कोरोना के दौर में गांव लौट रहे मज़दूर क्या वापस शहर जाएंगे?

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कोरोना संक्रमण को लेकर किए गए देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से विभिन्न राज्यों में फंसे हुए प्रवासी अपने गांवों और घरों को लौट रहे हैं.

25 मार्च को लगाए गए लॉकडाउन के बाद हर रोज़ शहरों से हज़ारों की संख्या में मज़दूरों का गांवों की तरफ़ पलायन जारी है. इसे 'रिवर्स माइग्रेशन' का नाम दिया जा रहा है.

प्रवासियों की बड़ी संख्या को देखते हुए केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने ट्रेनों और बसों की ख़ास व्यवस्था की है. हालांकि इसके बावजूद पैदल अपने गांवों की तरफ़ निकल रहे प्रवासियों की संख्या में कमी आती नहीं दिख रही.

हज़ारों की तादाद में पहुंच रहे मज़दूरों को लेकर राज्यों की चिंताएं अब बढ़ने लगी हैं क्योंकि क्वारंटीन की समायवधि ख़त्म होने के बाद राज्य सरकारों को इनके लिए रोज़गार की व्यवस्था करनी होगी.

भविष्य में रोज़गार को लेकर ख़ुद मज़दूर भी चिंता में हैं. हालांकि उनके लिए अभी सबसे बड़ी मुश्किल जीवन और जीविका के बीच के चुनाव की है.

लेकिन क्या लॉकडाउन खुलने के बाद या फिर कोरोना संकट के टलने के बाद ये मज़दूर वापस काम की तलाश में शहर लौटेंगे?

बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड लौट रहे कुछ मज़दूरों से बात करके बीबीसी ने यही जानने की कोशिश की.

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झारखंड

राँची में मौजूद बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रवि प्रकाश ने बताया कि झारखंड सरकार ने 60 हज़ार से अधिक मज़दूरों की वापसी का दावा किया है. इसके लिए 50 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलायी जा चुकी हैं. फिर भी क़रीब छह लाख लोग दूसरे राज्यों में फँसे हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर कहा कि राज्य के 6 लाख 45 हज़ार 147 लोगों ने वापसी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. इनमें ज़्यादातर लोग प्रवासी मज़दूर हैं. इनके लिए 110 ट्रेनों को स्वीकृति दी जा चुकी है. इसके बावजूद सैकड़ों प्रवासी मज़दूर पैदल और अन्य माध्यमों से अपने घर वापस लौट रहे हैं.

इस दौरान कुछ लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी है. अपने गांव आने की कोशिश में गिरिडीह ज़िले के सुनील कुमार की मौत हो गई है.

मुंबई से ऑटोरिक्शा चलाकर घर लौट रहे सुनील जलगांव के पास सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए. इसके बाद अस्पताल में उनकी मौत हो गई. इसी हादसे में उनकी बहन-बहनोई और उनके बच्चे ज़ख़्मी हो गए.

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद सुनील का शव गिरिडीह वापस लाया जा रहा है. वो घर आने के लिए मुंबई से निकले थे लेकिन अब घरवालों को उनकी लाश का इंतज़ार है.

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मज़दूरों के पलायन की ख़बरों और उनके साथ हो रहे हादसों की ख़बरों से इलाक़े के लोग डर गए हैं. सूरत से लौटे गिरिडीह के राजकुमार मंडल ने बीबीसी से कहा कि अब वे कभी वापस नहीं जाएंगे "बशर्ते सरकार यहीं पर नौकरी का इंतज़ाम कर दे."

गोड्डा ज़िले के रामचंद्र राय भी हरियाणा से अपने गांव लौटे हैं. वो फ़रीदाबाद में राज मिस्त्री का काम करते थे और अभी सुंदरपहाड़ी के क्वारंटीन सेंटर में हैं.उन्होंने कहा, "नून-रोटी खा लेंगे लेकिन अब कमाने के लिए परदेस नहीं जाएंगे. हमारा गांव हमारा सब कुछ है. अब हमें यहां से कहीं नहीं जाना है."ऐसे कई मज़दूर हैं. कई कहानियाँ हैं. इस रिवर्स माइग्रेशन में शामिल अधिकतर मज़दूर घर वापस इसलिए आए हैं, क्योंकि उन्हें फिर कभी नहीं जाना है.

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बिहार

पटना में मौजूद बीबीसी के सहयोगी पत्रकार नीरज प्रियदर्शी बताते हैं कि बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ लॉकडाउन में बाहर फंसे छह लाख से अधिक प्रवासी मज़दूर वापस आ चुके हैं.

