अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की नई सरकार क्या भारत की चिंता बढ़ा देगी?

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इमेज कैप्शन, मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद अफ़ग़ानिस्तान में अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री चुने गए हैं.
    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

अफ़ग़ानिस्तान अब 'इस्लामिक अमीरात' है. तालिबान की नई अंतरिम सरकार के 33 मंत्री अब वहाँ मोर्चा संभालने के लिए तैयार है. भारत समेत दुनिया के तमाम देशों को इस नई सरकार में शामिल होने वाले मंत्रियों के नाम का बेसब्री से इंतज़ार था.

नई सरकार की घोषणा के साथ वो इंतजार ख़त्म हो गया है, लेकिन भारत के लिए कुछ चिंता ज़रूर शुरू हो गई है.

ख़बर लिखे जाने तक तालिबान की नई सरकार पर भारत सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.

अफ़ग़ानिस्तान में तेज़ी से बदलते घटनाक्रम के बीच भारत के साथ-साथ रूस और अमेरिका भी थोड़े चिंतित नज़र आ रहे हैं.

भारत में प्रकाशित कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका और रूस दोनों भारत से संपर्क में है.

अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी यानी सीआईए प्रमुख विलियम बर्न्स भारत भी आए. हालाँकि भारत के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है.

दूसरी तरफ़ रूस में सुरक्षा परिषद के सचिव जनरल निकोलाई पात्रुशेव ने विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजिल डोभाल से मुलाक़ात की है.

इसके अलावा गुरुवार 9 सितंबर को वर्चुअल 'ब्रिक्स सम्मेलन' भी होने जा रहा है, जिसमें भारत के अलावा रूस और चीन भी होंगे और चर्चा अफ़ग़ानिस्तान पर होगी.

तालिबान की नई सरकार, पहले से कितनी अलग

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ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि तालिबान की नई सरकार के गठन का संदेश क्या है? तभी ये समझा जा सकता है कि भारत को इससे चिंतित होने की ज़रूरत भी है या नहीं.

अभी तक ये पता है कि ये तालिबान की अंतरिम सरकार है. इस सरकार में किसी महिला को जगह फ़िलहाल नहीं मिली है. आगे इस सरकार में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलने की गुंज़ाइश है. तालिबान की तरफ़ से ऐसा दावा किया जा रहा है.

ये भी सच है कि नई सरकार 'सभी जातीय समूह की समावेशी' सरकार नहीं है. भले ही तालिबान सरकार बनाने की जद्दोजहद में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, अफ़ग़ानिस्तान की उच्च सुलह परिषद के प्रमुख रहे डॉक्टर अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह , पूर्व प्रधानमंत्री गुलबुद्दीन हिकमतयार, 2012 में तालिबान विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता करने लिए चुने गए प्रतिनिधि सलाउद्दीन रब्बानी से मुलाक़ातें करते दिखे, लेकिन इनमें से किसी को कोई मंत्री पद नहीं दिया गया.

बनाए गए ज़्यादातर मंत्री तालिबान की पिछली सरकार से जुड़े हैं.

इन तमाम बातों को गिनाते हुए अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं, "अब भी कोई ये सोच रहा है कि तालिबान की नई सरकार पुरानी सरकार से अलग होगी, तो उन्हें सपना देखना छोड़ कर जाग जाना चाहिए. नई सरकार पर पुराने तालिबान की पूरी छाप है. साथ ही पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आईएसआई की भी छाप है. अब पूरी तरह से साफ़ है कि आईएसएस के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद वहाँ यही संदेश देने पहुँचे थे कि हमारी मर्ज़ी से ही अफ़ग़ानिस्तान में काम होता है."

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नई सरकार में सिराजुद्दीन हक़्क़ानी के शामिल होने से कितनी चिंता?

अभी ये नहीं मालूम कि ये सरकार कितने दिनों के लिए है, कैसे काम करेगी, वहाँ चुनाव होंगे या नहीं, होंगे तो कब होंगे, क्या कोई संविधान बनेगा.

इस वजह से फ़िलहाल चर्चा नई सरकार में शामिल नामों पर ज़्यादा है.

भारत में पाँच नामों पर सबसे ज़्यादा बात हो रही है. जिसमें शामिल हैं :

  • मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद का जो नई सरकार में प्रधानमंत्री के पद पर होंगे.
  • मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर जो उप प्रधानमंत्री होंगे. उनके साथ मुल्ला अब्दुल सलाम हनफी को भी उप प्रधानमंत्री बनाया गया है.
  • सिराजुद्दीन हक़्क़ानी जिन्हें गृह मंत्री बनाया गया है.
  • शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई जिन्हें उप-विदेश मंत्री बनाया गया है.
  • हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा इस सरकार में भी सर्वोच्चा नेता होंगे.

