कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच क्या स्कूल खोलने का सही समय आ गया है?

    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक तरफ़ कोरोना की तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है, वहीं अब भारत के कई राज्यों में लॉकडॉउन लगभग हटा दिया गया है या बेहद आंशिक रूप से लागू है.

इस बीच ये चर्चा भी ज़ोरों पर है कि क्या स्कूल भी बच्चों के लिए पूरी तरह से खोल दिए जाने चाहिए? कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच क्या स्कूल खोलना सुरक्षित होगा और क्या ये सही समय है?

कोरोना के कारण लंबे समय से बंद पड़े स्कूलों को लेकर एक संसदीय समिति ने चिंता ज़ाहिर की है. इस संसदीय समिति के मुताबिक़ स्कूलों का खोला जाना बच्चों के लिए फ़ायदेमंद है.

वहीं इससे पहले इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर के प्रमुख बलराम भार्गव भी एहतियात के साथ प्राइमरी स्कूल और फिर सेकेंडरी स्कूल खोले जाने का सुझाव दे चुके हैं.

मीडिया से बीतचीत में उन्होंने इसके पीछे वैज्ञानिक आधार बताते हुए कहा था, "छोटे बच्चे वायरस को आसानी से हैंडल कर लेते हैं. उनके फेफड़ों में वह रिसेप्टर कम होते हैं, जहाँ वायरस जाता है. सीरो सर्वे में 6 से 9 साल के बच्चों में लगभग उतनी ही एंटीबॉडी दिखी है, जितनी बड़ों में होती है."

इस बीच अब धीरे-धीरे भारत के अलग-अलग राज्यों में स्कूल खुल रहे हैं. राजधानी दिल्ली में जहाँ 10वीं और 12वीं के छात्रों के लिए आंशिक रूप से स्कूल खोले गए हैं, वहीं उससे सटे सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 50 फ़ीसदी उपस्थिति के आधार पर 16 अगस्त से कक्षा नौ से 12वीं के लिए स्कूल खोले जाने के आदेश दिए गए हैं.

अन्य राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, बिहार और महाराष्ट्र में जुलाई महीने से स्कूल खोलने के आदेश दिए गए थे, लेकिन कई एहतियाती क़दमों के साथ, जैसे इलाक़े में कोरोना के मामले नहीं होने चाहिए, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होना चाहिए और बच्चों की उपस्थिति सिर्फ़ 50 फ़ीसदी रख सकते हैं.

अभिभावकों की चिंता

रेणु गर्ग के बच्चे दिल्ली के विवेकानंद स्कूल में पढ़ते हैं. उनकी बेटी नौवीं में और बेटा 12वीं में है.

उनका कहना है कि कोरोना की तीसरी लहर के बीच डर तो लगता है, लेकिन बेटे को इस साल बोर्ड की परीक्षा देनी है और स्कूल ऑनलाइन होने के कारण वे अपने बेटे की पढ़ाई को लेकर ज़्यादा चिंतित हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "स्कूल में अगर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन पूरी तरह से होगा, तो मैं अपने बेटे को भेज दूँगी. ये स्कूल जाकर एक दो दिन में पता चल जाएगा कि वहाँ किस तरह कड़ाई बरती जा रही है. वो बड़ा भी है और एहतियात भी रख सकता है. लेकिन 50 फ़ीसदी उपस्थिति के साथ मैं अपनी बेटी को कतई नहीं भेजूँगी. क्योंकि इस उम्र के बच्चे इतने समझदार भी नहीं होते कि किसी से दूरी बनाकर रखें या बार-बार हाथ धोएँ."

ग़ाज़ियाबाद में रहने वाली पारुल अग्रवाल के दो बेटे हैं, जो डीपीएस इंदिरापुरम में पढ़ते हैं. उनका भी बड़ा बेटा 12वीं कक्षा में है.

