मालदीवः आपके बजट की 'जन्नत' जो कभी थी हसरत और अब है हक़ीक़त

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इमेज कैप्शन, मालदीव में बीते एक दशक में यहां एक ख़ामोश क्रांति हुई है
    • Author, कार्मेन रॉबर्ट्स
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

मालदीव कभी केवल 'अल्ट्रा रिच' या बड़े-बड़े धन्नासेठों के घूमने की जगह हुआ करता था लेकिन अब वहां पर्यटन के ऐसे मॉडल को अपनाया जा रहा है जो स्थानीय और किफ़ायती है. इस वजह से इस जन्नत का तजुर्बा करने वालों में बदलाव आ रहा है.

उस वक़्त फ़िज़ा में नमक और तरबूज़ की ख़ुशबू थी, जब हमारी फ़ेरी थोड्डू नाम के द्वीप पर रुकी.

12 साल पहले जब मैं बीबीसी के 'द ट्रैवल शो' की एक कड़ी की शूटिंग के लिए यहां आई थी तो मालदीव एक ऐसी फ़ंतासी वाली जगह थी जहां निजी द्वीप और आसमान छूती क़ीमतें ज़्यादातर पर्यटकों को दूर रहने पर मजबूर कर देती थीं.

लेकिन अब यहां पर्यटन के लिए आने वाले परिवार बैकपैक लटकाए बोट से उतर रहे थे, न कि केवल वह अमीर लोग जिनका सामान उठाने के लिए 'बेलबॉय' खड़े रहते थे. यह वो मालदीव नहीं, जो मेरी यादों में था और यही असल बात थी.

माफ़ी चाहते हैं, हम इस स्टोरी का कुछ हिस्सा लाइटवेट मोबाइल पेज पर नहीं दिखा सकते.

पिछले एक दशक में यहां एक ख़ामोश क्रांति हुई है. सरकारी सुधारों के बाद स्थानीय लोगों के लिए पहले से बसे हुए द्वीपों पर गेस्ट हाउस खोलना आसान हुआ है. इससे पहले पर्यटन सिर्फ़ कम आबादी वाले द्वीपों पर स्थित महंगे रिसॉर्ट्स तक सीमित था.

इन सुधारों का असर साफ़ नज़र आता है. देश के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार, अब 90 द्वीपों पर ऐसे लगभग 1200 गेस्ट हाउस हैं. इसका मतलब है कि पर्यटक अब सचमुच देश की संस्कृति का अनुभव कर सकते हैं और पहली बार स्थानीय परिवार सीधे उस सेक्टर से आर्थिक लाभ कमा सकते हैं जो उनकी अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी है.

मेरे साथ मेरे तीन बच्चे भी थे और मैं देखना चाहती थी कि इस बदलाव का असर क्या है. हमने थोड्डू द्वीप पर एक घर का पका खाना खाया और हम एक मध्यम दर्जे के रिसॉर्ट में भी ठहरे जो ऐश-ओ-आराम की नई और सस्ती शक्ल पेश करता है. यह इस देश की कहानी बयान करता है जो चुपचाप स्वर्ग का नया रूप पेश कर रहा है.

स्थानीय द्वीप पर ज़िंदगी

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इमेज कैप्शन, मालदीव में पहले पर्यटन कम आबादी वाले द्वीपों पर स्थित महंगे रिसॉर्ट्स तक ही सीमित था

थोड्डू द्वीप पर क़दम रखते ही ऐसा लगता है कि आप उस दुनिया से बहुत दूर आ गए हैं जो किसी आलीशान रिसॉर्ट में नज़र आती है. राजधानी माले से स्पीड बोट 90 मिनट में आपको यहां पहुंचा देती है और यह किसी रिसॉर्ट के 'सीप्लेन' से बहुत सस्ती भी पड़ती है.

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हमने यहां पहुंचने के बाद देखा कि यहां ज़िंदगी की रफ़्तार बिल्कुल अलग है. कोई कार नहीं थी, सिर्फ़ साइकिल या इक्का-दुक्का बिजली से चलने वाली बग्गी नज़र आई. यहां पपीते के पेड़ की कतारें थीं. तरबूज़ के खेत थे. यह सब मालदीव के नीले समंदर से घिरे थे.

हम 'सेरेना स्काई' में ठहरे जो इस द्वीप का पहला गेस्ट हाउस है. इसके मालिक अहमद कराम हैं जो मालदीव में गेस्ट हाउस एसोसिएशन के अध्यक्ष और तेज़ी से बढ़ते देश के पर्यटन आंदोलन के अगुवा भी हैं.

यह जगह साधारण लेकिन बेहद साफ़-सुथरी थी. तकिए किसी महंगे डिज़ाइनर के नहीं थे और बाथरूम भी मोटे तौर पर अच्छा था. हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया और घर का बना खाना शानदार था. इसमें तली हुई वह मछली भी शामिल थी जो कुछ घंटे पहले पकड़ी गई थी. इसके अलावा पास के खेत से ले गए कोहड़े की रसदार सब्ज़ी और तरबूज़ का जूस भी था.

