अरब देशों की अनदेखी कर रहे हैं मोदी?

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सत्ता संभालने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री का दौरा पड़ोसी मुल्कों में हुआ है. वो अगले माह अमरीका भी जाएंगे.
लेकिन क्या इन सबके बीच अरब देशों की अनदेखी हो रही है जहां भारत के बहुत सारे कामगार हैं. साथ ही इन देशों से कच्चे तेल का भी आयात होता है.
पढ़िए ज़ुबैर अहमद का पूरा विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता संभालने के बाद अब तक भूटान और नेपाल का दौरा कर चुके हैं. वे ब्रिक्स सम्मलेन के लिए ब्राज़ील की यात्रा कर चुके हैं. सितंबर में वह अमरीका की यात्रा की तैयारी कर रहे हैं.
उनके पहले तीन महीने के कार्यकाल में अब तक ये संकेत मिले हैं कि वह पड़ोसी देशों से संबंध सुधारना चाहते हैं.
पड़ोसियों के अलावा उनका ध्यान अमरीका, चीन और रूस से जुड़ने पर अधिक रहा है.
मगर पश्चिम एशियाई और उत्तर अफ़्रीकी देशों या कहें कि अरब देशों के लिए मोदी सरकार की नीति अब तक साफ़ नहीं हुई है.
इस साल उनकी विदेश यात्राओं में अरब देश शामिल नहीं हैं.
अनदेखी
वैसे मोदी सरकार के आने से काफ़ी पहले से रुझान यह नज़र आता है कि भारत अरब देशों से धीरे-धीरे मुंह मोड़ता जा रहा है.
नेहरू और इंदिरा की नीतियों को छोड़ रहा है. इन देशों में आख़िरी बार प्रधानमंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह गए थे, जब उन्होंने 2010 में सऊदी अरब की यात्रा की थी.
इन दिनों अरब देश हिंसा और दहशत की चपेट में हैं. वहां तानाशाही और लोकतंत्र के बीच कशमकश जारी है और सियासी बेचैनी चरम पर है.

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जिस देश में भयानक राजनीतिक संकट पैदा होता है, भारत उस देश से हाथ पीछे खींचने लगता है.
इन देशों में अमरीका और यूरोप के दखल को भारत इस तरह स्वीकार कर लेता है, मानो उसका कोई हित नहीं है.
रिश्ते क्यों ज़रूरी

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पश्चिमी एशिया और अरब देशों के बीच क़रीबी रिश्ते जोड़कर रखना भारत के हित में है. ज़रा ग़ौर करें, इन देशों में प्रवासी भारतीयों की संख्या 70 लाख है.
वहां से वो हर साल अरबों डॉलर अपने देश में भेजते हैं. भारत अपनी ज़रूरत का 70 फ़ीसदी तेल इन्हीं देशों से आयात करता है.
इनके इलावा इन देशों में भारत की अच्छी छवि है और फिर इराक़, सीरिया, मिस्र और मोरक्को जैसे देशों से भारत के ऐतिहासिक और प्राचीन रिश्ते रहे हैं.
मगर सबसे अहम कारण है कि इन देशों में सियासी संकट, हिंसा और उग्रवाद के धमाकों की आवाज़ें भारत में भी सुनाई देती हैं.
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