बाहर काम-धंधा बंद हो जाने के कारण मजबूर होकर कोई पैदल आया, किसी ने साइकिल का इंतज़ाम कर लिया, कोई ठेला गाड़ी लेकर ही निकल पड़ा तो कोई ट्रक में लदकर आया.

जेठ महीने की गर्मी में रास्ते की तमाम तकलीफ़ों को सहकर अभी भी रोज़ाना हज़ारों की संख्या में मज़दूर वापस आ रहे हैं.

लेकिन क्या लॉकडाउन ख़त्म हो जाने के बाद ये मज़दूर वापस काम के लिए शहर जाएंगे? इस सवाल के जवाब में मज़दूरों की राय अलग-अलग है.

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आरा के संतोष कुमार दिल्ली में रहकर स्पोर्ट्स प्रोड्क्ट बनाने वाली कंपनी में काम करते थे. 19 मार्च को दिल्ली से आरा तक का सफ़र पैदल तय करके आए संतोष ने 15 दिन क्वारंटीन सेंटर में भी बिताया है. संतोष तीन और लोगों के साथ पैदल दिल्ली से निकले थे.

वो कहते हैं, "ये आगे देखा जाएगा. फ़िलहाल तो किसी तरह बचकर आ गए हैं. लेकिन अगर यहां काम नहीं मिलेगा तो पेट और परिवार चलाने के लिए जाना मजबूरी है."

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वहीं समस्तीपुर ज़िले के राकेश कुमार दिल्ली में ही कपड़े की एक कंपनी में सिलाई का काम करते थे. बक़ौल राकेश उन्हें क्वारंटीन सेंटर से निकले 10 दिन हो गए, यहां सीमेंट और बालू ढोने का काम मिल गया है.

वो कहते हैं कि दिल्ली में उनके पास खाने को कुछ नहीं था जिसके बाद उन्होंने पैदल ही निकलने का फ़ैसला किया. वो कहते हैं कि उन्हें एक ट्रक मिला था जिससे उनकी मदद हो गई, लेकिन इसके बावजूज उन्हें दो दिन भूखे रहन पड़ा.

वो कहते हैं, "अब फिर दोबारा वहां नहीं जाएंगे. किसी तरह ज़िंदा बचकर आए हैं. चार दिन भूखे रहना पड़ा है. यहां कमाई कम होगी, मगर भूख से तो नहीं मरेंगे. कुछ ना कुछ करके परिवार पाल लेंगे."

हैदराबाद में लेबर का काम करने वाले नूर मोहम्मद भी गांव लौटे हैं. वो कहते हैं, "यहां काम मिलेगा तो अब वहां क्यों जाएंगे?"

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उत्तर प्रदेश

लखनऊ में मौजूद बीबीसी के सहयोगी पत्रकार समीरात्मज मिश्र ने बताया कि बड़ी संख्या में दूर-दराज़ से चलकर अपने घरों को पहुँच रहे मज़दूरों ने अब लौटकर इन महानगरों में न जाने की ठान ली है.

वो कहते हैं कि न सिर्फ़ मज़दूर बल्कि अच्छी नौकरियाँ कर रहे तमाम लोग भी लॉकडाउन के दौरान सामने आए महानगरीय संस्कृति के सच से परेशान हो गए हैं.

प्रयागराज के रहने वाले संजय कुमार नोएडा की सैमसंग कंपनी में इंजीनियर थे. लॉकडाउन से कुछ दिन पहले घर वापस आ गए.

वो बताते हैं, "मैंने यहाँ आने के बाद तरबूज़ और ख़रबूज़े की खेती की, पैदावारी भी अच्छी हुई है. हमारे पास ज़्यादा खेत तो नहीं है लेकिन इतने में भी हम सुकून के साथ जीवन निर्वाह कर सकते हैं."

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संजय कुमार क़रीब पैंतीस हज़ार रुपये हर महीने पाते थे लेकिन उन्हें रोज़ दस घंटे से ज़्यादा काम करना पड़ता था. हालाँकि इसमें उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं थी लेकिन कहते हैं कि कोरोना संकट के बाद इन महानगरों में ग्रामीण लोगों और मज़दूरों के साथ जो व्यवहार हुआ, उसने उनका दिल तोड़ दिया. वहीं दिनेश तिवारी भी दिल्ली में एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे. कोरोना संकट ने उनकी नौकरी ले ली तो अब उन्होंने गाँव में ही कुछ रोज़गार करने का निश्चय कर लिया है.

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वो कहते हैं, "गाँव में भले ही भूखों मर जाएँ लेकिन बड़े शहरों का रुख़ कभी नहीं करेंगे."

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