किसान आंदोलन: 'मन की बात' से मशहूर हुए महाराष्ट्र के किसान की प्रधानमंत्री मोदी ने सुनी 'अधूरी बात'  

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

पीएम मोदी तक पहुंची महाराष्ट्र के किसान की अधूरी 'मन की बात'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 नवंबर को अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में किसानों को नए कृषि क़ानून का लाभ गिनाया था.

उस दिन, दिल्ली के बॉर्डर पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश से आए किसानों के धरने का तीसरा दिन था.

'मन की बात' के ज़रिए भारत की जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को इसलिए किसानों के प्रदर्शन का ख्याल आया था. कार्यक्रम में उन्होंने महाराष्ट्र के धुले ज़िले के किसान जितेंद्र भोई का उदाहरण भी दिया. संदर्भ था, नए कृषि क़ानून से किसानों को फ़ायदा मिल रहा है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "नए कृषि क़ानून से किसानों के बंधन समाप्त हुए हैं और उन्हें नए अधिकार भी मिले हैं. इन अधिकारों ने बहुत ही कम समय में किसानों की परेशानियों को कम करना शुरू कर दिया है."

"महाराष्ट्र के धूले ज़िले के किसान जितेंद्र भोई ने नए कृषि क़ानून का इस्तेमाल कैसे किया ये आपको भी जानना चाहिए. जितेंद्र भोई ने मक्के की खेती की थी और सही दाम के लिए उन्होंने अपनी फ़सल व्यापारियों को बेचना, तय किया था.

फ़सल की कुल क़ीमत तय हुई क़रीब 3 लाख 32 हज़ार रुपये. जितेंद्र भोई को 25 हज़ार रुपये एडवांस भी मिल गए थे. तय ये हुआ था कि बाक़ी का पैसा उन्हें 15 दिन में चुका दिया जाएगा. लेकिन बाद में परिस्थितियाँ ऐसे बनी की उन्हें बाक़ी का पेमेंट नहीं मिला.

किसानों से फ़सल ख़रीद लो और महीनों पेमेंट ना करो, संभवत: मक्का ख़रीदने वाले बरसों से चली आ रही उसी पंरपरा को निभा रहे थे. इसी तरह 4 महीने तक जितेंद्र भोई का पेमेंट नहीं हुआ.

इस स्थिति में उनकी मदद की सितंबर में पास हुए नए कृषि क़ानून ने. वो क़ानून उनके काम आए. इस क़ानून में तय किया गया है कि फ़सल ख़रीदने के तीन दिन में ही किसान को पूरा पेमेंट करना पड़ता है. और अगर पेमेंट नहीं होता है तो किसान शिकायत दर्ज कर सकता है. इस क़ानून में प्रावधान है कि क्षेत्र के एसडीएम को एक महीने के भीतर ही किसान की शिकायत का निपटारा करना होगा.

अब जब ऐसे क़ानून की ताक़त हमारे किसान भाई के पास थी तो उनकी ऐसी समस्या का समाधान तो होना ही था. उन्होंने शिकायत की और चंद ही दिन में उनका बक़ाया चुका दिया गया. यानी क़ानून की सही और पूरी जानकारी ही जितेंद्र की ताक़त बनी."

ये थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 30 नवंबर को दिए गए 'मन की बात' के अंश. प्रधानमंत्री मोदी ने जितेंद्र के बारे में जितनी बातें कही उसमें सच्चाई है. लेकिन बात अधूरी है.

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महाराष्ट्र के किसान जितेंद्र भोई के 'मन की बात'

बीबीसी ने महाराष्ट्र के किसान जितेंद्र भोई से नए कृषि क़ानून पर राय जानने के लिए फ़ोन पर बात की. धुले में अपने घर से बात करते हुए उन्होंने विस्तार से अपनी पूरी कहानी बताई.

ये सच है कि एसडीएम से शिकायत पर उन्हें उनके बक़ाया पैसे व्यापारी से मिल. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि उन्हें अपने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिला, जिस वजह से उनका लाखों का नुक़सान हुआ.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सच्चाई अधूरी ही पता चली.

जितेंद्र भोई पिछले 20 साल से खेती करते हैं. घर पर वो अपने बड़े भाई और माँ के साथ रहते हैं. उनका परिवार किसानी से जुड़ा है और अपने खेतों में कपास, मक्का, मूंगफली की खेती करता है. उनके पास लगभग 15-20 एकड़ खेती की ज़मीन है.

इस साल उन्होंने खेतों में मक्का उगाया था. लेकिन फ़सल की तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उन्हें नहीं मिली. उनका दावा है कि एमएसपी नहीं मिलने की वजह से उन्हें मक्का की खेती में तक़रीबन 2 लाख 25 रुपये का नुक़सान उठाना पड़ा.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "एमएसपी पर बिकता तो मक्के की क़ीमत लगभग 6 लाख रुपये होती. अभी मुझे 3 लाख 32 हज़ार रुपये ही मिले हैं."

मई में फ़सल की कटाई के बाद उन्होंने अपने खेत के पास की मंडी में मक्का बेचने की काफ़ी कोशिश की. लॉकडाउन की वजह से इस बार फ़सल बेचने में उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ी.

उनका कहना है कि जान-पहचान ज़्यादा व्यापारियों से नहीं होने की वजह से उनका मक्का मंडी में नहीं बिका और फिर जुलाई के महीने में उन्हें मध्य प्रदेश के एक व्यापारी से सौदा करना पड़ा. सौदा एमएसपी से कम में तय हुआ.

