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फंड कटौती से 'कैंसरग्रस्त' हुई उच्च शिक्षा
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बनारस में काशी विद्यापीठ से पीएचडी कर रहे प्रदीप कुमार को छह माह से फेलोशिप नहीं मिल रही है. पीएचडी कर रहे दलित छात्र राजकुमार का भी यही हाल है.
दोनों का कहना है कि फेलोशिप न मिलने के कारण उनकी पीएचीडी किसी बुरे स्वप्न की तरह हो गई है.
यह कहानी केवल प्रदीप और राजकुमार की ही नहीं है. राज्यों के लगभग विश्वविद्यालयों में पीएचडी कर रहे छात्र-छात्रों का यह साझा दुख है.
दरअसल इस वित्तीय वर्ष में यूजीसी को मिलने वाले फंड में सरकार ने 50 फ़ीसदी की कटौती कर दी थी.
ज़ाहिर है यूनिवर्सिटियों पर तो असर हुआ, छात्रों को मिलने वाली फेलोशिप में बाधा आई.
यूजीसी का कहना है कि वो पैसों की कमी से खेल, लाइब्रेरी, दलित और आदिवासी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति समेत दूसरे कामों के लिए मदद नहीं कर पा रहा है.
यूनिवर्सिटी कॉलेजों के लिए इन क्षेत्रों के लिए प्रस्ताव लिया करते थे.
यूजीसी के उपसचिव जीएस चौहान ने कहा कि फंड कटौती के असर को कई रूपों में समझा जा सकता है. उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर फेलोशिप पर पड़ा है.
चौहान ने कहा, ''अनुसूचित जाति और जनजातियों को मिलने वाली फेलोशिप फंड कटौती के कारण संकट में है. अब राज्य की यूनिवर्सिटियों पर कई मानदंडों को पूरा करने की शर्तें तय कर दी गई हैं, जिससे यूजीसी द्वारा फंड जारी करना अब आसान नहीं रहा. पहले राज्य की यूनिवर्सिटी को यूजीसी सीधे ऑनलाइन फंड जारी कर देती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. इसके लिए यूनिवर्सिटी की रैंकिंग, टीचर्स की संख्या और अन्य मानकों को पूरे किए बिना फंड नहीं मिलता है. इस कसौटी पर राज्यों के कई यूनिवर्सिटी खरे नहीं उतरते.''
देश के जाने-माने शिक्षाविद प्रोफेसर कृष्ण कुमार का कहना है कि यूजीसी फंड में 50 फ़ीसदी की कटौती किसी कैंसर से कम नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के उन देशों में है जहां शिक्षा पर सबसे कम निवेश होता है.
कृष्ण कुमार ने कहा, ''भारत आज़ादी के बाद से अपनी शिक्षा पर तीन प्रतीशत खर्च करता आ रहा रहा है. राष्ट्रीय उत्पादन और आय में वृद्धि भी हुई लेकिन शिक्षा पर सरकारी निवेश तीन प्रतिशत से सवा तीन तक ही रहा. यह सिलसिला आज भी जारी है. यूजीसी को मिलने वाले फंड में 50 फ़ीसदी की कटौती उच्च शिक्षा की बीमारी को कैंसरग्रस्त करने वाली है. इससे राज्यों में जर्जर हालत में जिंदा यूनिवर्सिटी और बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं. आज से 50 वर्ष पहले बने कोठारी आयोग ने सिफारिश की थी कि राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत तो शिक्षा पर खर्च होना ही चाहिए.''
मोदी सरकार आने के बाद नई शिक्षा नीति के लिए टीएसआर सुब्रमण्यन समिति बनी थी.
प्रोफ़सर सुब्रमण्यन का कहना है कि उच्च शिक्षा भयावह दौर में है. सरकारी निवेश लगातार कम हो रहे हैं.
तो क्या सरकार उच्च शिक्षा की ज़िम्मेदारी से पीछे हट रही है? इस पर कृष्ण कुमार ने कहा कि अब देश की यूनिवर्सिटियो में होने वाला 65 फ़ीसदी दाख़िला निजी कॉलेजों में हो रहा है. कुमार ने कहा कि यह निजीकरण को बढ़ावा देने की नीति है.
सुब्रमण्यन कमिटी के सिफ़ारिशों को फ़िलहाल मोदी सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है.
इसी तरह 2009 में बनी यशपाल समिति की सिफ़िरिशों को भी मनमोहन सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था. यशपाल समिति में तो खुलकर इस बात का समर्थन किया गया था उच्च शिक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाना चाहिए.
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