कोरोना लॉकडाउन: खाने की कमी से क्यों जूझ रहे हैं अमरीकी लोग?

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    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क अमरीका में कोरोना वायरस का क़हर जारी है. इस वायरस से अब तक 91000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन इस संकट की वजह से अमरीका में खाने पीने के सामान की उपलब्धता से जुड़ा संकट पैदा हो गया है.

वायरस का प्रसार रोकने के लिए कारोबारी गतिविधियां बंद होने से कई लोगों की ज़िंदगियों पर असर पड़ा है.

तहमीना हक़ भी ऐसे ही तमाम लोगों में शामिल हैं जिनकी ज़िंदगियां इससे बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.

तहमीना अमरीका के न्यू यॉर्क में एक किराए के घर में अपने दो बच्चों के साथ रहती हैं.

बीती 3 मई को उनके 70 वर्षीय पिता की कोरोना वायरस से मौत हो गई जो कि लिमोज़िन गाड़ी के ड्राइवर के रूप में काम करते थे.

शर्म और ज़िल्लत

तहमीना बताती हैं, "वह दिल के मरीज़ थे. डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित थे. उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम थी. डॉक्टरों ने बताया कि वायरस ने उनके फेंफड़ों को नुक़सान पहुंचाया था."

दानार्थ संस्था इस्लामिक सर्कल ऑफ़ नॉर्थ अमरीका (आईसीएनए) ने तहमीना के पिता के अंतिम संस्कार का बंदोबस्त किया.

अब तहमीना खाने-पीने के सामान के लिए भी दान पर निर्भर हैं.

तहमीना ने वर्चुअल मीटिंग ऐप ज़ूम पर मुझसे बात की. लेकिन इस वर्चुअल मुलाक़ात के दौरान तहमीना मेरी आँखों में नहीं देख रही थीं.

वे कहती हैं, "चार-पाँच महीने पहले, मैं दूसरों के घरों में खाना बनाकर और सफ़ाई करके पैसे कमा रही थी. लेकिन हड्डी में संक्रमण की वजह से मुझे अपना काम बंद करना पड़ा. अल्लाह का शुक्र है कि कुछ लोगों ने मेरी मदद की. डॉक्टरों ने मुझे बाहर जाने से मना किया है क्योंकि मुझे इस वायरस से ज़्यादा जोख़िम है. लेकिन खाने का सामान को जुटाना एक बड़ी समस्या है."

ये महसूस करना मुश्किल नहीं था कि तहमीना खाने-पीने के सामान से जुड़े अपने संघर्ष को बताने में सहज नहीं थीं.

ये एक आसान काम नहीं था.

वह मानती हैं कि अल्लाह सब ठीक कर देगा.

दानार्थ संस्था मुस्लिम हाउसिंग सर्विस के रिज़वान रिज़वी ने मुझे बताया, "दक्षिण एशियाई लोग खाने पीने की कमी को ज़ाहिर करने में शर्म महसूस करते हैं. वे इस बात को लेकर परेशान होते हैं कि ये सब बताने के बाद उन्हें समाज में किन नज़रों से देखा जाएगा. ऐसे में वे किसी को इस बारे में पता नहीं लगने देते हैं."

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खाने-पीने का संकट

तहमीना बीते पाँच महीनों से अपना मासिक किराया 1375 अमरीकी डॉलर्स नहीं दे सकी हैं.

इस पर उनके मकान मालिक ने उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही शुरू की है.

तहमीना कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि 20 अगस्त के बाद मैं अपने बच्चों को लेकर कहाँ जाऊंगी."

क्योंकि सरकारी आदेश के तहत किराये के घर में रहने वालों को किराया नहीं चुकाने की वजह से 20 अगस्त तक उनके घरों से बाहर नहीं निकाला जा सकता है.

बीते आठ से नौ हफ़्ते में 3.5 करोड़ से ज़्यादा लोग की नौकरियां चली गई हैं.

नौकरियां खोने वाले लोगों की असली संख्या इससे भी ज़्यादा है.

साल 2018 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 3.72 करोड़ लोग, जिनमें 1.12 करोड़ बच्चे शामिल हैं, खाने-पीने की समस्या वाले घरों में रहते हैं.

अमरीका में खाने पीने की समस्या से आशय उस स्थिति से है जब एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए लगातार पर्याप्त खाने-पीने के सामान की उपलब्धता न हो.

