे इमेज बिल्डिंग से जोड़कर देखा जा रहा है. अर्थव्यवस्था का भी सवाल है. हर देश जल्द से जल्द अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहता है. तो इसके लिए भी ज़रूरी है कि वो ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित करके आगे बढ़े. लेकिन ये न्यूज़ीलैंड जैसे देश के लिए मुमकिन है लेकिन तंज़ानिया या फिर भारत जैसे ही देश के लिए यह इतना आसान नहीं है."
भारत के साथ क्या है समस्या?
संघमित्रा आचार्या कहती हैं कि भारत का हर राज्य अलग तरीक़े से व्यवहार कर रहा है इसलिए यहाँ किसी राज्य या क्षेत्र तक को कोरोना मुक्त घोषित करना मुश्किल है.
वो कहती हैं, "केरल में शुरू के दिनों में जिन तीन-चार ज़िलों में संक्रमण के मामले आए थे वहाँ कुछ हफ्तों तक जब तक की प्रवासी मज़दूरों का पलायन शुरू नहीं हुआ था, नियंत्रण करने में कामयाबी मिली थी लेकिन वहीं महाराष्ट्र में शुरू के चार हफ्तों में पुणे, मुंबई और सांगली में जो संक्रमण था, वो बढ़कर कई और नए ज़िलों तक पहुँच गया. उत्तर-पूर्व के राज्य कई हफ़्तों तक कोरोना मुक्त रहे लेकिन बाद में कम संख्या में ही सही लेकिन वहाँ भी संक्रमण पहुँच गया है."
इमेज स्रोत, Hindustan Times via Getty Images
घनी और बड़ी आबादी का क्या है लेना-देना?
अभी तक जिन देशों ने ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित किया है, उनमें लगभग सभी छोटी और कम सघन आबादी वाले देश ही हैं. न्यूज़ीलैंड की कुल आबादी जहाँ पचास लाख के क़रीब है तो वहीं फ़िजी और तंज़ानिया की आबादी क्रमश: क़रीब नौ लाख और साढ़े पाँच करोड़ हैं.
तो क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि छोटी और कम सघन आबादी वाले देशों के लिए ख़ुद को कोरोना मुक्त घोषित कर देना कहीं अधिक आसान है.
डॉक्टर संघमित्रा आचार्या कहती हैं, "कई घनी आबादी वाले देश में हमें जितना लगता था कि वहाँ संक्रमण की दर ज़्यादा होगी वहाँ ऐसा नहीं हुआ. मसलन आप इंडोनेशिया और मलेशिया को देख सकते हैं. ये देश सघन आबादी वाले देश हैं लेकिन यहाँ आप संक्रमण की दर या फिर संक्रमण से होने वाली मृत्यु दर देखें तो यह उतनी नहीं है जितनी कुछ इससे कम घनी आबादी वाले देशों में हैं."
वो आगे बताती हैं कि वायरस के संक्रमण का पैटर्न अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीक़े का है. अमरीका में अलग पैटर्न से संक्रमण फैला है तो स्पेन और इटली में अलग तरह से.
कोरोना मुक्त होने की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है?
कोरोना के लिए वैक्सीन और दवाइयों की खोज अब तक नहीं हो पाई है लेकिन हर देश अपने यहाँ संक्रमण के नहीं फैलने या फिर बिल्कुल भी रोक देने की कोशिश में लगा हुआ है.
कोरोना मुक्त होने की ये कोशिशें आख़िर कैसे कामयाब हो सकती हैं.
डॉक्टर संघमित्रा आचार्या इसके लिए दो बातों पर ज़ोर देने की बात कहती हैं- एक टेस्टिंग और दूसरी है ट्रैवलिंग.
वो कहती हैं, "हॉटस्पॉट को देखकर अगर सिर्फ़ वहाँ पर पूरी तरह से शुरू में लॉकडाउन किया जाता तो काफ़ी हद तक कामयाबी मिल सकती थी. शुरू के दिनों में केरल में हमने यह तरीक़ा कारगर होते हुए देखा है. चीन के वुहान क्षेत्र के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. वहाँ आज भी वुहान क्षेत्र के बाहर संक्रमण नहीं हो पाया है. थोड़े-बहुत मामले अब बीजिंग से आ रहे हैं लेकिन बहुत हद तक यह वुहान क्षेत्र तक ही सीमित है. ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि पूरे वुहान क्षेत्र की एक तरह से क़िलाबंदी कर दी गई थी."
वो आगे कहती हैं, "इसलिए पूरी तरह से लॉकडाउन के बजाए हॉटस्पॉट को पहचान कर उन क्षेत्रों में सख़्त पाबंदियां लगानी थीं. पूरी तरह लॉकडाउन करने से हासिल कुछ नहीं हुआ उल्टे इससे जुड़े कुछ दूसरे मसले सामने आ गए जैसे प्रवासी और अंसगठित क्षेत्र के मज़दूरों की समस्या. इसके साथ-साथ संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को भी बहुत कुछ झेलना पड़ा है."
कोरोना मुक्त घोषित होने के बाद भी कोरोना के नए मामलों के आने पर संघमित्रा आचार्या कहती हैं कि संक्रमण के मामले तो आएंगे ही लेकिन अब अहम यह है कि संक्रमण से कोई देश कैसे निपट रहा है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क पहनना क्यों ज़रूरी है?
- अंडे, चिकन खाने से फैलेगा कोरोना वायरस?
- कोरोना वायरस: संक्रमण के बाद बचने की कितनी संभावना है
- कोरोना वायरस: क्या करेंसी नोट और सिक्कों से भी फैल सकता है?
- ‘फ़्लू’ जो कोरोना वायरस से भी ज़्यादा जानलेवा था
- क्या लहसुन खाने से ख़त्म हो जाता है कोरोना वायरस?
- कोरोना वायरस: क्या गर्भ में ही मां से बच्चे को हो सकता है?
- कोरोना काल में कैसे बनाए रखें अपनी रोमांटिक लाइफ़
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
टॉप स्टोरी
ज़रूर पढ़ें
सबसे अधिक लोकप्रिय
सामग्री् उपलब्ध नहीं है