'पाकिस्तान की आक्रामक भाषा का कोई महत्व नहीं'
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- Author, कंवल सिब्बल
- पदनाम, वरिष्ठ राजनयिक, बीबीसी हिंदी के लिए
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जब भी संयुक्त राष्ट्र में जाते हैं तो यह पहले से ही अनुमानित रहता है कि वे कश्मीर का मुद्दा उठाएंगे.
हालांकि इस बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद ख़क़ान अब्बासी की स्पीच बहुत ज़्यादा ही आक्रामक थी. इसका कारण यह है कि पाकिस्तान पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ रहा है. उन पर संयुक्त राष्ट्र का दबाव भी है.
इन दबावों के चलते ही पाकिस्तान ने आक्रामक रवैया अपनाया है. वो कहते हैं ना 'ऑफ़ेंस इज़ बेस्ट डिफ़ेंस'. लिहाज़ा पाकिस्तान ने शब्दों से ही आक्रमण किया है, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के भाषण में यही आक्रामता झलकी.
भारत से घबराया पाकिस्तान
भारत ने कश्मीर में पिछले कुछ हफ़्तों में जो कार्रवाई की है, वहां बहुत से चरमपंथियों को मार गिराया है और वहां के हालात को नियंत्रित किया है, इससे पाकिस्तान काफ़ी हद तक घबराया हुआ है.
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इसके अलावा एनआईए ने हुर्रियत के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की है, पाकिस्तान और आईएसआई के ज़रिए हुर्रियत को मिलने वाले पैसे का पता लगाया है, इससे पाकिस्तान को धक्का लगा है.
संयुक्त राष्ट्र ने भी काफ़ी बड़ा क़दम उठाया है, उन्होंने हिज़बुल मुजाहिद्दीन के एक दो नेताओं जैसे सैयद सलाहुदीन को चरमपंथी घोषित कर दिया है और उनके संगठनों को भी प्रतिबंधित किया है. इसलिए भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इतना कड़ा भाषण दिया है.
अपनी जनता को ख़ुश करने वाला भाषण
अब्बासी का भाषण सुनने वाले ना संयुक्त राष्ट्र में हैं और ना ही कहीं और. इसे सुनने वाले पाकिस्तान में ही हैं. इसलिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के भाषण का रुख़ अपनी ही जनता की तरफ़ था.
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पाकिस्तान के इस कड़े भाषण से दो बातें निकलती हैं. पहली तो यह कि पाकिस्तान में अभी अंतरिम सरकार है. जब वहां दोबारा चुनाव होंगे तो यह देखना पड़ेगा कि वहां कौन जीतता है और कौन प्रधानमंत्री बनता है. इसलिए फ़िलहाल इस सरकार का कोई बहुत ज़्यादा महत्व नहीं है.
अभी तो पाकिस्तान की मिलिट्री और आईएसआई वालों ने उन्हें जो लिख कर दे दिया, उन्होंने वही कह दिया. इसलिए इन्होंने जो कहा उसका कोई अंतराराष्ट्रीय महत्व नहीं है.
पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि भी बहुत बिगड़ गई है. उन्हें ब्रिक्स में भी झटका लगा, वहां रूस और चीन ने भी लश्कर-ए-तैयबा को पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन मान लिया है.
भारत के कड़े जवाब का मतलब
भारत ने भी पाकिस्तान को बहुत कड़ा जवाब दिया है, यह तो चलता रहेगा. वो आरोप लगाते रहेंगे और भारत भी अपने जवाब देने के अधिकार के तहत जवाब देता रहेगा. इस बार पाकिस्तान की तरफ़ से ही आक्रामक भाषण दिया गया तो भारत ने भी ऐसा ही जवाब दिया.
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अभी वहां की सरकार में बदलाव का वक्त है, इसलिए अभी यह नहीं समझा जा सकता कि पाकिस्तान में चुनाव के बाद क्या माहौल होगा. फ़िलहाल तो दोनों देशों के बीच किसी तरह की बातचीत के आसार नहीं हैं. इसलिए दोनों ही तरफ़ से आक्रामक शब्दों का प्रयोग किया गया.
कुछ महीने बाद जब चुनाव हो जाएंगे तब मालूम चलेगा कि पाकिस्तान के साथ किस तरह बातचीत का दौर आगे बढ़ाया जाएगा.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पाकिस्तान को किनारे किया
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पाकिस्तान को किनारे कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे किनारे ही रखा है. इसलिए पाकिस्तान इसी तरह से शोर मचाएगा. वह परमाणु ख़तरों की बात करेगा.
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पाकिस्तान ने अपने पहले के भाषणों में भी यह कहा है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं. इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह बात उठने लगती है कि कहीं परमाणु युद्ध का ख़तरा न पैदा हो जाए. वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपनी इन बातों से डराना चाहता है.
वहीं दूसरी ओर, भारत ने भी पाकिस्तान को कड़ा जवाब दिया है. जिस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल पाकिस्तान की ओर से किया गया था, उसे देखते हुए ये ज़रूरी भी था.
अगर पाकिस्तान अपने भाषण में इतना आक्रामक नहीं होता तो भारत भी नहीं होता. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच करवाने जैसी बाते कहीं. इसलिए भारत ने भी ऐसा ही जवाब दिया.
अगर पाकिस्तान अपने शब्दों पर नियंत्रण रखेगा तो भारत भी वैसा ही रुख़ अपनाएगा. भारत को भी अपनी जनता के जज़्बातों का ख़्याल रखना पड़ता है, लेकिन फ़िलहाल तो यही लगता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच अभी बातचीत नहीं होने जा रही.
(बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार के साथ बातचीत पर आधारित)
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