नज़रिया- राहुल और कांग्रेस: संकट नेतृत्व का या अस्तित्व का?
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- Author, कल्याणी शंकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
नेतृत्व की कमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपने के मामले में एक तरफ तो 132 साल पुरानी कांग्रेस संघर्ष करती हुई दिख रही है, वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी आसानी से ये कर लेती है.
सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस की दिक्कत क्या है. पार्टी और सरकार की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में आई और तीन साल में बीजेपी ने ये काम पूरा कर लिया.
भारतीय जनता पार्टी में कोई नंबर दो नहीं है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी केवल उनके आदेश की तामील ही करते हैं.
वहीं, कांग्रेस में सत्ता के दो केंद्र हैं- पहला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और दूसरा पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी.
हालांकि अब सोनिया गांधी पिछली सीट पर दिखती हैं और राहुल स्टियरिंग थामे हुए. हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों से ये बात जाहिर हो जाती है.
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लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे कद्दावर नेताओं को हाशिये पर पहुंचाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कामयाब रहे.
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इन नेताओं को उस मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बना दिया गया जो एक बार भी मिल नहीं सका. इन वरिष्ठ नेताओं के पास मोदी की छाया में बने रहने के अलावा अब कोई विकल्प भी नहीं बचा है.
मोदी ने महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस, असम में सर्बानंद सोनोवाल, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जैसे युवा नेताओं को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना और यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी उन्हीं की पसंद हैं.
पियूष गोयल, निर्मला सीतारमण, जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान, किरेन रिजिजू और स्मृति इरानी जैसे चेहरों से प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार को युवा इमेज दी है.
पार्टी में भी वो नौजवान नेताओं को लेकर आए हैं. हालांकि हैरान करने वाली बात ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस से उम्रदराज हो रहे नेताओं को पार्टी में लाने में नहीं हिचके.
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ताजा मामला कांग्रेस के बीजेपी में आए पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान नारायण दत्त तिवारी का है.
गांधी परिवार
उनका मकसद कांग्रेस को हतोत्साहित करना ही रहा होगा. 75 साल से ज्यादा उम्र वाले नेताओं को रिटायर करने में बीजेपी कामयाब रही और कांग्रेस अब भी इससे जूझ रही है.
उसे पार्टी के 'बूढ़े शेरों' के हितों का ख्याल रखने और नई जमात के नेताओं को आगे लाने की जरूरत के बीच संतुलन साधना है.
पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी कांग्रेस में नए खून को दौड़ते हुए देखना चाहेंगे.
चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा होता तो गांधी परिवार को मुश्किल नहीं होती मगर कांग्रेस लगातार कमज़ोर होती जा रही है और अभी उसके सामने लगभग अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है.
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उधर, प्रधानमंत्री मोदी एक तरफा तरीके से सरकार और पार्टी चला सकते हैं क्योंकि वोट खींचने की उनकी काबिलियत को लेकर सवाल नहीं किया जा सकता.
कांग्रेस पार्टी
ये बात 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भी साबित हुई है.
इसमें शक नहीं कि अतीत में कांग्रेस ने पार्टी की कमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाती हुई देखी है.
सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के कामराज, मोरारजी देसाई और निजलिंगप्पा से परेशान होकर उनकी जगह अपने वफादारों को ले आईं.
1984 में जब राजीव गांधी आए तो वे भी इंदिरा गांधी की टीम के कुछ लोगों के साथ असहज महसूस कर रहे थे.
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अरुण सिंह, अरुण नेहरू, मणिशंकर अय्यर और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे लोगों को राजीव राजनीति में लेकर आए थे.
पार्टी में रहस्य
जब सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष बनीं तो उन्होंने भी अर्जुन सिंह, माखनलाल फोतेदार, नारायण दत्त तिवारी और सिताराम केसरी जैसे पुराने नेताओं से किनारा कर लिया.
और उनकी जगह अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी और अंबिका सोनी को आगे लेकर आईं.
साल 2013 में जब राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया तो ये माना गया कि पार्टी की कमान वे कभी भी अपने हाथ में ले सकते हैं.
चार साल बीत गए हैं और रहस्य अभी भी बना हुआ है. अनिश्चितता की इस स्थिति के कारण ज्यादातर वरिष्ठ नेता पार्टी से ज्यादा अपने भविष्य के लिए परेशान हैं.
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कहा जा रहा है कि वे राहुल की तरक्की को नुकसान पहुंचा रहे हैं. ये बात राहुल गांधी को समझ में भी आती है कि उनके आगे बढ़ने से पार्टी के सीनियर नेता थोड़े असहज हैं.
पार्टी की कमान
उन्होंने कई बार ये कहकर उन्हें भरोसा भी दिलाया है कि वे वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करते हैं.
भले ही सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान पूरी तरह से बेटे को सौंप दी है लेकिन ऐसे मौके आते रहते हैं जब उनके करीबी लोगों और राहुल की टीम के बीच कहासुनी होती रहती है.
यथास्थिति बनाए रखने की गांधी परिवार की संस्कृति के कारण परेशानी बढ़ती दिख रही है.
2014 की हार के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से पार्टी हाईकमान बचते हुए दिखी और इस बार के विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ.
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दूसरी बात ये भी है कि राहुल गांधी ने अतीत में युवा नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी देकर और यहां तक कि मुख्यमंत्री बनाकर प्रयोग किए लेकिन उनमें से ज्यादातर नाकाम ही रहे.
सीनियर नेता
चाहे वो अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण, मोहन प्रकाश, संजय निरुपम, सीपी जोशी हों या फिर मधुसूदन मिस्त्री.
राहुल की 'पसंद के नेता' जनाधारविहीन हैं. उनमें फैसले लेने की कमी दिखती है.
तीसरा ये कि राहुल बाहर से आए लोगों को उनकी खूबियों के आधार पर पार्टी में मौका देना चाहते हैं लेकिन पार्टी के सीनियर नेता इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि पुराने तौर तरीके जांचे परखे हैं और बीते सालों में पार्टी को नतीजे देते आए हैं.
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चौथा ये कि राहुल की पसंद को लेकर पार्टी में कोई झगड़ा नहीं हो सकता लेकिन इस बात को लेकर बेचैनी दिखती है कि उन्हें 'जनाधारविहीन चेहरों वाली अपनी टीम' से छुटकारा ले लेना चाहिए.
फिलहाल मां-बेटे पर संगठन में आमूलचूल बदलाव के लिए बहुत दबाव है. अपने ही वजूद के लिए राहुल को कुछ कर दिखाने की कोशिश करनी है.
पहली चीज ये कि वे पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालें और फिर संगठन के स्तर पर बदलावों की शुरुआत करें.
क्या वे पार्टी के पुराने और नए खून के बीच संतुलन साधने में कामयाब होंगे? क्या वे पार्टी में जोश भर पाने में सफल होंगे?
जब तक वे ऐसा नहीं करते कांग्रेस और राहुल दोनों ही राजनीतिक तौर पर अपने होने का मतलब गंवा देंगे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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