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नए कृषि क़ानून के बावजूद फ़सल बेचने में हुई दिक़्क़त

जितेंद्र का दावा है कि केंद्र सरकार ने इस साल मक्के की एमएसपी 1850 रुपये प्रति क्विंटल तय की है, जबकि क़ानून में एमएसपी से नीचे फ़सल ख़रीदना चूंकि अपराध नहीं है और इतना मक्का रखने की हमारे पास जगह भी नहीं है, इसलिए मजबूरी में हमें 1240 रुपये प्रति क्विंटल पर मक्का बेचने का सौदा करना पड़ा.

जितेंद्र के यहाँ 340 क्विंटल मक्के की पैदावार हुई थी. जिसमें तक़रीबन 270 क्विंटल उन्होंने मध्य प्रदेश के व्यापारी को बेचा था और बाक़ी का बचा हुआ लोकल में अपने इलाक़े में बेचा था.

मध्य प्रदेश का व्यापारी पिछले तीन-चार सालों से उनके गाँव के लोगों की फ़सल ख़रीद रहा था और पैसे भी समय पर दे रहा था. इस तरह उसने, जितेंद्र के गाँव में सभी किसानों का विश्वास जीत लिया.

"मेरे साथ दो और किसानों की फ़सल उसने ख़रीदी. दो महीने बाद व्यापारी ने केवल 25 हज़ार रुपये भेजे थे. सौदे के समय गांरटी के तौर पर मध्य प्रदेश के व्यापारी ने अपने दस्तख़त किए हुए ब्लैंक चेक भी हमें दिए थे.

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लेकिन पैसा नहीं मिलने पर मेरे साथ के किसान ने वो चेक जब बैंक में जमा किया तो व्यापारी के खाते में पर्याप्त पैसे ना होने की वजह से वो चेक बाउंस हो गया."

यानी सुरक्षा के तौर पर व्यापारी ने ब्लैंक चेक से जितेंद्र के साथ धोखा किया.

आरएसएस से जुड़ी किसानों की संस्था भारतीय किसान संघ की कई माँगों में एक माँग ये भी है कि प्राइवेट व्यापारी फ़सल ख़रीदते समय किसान को बैंक गारंटी दें. ऐसा प्रावधान नए किसान क़ानून में जोड़ा जाए.

चूंकि ये प्रावधान क़ानून में नहीं है, इसलिए जितेंद्र को महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश जाकर एसडीएम के पास लिखित में शिकायत दर्ज करनी पड़ी.

29 सितंबर को जितेंद्र ने ये शिकायत एसडीएम से की थी. उनको पैसा, एक महीने की जगह डेढ़ महीने बाद 16 नवंबर को मिला.

यानी जितेंद्र की जिस फ़सल की कटाई मई महीने में हुई, उसकी क़ीमत उनको नवंबर के महीने में मिली, वो भी एसडीएस के हस्तक्षेप के बाद.

ख़ास बात ये कि 5 जून से ये तीन नए कृषि क़ानून अध्यादेश के रूप में लागू थे. सितंबर के महीने में संसद से पास भी हो गया था. बावजूद इसके उन्हें पेमेंट मिलने में देरी हुई और एमएसपी भी नहीं मिला.

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MSP और नए कृषि क़ानून पर जितेंद्र की राय

केंद्र सरकार 23 फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की हर साल घोषणा तो करती है लेकिन गेंहू, धान, मक्के के अलावा दूसरी फ़सलों के लिए एमएसपी ज़्यादातर किसानों को नहीं मिलती.

एक अनुमान के मुताबिक़ देश के केवल 6 फ़ीसद किसानों को एमएसपी मिलती है, जिसमें पंजाब और हरियाणा के किसान सबसे ज़्यादा हैं. इस वजह से वो नए कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन में सबसे आगे हैं.

लेकिन महाराष्ट्र के धूले ज़िले के किसान जितेंद्र उन बाक़ी के 94 फ़ीसद किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनको मजबूरी में बिना एमएसपी के अपनी फ़सल कम दाम पर धोखेबाज़ व्यापारियों को बेचनी पड़ती है, जिसकी वो मिसाल भी हैं.

नए कृषि क़ानून में बदलाव की माँग क्या सही? इस सवाल पर जितेंद्र कहते हैं, "एमएसपी पर मेरी फ़सल तो सरकार ने नहीं ख़रीदा. अगर क़ानून में ये लिखित में मिले की बाहर के व्यापारी भी एमएसपी पर ही फ़सल ख़रीदेंगे, तो मुझे जो नुक़सान हुआ वो नहीं होता. इसलिए किसानों का ये विरोध सही है."

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दरअसल दिल्ली में धरने पर बैठे किसानों की माँग है कि संसद का विशेष सत्र बुला कर तीनों नए कृषि क़ानून को वापस लिया जाए. वो ये भी चाहते हैं कि एमएसपी पर सरकार क़ानून बनाए ताकि एमएसपी पर सरकारी ख़रीद जारी रहे और व्यापारी भी उसी तय क़ीमत पर उनसे फ़सल ख़रीदें.

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू की गई है. अगर कभी फ़सलों की क़ीमत बाज़ार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फ़सल ख़रीदती है ताकि किसानों को नुक़सान से बचाया जा सके. किसी फ़सल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है. भारत सरकार का कृषि मंत्रालय, कृषि लागत और मूल्य आयोग (कमिशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस CACP) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय करता है. इसके तहत अभी 23 फ़सलों की ख़रीद की जा रही है. इन 23 फ़सलों में धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और कपास जैसी फ़सलें शामिल हैं.

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