भारत के परिप्रेक्ष्य में इन नामों की अपनी अहमियत है.

मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद (प्रधानमंत्री) और हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा (सर्वोच्च नेता) उस हर देश के लिए अहम हैं, जो अफ़ग़ानिस्तान से बेहतर रिश्ते चाहता है.

जानकार मानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान मसले पर भले ही भारत बहुत कुछ बदलने की हैसियत नहीं रखता हो, लेकिन वहाँ की राजनीति भारत को प्रभावित करने की क्षमता ज़रूर रखती है. इस वजह से प्रधानमंत्री और सर्वोच्च नेता भारत के लिए दूसरे देशों की ही तरह अहम होंगे.

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फिर नाम आता है सिराजुद्दीन हक़्क़ानी का.

माना जा रहा है कि सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ही भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब है.

राकेश सूद कहते हैं, "2008 में भारतीय दूतावास में हुए हमले में हक़्क़ानी नेटवर्क का हाथ माना जाता है. इसके साथ ही हक्क़ानी समूह को 2 सितंबर 2011 को काबुल में अमेरिकी दूतावास के पास के नेटो ठिकानों पर हुए हमले का दोषी भी ठहराया गया है. अगर वो अफ़ग़ानिस्तान के गृह मंत्री बनते हैं तो निश्चित तौर पर भारत चिंतित होगा. ये भी रिपोर्ट्स आ रही हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के सात पूर्वी प्रांत के गवर्नर भी सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ही नियुक्त करेंगे. हक़्क़ानी नेटवर्क के आईएसआई के साथ गहरे संबंध हैं, ये भी दुनिया को मालूम है."

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में एक आतंकवादी गुट तो है नहीं. वहाँ लश्कर, जैश, अल-क़ायदा जैसे और भी गुट हैं जो सक्रिय हैं. इनके नाम भले ही अलग हों लेकिन विचारधारा एक ही है. भारत में 2008 के मुंबई हमलों से लेकर पुलवामा, पठानकोट हमलों में इन संगठनों का नाम आता रहा है. इसलिए भारत को फ्रिक होना लाज़मी है.

नई सरकार के गठन से पहले तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन बीबीसी से बातचीत में कश्मीर पर पहले ही बयान भी दे चुके हैं. सुहैल शाहीन ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत में कहा था, "एक मुसलमान के तौर पर, भारत के कश्मीर में या किसी और देश में मुस्लिमों के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार हमारे पास भी है."

उनका ये बयान भी भारत सरकार की चिंता बढ़ाने वाला था.

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मुल्ला ग़नी बरादर की भूमिका

लेकिन पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद पूरे मामले को अलग नज़रिए से देखते हैं.

उनका कहना है, "हक़्क़ानी नेटवर्क अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादा सक्रिय है. काबुल में सरकार के ख़िलाफ़ वो ज़्यादा सक्रिय रहे हैं, ना कि बाहर के देशों में. कश्मीर में चरमपंथी हमलों में आईएसआई का हाथ रहा है जो जैश और लश्कर जैसे गुटों के साथ मिल कर काम करता है. नई सरकार के गठन के बाद भारत के लिए कोई नई चिंता पैदा नहीं हुई है. अब भी भारत की वही चिंताएँ हैं, जो पहले थी."

उनका कहना है नई सरकार में तालिबान 'दोहा गुट' की कम चली और 'मिलिट्री गुट' की ज़्यादा चली, जो पाकिस्तान के ज़्यादा क़रीब माने जाते हैं - ये बात साफ़ झलक रही है.

"सिराजुद्दीन हक़्क़ानी का रिश्ता पाकिस्तान से बहुत पुराना है. 9/11 के हमले के बाद उन्हें पाकिस्तान में पनाह मिली, इनके फ़ौज में शामिल 50 हज़ार लोगों में से काफ़ी बड़ी संख्या में पाकिस्तान के लोग है. इन्हीं की वजह से आईएसआई प्रमुख, छिपते छिपाते नहीं बल्कि खुलेआम काबुल पहुँचे थे."

"मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर, आठ साल पाकिस्तान की जेल में रहे. उन्हें पाकिस्तान से दूर और अमेरिका के ज़्यादा क़रीब माना जाता है. बरादर उप-प्रधानमंत्री तो बने हैं लेकिन पद की बहुत अहमियत होगी ऐसा नहीं लगता है. उनके साथ इसी पद पर मुल्ला अब्दुल सलाम हनफ़ी भी होंगे.

