नज़रियाः क्या भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतर गई है?

इमेज स्रोत, DIPTENDU DUTTA/AFP/Getty Images

    • Author, प्रोफ़ेसर अरुण कुमार
    • पदनाम, अर्थशास्त्री

केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने साल 2017-18 में देश की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी रहने की संभावना जताई है.

आने वाले वित्त वर्ष में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर घटने का अनुमान लगाया गया है.

इस रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों में आगामी वित्त वर्ष 2017-18 में जीडीपी की दर 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है जबकि 2016-17 में यह दर 7.1 प्रतिशत थी.

इन आंकड़ों से आने वाले दिनों में देश की आम जनता पर पड़ने वाले असर को लेकर बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार से बात की.

इमेज स्रोत, MANJUNATH KIRAN/AFP/Getty Images

अरुण कुमार का नज़रिया

7.1 फीसदी का आंकड़ा नोटबंदी के समय का है. उस समय असंगठित क्षेत्र बहुत गिर गया था. वहां उत्पादन और रोज़गार में बहुत गिरावट आई थी.

लेकिन ये आंकड़ा उसे दर्शाता नहीं है. क्योंकि नोटबंदी का असर सबसे अधिक असंगठित क्षेत्र, किसानों और हमारे व्यापार पर असर पड़ा था.

नोटबंदी के बाद जीएसटी का असर आ गया. इसलिए असंगठित क्षेत्र को बहुत बड़ा धक्का लगा है.

केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (सीएसओ) के आंकड़े केवल संगठित क्षेत्र के होते हैं और इसमें असंगठित क्षेत्र के आंकड़े नहीं होते हैं.

वो मान लेते हैं कि संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र एक रफ़्तार से चल रहे हैं. यह सही अनुमान नहीं है.

इमेज स्रोत, SAM PANTHAKY/AFP/Getty Images

मंदी की रफ़्तार से चल रही अर्थव्यवस्था

यदि संगठित क्षेत्र पर बहुत असर नहीं हुआ तो यह मानना सही नहीं है कि असंगठित क्षेत्र पर भी असर नहीं हुआ.

मेरा मानना है कि अर्थव्यवस्था के बढ़ने की दर 6.5 प्रतिशत की जगह एक प्रतिशत से कम होगी.

यानी हमारी अर्थव्यवस्था एक तरह से मंदी की रफ़्तार में चल रही है. उससे रोज़गार निर्माण, किसानों और कुटीर उद्योग पर बहुत गहरा असर पड़ेगा.

यह एक प्रकार के संकट का समय है जिसे हमारे आंकड़े दिखाते नहीं हैं.

इमेज स्रोत, ARUN SANKAR/AFP/Getty Images

आम आदमी पर क्या होगा असर?

धीमी अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र पर असर से इस क्षेत्र में कार्यरत कई लोगों का रोज़गार चला जाता है.

इससे उनके ख़रीदने की क्षमता पर सीधा असर पड़ता है. इसके चलते हाल के दिनों में मनरेगा में डिमांड बढ़ी है.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोग शहरों से गांवों में वापस गए हैं. मांग कम होने से कीमतें कम होनी चाहिए लेकिन शहरों में सब्ज़ियों-फलों की कीमतों में उछाल है.

ऐसा इसलिये हुआ है क्योंकि ट्रेड ने मार्जिन या मुनाफ़ा बढ़ा दिया है. इससे कीमतें बढ़ गयी हैं.

एक तरफ नौकरियां कम होने से आमदनी में कमी आई है तो वहीं दूसरी ओर कीमतें बढ़ने से आम जनता पर दोहरी मार पड़ रही है.

इमेज स्रोत, INDRANIL MUKHERJEE/AFP/Getty Images

गिरावट का क्या है कारण?

नोटबंदी से 85 फ़ीसदी मुद्रा निकालने का सीधा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ा.

इसी तरह जीएसटी में इनपुट, क्रेडिट और रिवर्स चार्ज और प्रत्येक साल कई रिटर्न फाइल करने जैसी पेचीदगी है. इससे फिर असंगठित क्षेत्र पर असर पड़ा.

असंगठित क्षेत्र में निवेश कम हो गया.

वर्किंग कैपिटल न होने की वजह से असंगठित क्षेत्र के लोगों को माल ख़रीदने और पैसा न होने की वजह से रोज़गार देने की समस्या उत्पन्न हुई.

इन दोनों चीजों का असर अब तक देश की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है और आगे भी बना रहेगा क्योंकि असंगठित क्षेत्र को बैंक से कर्ज़ भी नहीं मिलेगा.

इमेज स्रोत, INDRANIL MUKHERJEE/AFP/Getty Images

असंगठित क्षेत्र पर संकट

अगर किसी अन्य जगह से पैसा मिल भी जाता है तो बहुत अधिक ब्याज़ दर पर और इससे उसका लाभांश बहुत कम हो जाता है.

अर्थव्यवस्था का 45 फ़ीसदी उत्पादन असंगठित क्षेत्र से आता है और हाल के दिनों में इस पर आई कई तरह की मुश्किलों से यह संकट के दौर में है.

अगर यह मान लें कि पिछले एक साल में उसमें 10 फ़ीसदी भी गिरावट आई है तो वहीं से यह ग्रोथ का माइनस 4.5 फ़ीसदी हो जाता है.

और यदि संगठित क्षेत्र 6 से 7 फ़ीसदी की दर से बढ़ भी रहा है तो वहां पर तीन फ़ीसदी की बढ़त है.

माइनस 4.5 और तीन प्रतिशत यानी विकास दर नकारात्मक हो जाती है. रोज़गार की किल्लत से युवाओं में रोष है. गुजरात में इसका असर भी दिखा.

यदि देश की आर्थिक स्थिति में गिरावट बनी रही तो 2019 के चुनाव में इसका सीधा असर भी देखने को मिलेगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)