अमरीका में इस समस्या के निदान करने में लगी संस्था फीडिंग अमरीका के मुताबिक़, कोरोना वायरस संकट की वजह से 3.72 करोड़ का आंकड़ा बढ़कर 5.4 करोड़ तक पहुँच सकता है.

इसमें 1.8 करोड़ बच्चे शामिल हो सकते हैं.

ये अनुमान बताता है, "इस महामारी के बाद अमरीका में चार में से एक बच्चा खाने के संकट का सामना कर सकता है."

टेक्सस में लगभग दस हज़ार लोग लाइन लगाकर खाने के सामान का इंतज़ार करते हुए नज़र आए.

दक्षिणी फ़्लोरिडा में एक फ़ूड बैंक के सामने कारों की मीलों लंबी क़तारें देखी गईं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि संघीय सरकार की ओर से चलाई जा रही स्कीम सप्लीमेंटल न्युट्रिशन असिस्टेंस प्रोग्राम (स्नेप), जिसे फ़ूड स्टैंप भी कहा जाता है, भी नाकाफ़ी साबित हो रहा है.

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क्या कर रही है अमरीकी सरकार?

स्नैप स्कीम का उद्देश्य कम निम्न वर्ग में आने वाले लोगों और परिवारों का मदद करना है. इसके तहत फ़ूड स्टैंप दिए जाते हैं जिन्हें लोग खाना ख़रीदने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

इसके दूसरी ओर विस्कॉन्सिन में इसके उलट तस्वीरें सामने आ रही हैं जहां किसान फूड प्रोसेसिंग यूनिट बंद होने और माँग कम होने की वजह से कई गैलन दूध बहा रहे हैं.

ऐसी ही तस्वीरें फ़्लोरिडा से भी आ रही हैं जहां ट्रैक्टर हरी फलियों को कुचलते हुए नज़र आ रहे हैं. या कैलिफॉर्निया में किसान फसल को सड़ने दे रहे हैं.

वहीं, मिनेसोटा से ख़बर आ रही है कि दस हज़ार सुअरों को प्रतिदिन मारा जा रहा है. इसके साथ ही लाखों मुर्गियों का मारा जा रहा है क्योंकि फ़ूड प्रोसिसिंग इकाइयां बंद हैं.

थिक टैंक सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के ग्लोबल फ़ूड सिक्योरिटी प्रोग्राम की निदेशक कैटलिन वेल्श कहती हैं कि अमरीकी इस बात से हैरान और शर्मसार हैं कि वे खाने को सड़ने दे रहे हैं और खाने-पीने के सामान की कमी भी झेल रहे हैं.

वह कहती हैं, "हमारे पास ज़रूरत के मुताबिक़ खाना और सब्जियां हैं. हमारे पास माँसाहारी लोगों के लिए जानवर हैं. ये सप्लाई चेन की समस्या ज़्यादा है"

सरकार ने किसानों को मदद देने के लिए उनसे खाने-पीने का ताज़ा सामान लेकर फ़ूड बैंकों में देने के लिए 19 अरब डॉलर का कोरोना वायरस फूड असिस्टेंस कार्यक्रम शुरु किया है.

सरकार की मदद के बावजूद लोगों के सामने समस्याएं आ रही हैं.

अवैध निवासियों की समस्या

आईसीएनए चैरिटी ग्रुप से जुड़े पाकिस्तानी मूल के अब्दुल रऊफ़ ख़ान बताते हैं, "हम एक महिला के घर गए और खाने का डिब्बा दिया. इसमें मांस भी था."

ये एक भारतीय मूल के व्यक्ति का घर था जो अपनी नौकरी खो चुके थे.

ख़ान कहते हैं, इसके बाद "एक बच्ची आई और अंदर चहकते हुए गई. मैंने उसकी माँ से पूछा कि मैंने कुछ ग़लत किया है क्या? इस पर उस महिला ने कहा कि ये तीसरा महीना है जब उन्होंने मांस नहीं खाया है. उनकी बच्ची ख़ुशी से झूम रही थी."

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"ये परिवार दिक़्क़तों से जूझ रहा था लेकिन कभी भी वे हमारी मदद के लिए आगे नहीं आए."

ख़ान कहते हैं कि इस दानार्थ संस्था ने बीते दो महीनों में लगभग 25 लाख से ज्यादा लोगों को खाना दिया है.

कोई ऐसा शख़्स जिसका अमरीकी सिस्टम में पंजीकरण न हुआ हो, उसके लिए हालात काफ़ी बुरे हैं. क्योंकि उसे सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती है.