रही बात हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा की, तो उनकी भूमिका 'मेंटॉर' या 'गाइड' या 'रहबर' की होगी. भारत पूरे मामले में कोई 'प्लेयर' की भूमिका में नहीं है, वो केवल वहाँ की स्थिति से 'प्रभावितों' की श्रेणी में आता है."

इसलिए तलमीज़ अहमद मानते हैं कि भारत में अब तक जो भी चरमपंथी हमले हुए हैं उनमें हक़्क़ानी नेटवर्क का नाम कभी नहीं सुना गया है. दूसरे देशों की तरह भारत की चिंता पहले भी थी कि तालिबान के क़ब्ज़े में आने के बाद अफ़गानिस्तान लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों के 'आतंकवादियों का पनाहगार' बन जाएगा, जिनसे भारत को भी ख़तरा है. वो चिंता आज भी है. नई सरकार के बनने से इस चिंता का कोई लेना देना नहीं है.

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शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई के आने से कितनी राहत?

सरकार में शामिल एक नाम शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई का भी है.

पिछले दिनों क़तर में भारत राजदूत दीपक मित्तल से उनकी मुलाक़ात काफ़ी सुर्ख़ियों में रही थी. भारत की तरफ़ से तालिबान नेता के साथ पहली आधिकारिक मुलाक़ात थी.

इस मुलाक़ात के पहले ही उन्होंने न्यूज़ चैनल सीएनएन-न्यूज़ 18 को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा था कि वो भारत के साथ 'दोस्ताना संबंध' चाहते हैं.

उन्होंने ये भी कहा था, "इसमें कोई शक़ नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच पुराना और लंबा राजनीतिक-भौगोलिक विवाद है, लेकिन हमें उम्मीद है कि वो अपने आंतरिक झगड़े के लिए अफ़गानिस्तान का इस्तेमाल नहीं करेंगे. "

अब शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई तालिबान की नई सरकार में उप-विदेश मंत्री के पद पर है. तो क्या ये एक ख़बर भारत के लिए अच्छी कही जा सकती है?

इस सवाल पर राकेश सूद एक ही लाइन कहते हैं, "दिल बहलाने के लिए ये ख़्याल अच्छा है."

तलमीज़ अहमद भी स्तनिकज़ई की नियुक्ति को बहुत अहमियत नहीं देते है. वो कहते हैं कि चूँकि स्तनिकज़ई जब अफ़ग़ान सेना में थे तो भारत में उन्होंने ट्रेनिंग ली थी. वो भारत को जानते हैं इसलिए उनके बयान यहाँ चर्चा में रहे. लेकिन तालिबान की जो मूल विचारधारा है वो बुनियादी रूप से भारत के ख़िलाफ़ है. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत, अमेरिका के साथ है और पिछली काबुल सरकार के साथ भी.

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इमेज कैप्शन, क़तर में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल और तालिबान राजनीतिक ऑफ़िस के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकज़

क्या भारत मान्यता देगा?

तालिबान की तरफ़ से भारत के अलावा चीन और रूस को भी आश्वासन मिला था कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल वहाँ आतंकवाद फैलाने के लिए नहीं होने देगा.

नई सरकार के गठन के बाद चीन और रूस की प्रतिक्रिया तो आई है, लेकिन उन्हें 'मान्यता' देने को लेकर कुछ साफ़ नहीं कहा गया है.

ऐसे में दोनों जानकार मानते हैं कि एक दिन पुरानी सरकार को मान्यता देने की हड़बड़ी में भारत भी नहीं होगा.

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इसी महीने अलग-अलग मंचों पर भारत, रूस, चीन, अमेरिका के साथ बैठकों में शामिल होगा. इसमें ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और संयुक्त राष्ट्र की बैठकें शामिल है.

राकेश सूद कहते हैं कि बहुत संभव है कि भारत उन मंचों से अपनी चिंता स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर करे और उसे ऐसा करना भी चाहिए.

वहीं तलमीज़ अहमद, नई सरकार की मान्यता से पहले उसकी स्थिरता पर ही सवाल उठाते हैं.

वो कहते हैं, "नई सरकार अंतरिम सरकार है. इस सरकार को कुछ दिन चलने दीजिए, नई सरकार कितनी स्थिर है, इसका पता दुनिया को चल जाएगा. उसके बाद ही मान्यता का सवाल उठेगा."

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