वो बताती हैं, "दो महीने पहले स्कूल से सहमति को लेकर फ़ॉर्म भेजा गया था तो हमने इसमें अपनी असहमति जता दी थी. लेकिन बेटा 12वीं में है और उसकी बोर्ड की परीक्षा भी है. स्कूल शुरू तो होने चाहिए लेकिन अब कोरोना वायरस की तीसरी लहर का ख़तरा बताया जा रहा है. असमंजस में तो हूँ, लेकिन बोर्ड की परीक्षा भी है इसलिए एक-दो दिन स्कूल भेजकर ज़रूर देखना चाहूँगी.''

ग्रेटर नोएडा में एस्टर पब्लिक स्कूल की वाइस प्रिंसिपल रचना शुक्ला ने बीबीसी को बताया कि उनका स्कूल सितंबर की पहली तारीख़ से खोले जाने की योजना है.

उनका कहना था, "स्कूल नौवीं से 12वीं कक्षा के लिए खुलेगा और 90 फ़ीसदी अभिभावकों ने अपने बच्चों को भेजने को लेकर सहमति जता दी है. हम सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन करेंगे."

जिन अभिभावकों के बच्चे 12वीं की बोर्ड परीक्षा देंगे, उनमें से ज़्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को एहतियाती क़दमों के साथ स्कूल भेजने को तैयार हैं और उनका मानना है कि वे ख़ुद भी अपना ध्यान रख सकते हैं.

जहाँ एक तबका स्कूल फिर से शुरू होने पर सहमत नज़र आता है, वहीं दूसरा वर्ग कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच अभी थोड़ा इंतज़ार करने की बात करता है.

स्थायी समिति की सिफ़ारिश

शिक्षा संबंधी संसद की स्थायी समिति के अनुसार, स्कूलों के एक साल से ज़्यादा लंबे समय तक बंद रहने का छात्रों के स्वास्थ्य ख़ास तौर पर मानसिक स्वास्थ्य पर असर हुआ है.

साथ ही घर की चारदीवारी में बंद रहने, स्कूल ना जाने के कारण अभिभावकों और बच्चों के बीच संबंधों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है.

पिछले ही हफ़्ते शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों पर बनी संसद की स्थायी समिति ने विनय सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट संसद में पेश की थी.

इस रिपोर्ट में लॉकडाउन के कारण स्कूल बंद रहने से पढ़ाई पर हुए असर और उससे पैदा हुई कमी को पूरा करने की योजना, ऑफ़लाइन और ऑनलाइन निर्देशों, परीक्षा की समीक्षा और स्कूल दोबारा खोले जाने की योजना के बारे में बताया गया था.

इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि ग्रामीण इलाक़ों में बच्चों में आधारभूत ज्ञान भी कमज़ोर हुआ है और इसमें गणित, विज्ञान और भाषा जैसे विषय शामिल हैं.

साथ ही समिति ने स्कूलों को खोलने की सिफ़ारिश की है और कहा है कि सभी के टीकाकरण पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. समिति ने एहतियाती क़दम अपनाए जाने पर भी अपने विचार रखे हैं.

समिति ने स्कूलों को दो शिफ़्टों में चलाने और एक-एक दिन छोड़कर क्लास चलाने और मास्क पहनना अनिवार्य करने जैसे सुझाव भी दिए हैं.

स्कूल खोलने में क्यों जल्दबाज़ी?

श्री वेंकटेश्वर इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल नीता अरोड़ा के अनुसार, स्कूल खोलने में कोई जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए. वे कहती हैं कि जिन इलाक़ों में कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं, वहाँ तो स्कूल कतई नहीं खोले जाने चाहिए.

वे कहती हैं, "नौंवी से 12वीं के 50 फ़ीसदी बच्चों को बुलाने की बात हो रही है लेकिन क्या ये वाकई ज़रूरी है क्योंकि हम 50 फ़ीसदी बच्चों को बुलाकर स्कूल और बच्चों को ख़तरे में ही डालेंगे."

उनके मुताबिक, "एक साथ अगर 100 बच्चे आते हैं, क्या वो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे. वो भी तब जब वो इतने दिनों बाद मिलेंगे. मैं अपने स्कूल में एक ही कक्षा के बच्चों को बुला रही हूँ, वो भी प्रैक्टिकल के लिए जो बहुत ज़रूरी हैं. हर कक्षा में केवल 10 बच्चों को बैठने की इजाज़त़ है. वैसे भी ऑफ़लाइन कक्षाएँ हो ही रही हैं."