न्यू यॉर्क की रहने वाली ऐसी ही एक 60 वर्षीय महिला फ़ातिमा (नाम बदला गया है) कहती हैं, "अमरीका में कोई मदद नहीं करता है. लोग मेरी कहानी सुनते हैं और बात करते हैं."

फ़ातिमा (नाम बदला गया है) अकेली रहती हैं.

वह पाकिस्तान के गुजरांवाला से अमरीका में एक परिवार के घर में काम करने के लिए आईं थीं. वह बीते 25 सालों से अमरीका में रह रही हैं.

ख़ान कहते हैं, "सामान्य दिनों में इफ़तार मस्जिदों में आयोजित किया जाता है जहां कोई भी खाना खा सकता है. लेकिन मस्जिदें बंद होने के कारण इफ़्तार का आयोजन नहीं हो रहा है.

ऐसे में ज़रूरत मंद लोगों को खाने के डिब्बे दिए जा रहे हैं. इन डिब्बों में खजूर, आटा, चीनी, नमक, कुकिंग ऑइल, बीन, चावल, अंडे, ताज़े फल और सब्जियां होते हैं जो कि लंबे समय ख़राब नहीं होती हैं और फ्रिज़ में रखने की ज़रूरत नहीं होती है.

ख़ान कहते हैं, "हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो खाना हम दे रहे हैं वो पाँच लोगों के परिवार के लिए दो हफ़्तों तक ख़राब न हो."

दानार्थ संस्थाएं और फ़ूड बैंकों में खाने की माँग काफ़ी बढ़ चुकी है.

बढ़ता हुआ आर्थिक बोझ

दक्षिणी पश्चिमी पेन्सिलवेनिया में 11 इलाक़ों में खाना देने वाले ग्रेट पिट्सबर्ग कम्युनिटी फ़ूड बैंक के ब्रायन गुलिश कहते हैं, "हमारे फ़ूड बैंक में आपातकालीन फ़ूड सेवाओं को लेने वालों में 500 फीसदी की वृद्धि हुई है."

फीडिंग अमेरिका की वेबसाइट के मुताबिक़, अमरीका में दो सौ फ़ूड बैंक चल रहे हैं जो कि प्रति वर्ष 4.3 अरब बार खाने की कमी पूरी करते हैं.

ब्रायन कहते हैं, "सामान्य दिनों में मार्च और अप्रैल महीने में हम खाने का सामान ख़रीदने में $500-$600 हज़ार खर्च किया करते थे लेकिन इस बार मार्च और अप्रैल में हम 1.7 मिलियन अमरीकी डॉलर ख़र्च कर चुके हैं.

"इसका मतलब ये हुआ कि हमने बीते दो महीनों में 1.1 मिलियन अमरीकी डॉलर ज़्यादा खर्च किया है. ये आपको पूरे साल के ख़र्च के बारे में संकेत देता है. हम इस बार खाने का सामान ख़रीदने में दस से पंद्रह मिलियन डॉलर ख़र्च कर सकते हैं."

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इसी तरह फीडिंग साउथ फ्लोरिडा बताती है कि उनके यहाँ मांग में 600 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है.

विशेषज्ञ कहते हैं फ़ेडरल सरकार का 2.3 ट्रिलियन का फाइनेंशियल पैकेज लोगों की मदद करेगा क्योंकि लोगों के पास पहुँचने लगा है.

रऊफ़ ख़ान कहते हैं, "कई लोगों को अब तक पे चेक नहीं मिले हैं. ऑनलाइन सिस्टम में यह पेंडिंग दिखा रहा है."

मदद करने वाली संस्थाओं के सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं.

ब्रायन कहते हैं, "अब तक हमारे पास इन्वेंट्री ठीक है. लेकिन हमने सप्लाई चैन में कुछ बदलाव देखने शुरु कर दिए हैं. हमारे ऑर्डर कैंसल किए जा चुके हैं."

वहीं, ख़ान कहते हैं, "चुनौती ये है कि हमारे मुसलमान समुदाय के लोग भी इस संकट से प्रभावित हुए हैं."

अब जबकि अमरीका में ज़्यादातर जगहों पर काम शुरु होने लगा है तो हालात ठीक होने की उम्मीद होंगी.

लेकिन कैटलिन वाल्श कहती हैं, "मेरी चिंता पोषक खाने की कमी से जुड़ी है. ऐसे समय पर लोग पोषक खाने को लेकर कटौती शुरू कर देते हैं."

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