अहमद ने बताया, "कम्युनिटी टूरिज़्म ने यहां सबकुछ बदल दिया है. अब स्थानीय लोग सीधे पर्यटन के डॉलर से फ़ायदा उठाते हैं, लेकिन हमें यह भी एहसास हुआ है कि हमें इन द्वीपों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखना होगा. लोग यही सब तो देखने आते हैं."

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इमेज कैप्शन, मालदीव की अधिकांश आबादी मुस्लिम है और वहां ड्रेस कोड सख़्त है

मेरे बच्चों को इस द्वीप पर मिली आज़ादी बहुत पसंद आई. हमने स्थानीय लोगों के साथ स्नॉर्कलिंग (सांस के लिए पाइप लगाकर तैराकी) की और पहली बार समुद्री कछुओं को देखने का जादुई अनुभव हुआ.

बाद में हमने 'बिकिनी बीच' पर आराम किया जो कई जगहों पर विदेशियों के लिए ख़ास तौर पर बनाए गए हैं ताकि वह पश्चिमी अंदाज़ में नहा सकें और सनबाथ (धूप) का मज़ा ले सकें.

मालदीव में बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है और यहां कपड़ों का ख़याल रखना पड़ता है.

हमारी मुलाक़ात एंडी अनीस से हुई जो स्थानीय किसान थे. उन्होंने हमें अपने बाग़ में दावत दी और ताज़ा तरबूज़ खिलाया.

गर्मी में तरबूज़ का रस हमारी कलाइयों तक आ रहा था. बाद में हमने अनीस के छोटे जूस बार में नारियल आइसक्रीम खाई और डूबते सूरज को निहारा.

किफ़ायती लग्ज़री

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इमेज कैप्शन, मालदीव में काफ़ी कुछ बदल रहा है

हमारे सफ़र का दूसरा हिस्सा हमें बिल्कुल अलग दुनिया में ले गया. 'सन सियाम' रिसॉर्ट में भी गर्मजोशी से स्वागत हुआ लेकिन यह कुछ हद तक नाटकीय भी था क्योंकि वहां ढोल के साथ मुस्कुराता स्टाफ़ ठंडे तौलिए लेकर खड़ा मिला. फिर भी जो चीज़ सबसे अलग लगी, वह यहां की सादगी थी. यहां राइल हमारे मेज़बान थे. वह स्नॉर्केल गियर से बच्चों की दवा तक- सब कुछ व्हाट्सऐप से मैनेज कर रहे थे.

हमने समुद्र तट पर स्थित दो कमरों वाला विला लिया. हमने जो प्लान लिया था, उसमें तीन द्वीपों पर मौजूद दस रेस्त्रां और बार की सर्विस शामिल थी. इसके साथ दूसरी गतिविधियां भी. इसकी वजह से हमारे पास वक़्त भी था और आज़ादी भी.

ऐसे परिवार जो अल्ट्रा लग्ज़री वाले प्राइस टैग से बचना चाहते हैं, उनके लिए 'सन सियाम' बेहद अच्छी सुविधा देता है. मेरे बच्चों ने बीच पर ख़ूब मस्ती की, शार्क और कछुए देखे. मैं शार्क पॉइंट और बनाना रीफ़ देखने के लिए बोट डाइविंग करती रही. यहां मालदीव के 210 मीटर सबसे लंबे पूल समेत छह स्विमिंग पूल भी थे. यहां मनोरंजन और आराम के लिए काफ़ी जगह थी.

ऐसे रिसॉर्टस मालदीव की नई रणनीति का चेहरा हैं और 'सन सियाम केयर्स प्रोग्राम' के तहत पर्यटक बीच की सफ़ाई में भी शामिल हो सकते हैं. इस रिसॉर्ट की 'रिसाइकल-रीयूज़' पहल के तहत यहां पुराने कपड़ों का इस्तेमाल होता है और सिंगल यूज़ प्लास्टिक को पूरी तरह हटा दिया गया है. जब मैंने भीगे 'स्विमवियर' के लिए प्लास्टिक बैग मांगा तो मुझे मुस्कुराते हुए जवाब मिला, "अब हम इनका इस्तेमाल नहीं करते."

यह उसी रणनीति का हिस्सा है जो यहां पर्यटन को सस्ता और टिकाऊ बना रही है. पर्यटन और पर्यावरण नीति अब एक साथ काम कर रही हैं और नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो और समुद्री जीव का संरक्षण हो. राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की सरकार ने 2028 तक 33 फ़ीसद बिजली रिन्यूएबल सोर्सेज़ से बनाने का लक्ष्य रखा है.

बेशक मालदीव बदल रहा है और सब कुछ ख़ामोशी से भी नहीं हो रहा. गेस्ट हाउस और परिवारों द्वारा संचालित 'होम स्टे' स्थानीय जीवन का सीधा और सार्थक अनुभव दे रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि आराम और अंतरात्मा का साथ संभव है.

कभी महंगाई की वजह से आम लोगों की पहुंच से बिल्कुल दूर रहने वाला मालदीव अब पर्यटकों के लिए केवल अमीरों की लग्ज़री से बढ़कर काफ़ी कुछ है और वह है एक असली और शुद्ध अनुभव. जो जगह कभी हनीमून मनाने वालों के लिए फ़ैंटेसी थी, वहां घूमना अब परिवार वालों के लिए केवल हसरत ही नहीं बल्कि हक़ीक़त है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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