उनका कहना है कि स्कूल खोलने से पहले हम इस बात का भी ध्यान रख रहे हैं कि स्कूल के पूरे स्टाफ़ और अभिभावकों का संपूर्ण टीकाकरण हो जाना चाहिए.

चेकलिस्ट पर ज़ोर देते हुए वो कहती हैं, ''इस चेकलिस्ट में पूछा जाना चाहिए कि जो कर्मचारी बच्चों के संपर्क में आएँगे, क्या उनका पूरा वैक्सीनेशन हो गया है? क्या बच्चों के आने से पहले स्कूल, कक्षाएँ, बाथरूम सैनिटाइज़ किए गए है, क्या उनके जाने जाने के बाद सैनिटाइज़ किए गए? क्या कक्षाओं की आधे-आधे घंटे पर सफ़ाई हो रही है?''

क्या स्कूल हैं तैयार?

सेंट स्टीफेंस अस्पताल में सीनियर क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट संजिता प्रसाद भी नीता अरोड़ा की बात से सहमत नज़र आती है.

बीबीसी से बातचीत में संजिता प्रसाद कहती हैं, "स्कूलों को पूरी तैयारी रखने की ज़रूरत है. उन्हें ये ख़्य़ाल रखना होगा कि हर बच्चा मास्क पहने, दूरी बनाए रखे, क्या वे कोविड बिहेवियर पर खरे उतरेंगे? मुझे नहीं लगता कि स्कूल पूरी तरह से तैयार हैं."

उनके अनुसार, "आप ख़ुद सोचिए जब ज़्यादा बच्चे आएँगे, तो उन सबको संभालना मुश्किल होगा. क्या हर बच्चा मास्क लगाकर रखेगा? खाते वक़्त क्या वो इतनी दूरी बरतेंगे, टीचर्स बच्चों पर कितना ध्यान दे पाएँगे. अभी सभी का पूरी तरह से टीकाकरण ही नहीं हुआ है. बच्चों की तो वैक्सीन ही नहीं आई है, तो ये समझदारी वाला फ़ैसला तो नहीं होगा."

साथ ही वे कहती हैं कि कोविड जब शुरू हुआ, तो स्कूलों में ऑनलाइन क्लास शुरू हुईं जो शिक्षिकों और बच्चों के लिए एकदम नया तजुर्बा था और दोनों के लिए तनावपूर्ण भी था. अब फिर एक ट्रांज़िशन फेज़ यानी बदलाव का चरण होगा, जब बच्चे स्कूल जाएँगे.

प्राथमिक तौर पर स्कूल खुलने पर बच्चों में उत्साह होगा कि दोस्तों से मिलना होगा, खेलना कूदना होगा, एक्टिविटीज़ होंगी. फ़ेस टू फ़ेस टीचिंग दोबारा शुरू होगी. लेकिन कितनी जल्दी बच्चे इस बदलाव की प्रक्रिया को अपना पाएँगे, वो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी निर्भर करता है.

उनके अनुसार, अभिभावक बच्चों के मामले में कोई समझौता नहीं करते और बेहद सावधान रहते हैं. स्कूल तभी खुलने चाहिए, जब वो 100 फ़ीसदी तैयार हो क्योंकि स्कूल भेजने का अभिभावकों में आत्मविश्वस होना चाहिए अगर वो घबराएँगे, तो बच्चा भी घबराएगा.

नीता अरोड़ा ने सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे उन बच्चों के लिए चिंता जताई है, जो ऑनलाइन कक्षाएँ भी नहीं ले पा रहे हैं.

वे सुझाव देती हैं कि एक कक्षा के बच्चों को एक घंटे के लिए बुलाया जाना चाहिए और अलग-अलग कक्षाओं में मात्र 10 बच्चों को बैठाकर पढ़ाया जाना चाहिए लेकिन पूरे सावधानी बरतते हुए ताकि जो बड़ा अंतराल इतने दिनों में इन बच्चों की शिक्षा में आया है, वो धीरे-धीरे पूरा किया जा सके.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)