असम की सियासत में कहाँ हैं मुसलमान, क्या हैं उनके मुद्दे- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से
- पढ़ने का समय: 14 मिनट
लोअर असम के मुस्लिम बहुल बरपेटा ज़िले की मंदिया सीट पर कांग्रेस की रैली में लोगों की भारी भीड़ है. यहाँ आए अधिकतर लोग स्थानीय मुसलमान हैं.
असम के चुनावी शोर में मुसलमानों के मुद्दों की गूँज भी सुनाई देती है.
लोग बेदख़ली, भेदभाव, पिछड़ेपन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के अलावा जिस एक विषय पर सबसे ज़्यादा बात करते हैं वह है- परिसीमन.
भारत में जम्मू-कश्मीर के बाद असम में प्रतिशत के लिहाज़ से मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी रहती है.
2011 की जनगणना के मुताबिक़, असम की कुल आबादी में क़रीब 35 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
126 सीटों वाली असम विधानसभा में फ़िलहाल 31 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें 15 बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ के हैं और 15 कांग्रेस के.
अब परिसीमन और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह संख्या और घट सकती है.
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दरअसल, साल 2023 में चुनाव आयोग ने असम में लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएँ फिर से निर्धारित की थीं. इस परिसीमन के बाद कई सीटों का सियासी गणित बदल गया है.
कांग्रेस प्रवक्ता अमन वदूद कहते हैं, "यहाँ परिसीमन इस तरह से किया गया कि एक धर्म के लोगों को एकजुट कर दिया गया. धर्म के आधार पर लोगों को विधानसभा सीटों में डाला गया. पहले ऐसी 32-33 सीटें थीं, जहाँ मुसलमान वोटर बहुसंख्यक थे लेकिन अब ये संख्या 21-22 ही रह गई है. इससे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घट सकता है."
ऐसी ही आशंकाएँ आम लोग भी ज़ाहिर करते हैं.
मध्य असम के होजाई ज़िले की जिस बीनाकांदी सीट से एआईयूडीएफ़ के संस्थापक बदरुद्दीन अजमल मैदान में हैं, यहाँ अब 90 फ़ीसदी से अधिक मुसलमान मतदाता हैं.
परिसीमन के बाद ये नई सीट गठित की गई है.
परिसीमन के बाद की सीटें

होजाई ज़िले की कुल आबादी में लगभग 50 फ़ीसदी मुसलमान हैं, जिनमें अधिकतर अब इसी बीनाकांदी सीट में हैं.
इसी सीट के मतदाता अब्दुल जलील कहते हैं, "हमारे ज़िले में तीन विधानसभाएँ थीं, होजाई, लम्डिंग और जमुनामुख. अब जमुनामुख की जगह बीनाकांदी सीट बनाई गई है, जिसमें सब मुसलमानों को एकजुट कर दिया गया है, ऐसा सिर्फ़ होजाई में ही नहीं हुआ है, पूरे असम में यही हुआ है."
वहीं बरपेटा ज़िले के रहने वाले मैनुद्दीन कहते हैं, "35 प्रतिशत के क़रीब मुसलमान हैं लेकिन उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ़ 24 प्रतिशत ही है, अब परिसीमन ऐसे किया गया है कि ये और घटकर 10-15 प्रतिशत ही रह जाएगा."
होजाई की तरह ही बरपेटा ज़िले का भी राजनीतिक नक़्शा बदल गया है.
बरपेटा विधानसभा सीट पहले मुस्लिम बहुल थी, अब मिश्रित सीट बन गई है. लोअर असम से लेकर बराक घाटी तक, कई सीटों का गणित ऐसे ही बदल गया है.
राज्य सरकार संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हुए इस परिसीमन से किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाने के आरोपों को ख़ारिज करती रही है.
लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाते हैं.
मंदिया सीट से कांग्रेस उम्मीदवार और पूर्व सांसद अब्दुल ख़ालिक़ कहते हैं, "कोई ज्योग्राफ़िकल इंटेग्रिटी नहीं है. यह चुनाव आयोग का परिसीमन नहीं है, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का परिसीमन है. सीटों को इस तरह बाँटा गया है कि एक अलग मुस्लिम इलाक़ा बन सकता है."
राजनीतिक मामलों के जानकार और गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं, "सीटों की सीमाएँ फिर से तय की गई हैं, जिससे डेमोग्राफ़िक बदलाव हुआ है, ऐसी संभावना है कि परिसिमन से आगामी चुनावों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा."
ख़ुद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 2023 में परिसीमन के समय दिए एक बयान में कहा था, "मेरे जैसे विचार वाले सभी लोग ख़ुश हैं कि परिसीमन हुआ है, लेफ़्ट हमेशा नाख़ुश होगा, कांग्रेस हमेशा नाख़ुश होगी, लेकिन सभी राइट माइंड लोग ख़ुश होंगे क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल के बराक घाटी से ज़्यादा विधायक आएँगे, अभी बस कुछ ही हैं."
होलाकांडी सीट का समीकरण कैसे बदला

चुनाव आयोग के परिसीमन मैनुअल में कहा गया है कि सीमाओं को इस तरह से पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए कि किसी भी विधानसभा क्षेत्र का कोई हिस्सा दूसरे क्षेत्र से घिरकर अपने ही क्षेत्र से अलग-थलग न हो जाए.
मैनुअल में यह भी उल्लेख है कि केवल भौगोलिक निरंतरता ही नहीं, बल्कि भौगोलिक विशेषताओं, बेहतर संपर्क, संचार के साधनों को भी ध्यान में रखा जाएगा.
साथ ही, नदियों, जंगलों या खाइयों से विभाजित क्षेत्रों को एक ही निर्वाचन क्षेत्र में शामिल नहीं किया जाएगा.
बराक घाटी, जहाँ क़रीब 17 लाख मुसलमान हैं, वहाँ पहले 15 विधानसभा सीटें थीं जो अब घटकर 13 रह गई हैं.
विश्लेषक बराक घाटी के हेलाकांडी ज़िले का उदाहरण देते हैं, जहाँ अलगापुर और कतलीचेरा विधानसभा सीटों के कुछ हिस्सों के हेलाकांडी सीट से जुड़ने पर यह अब हिंदू बहुल सीट बन गई है.
परिसीमन से पहले अलगापुर, कतलीचेरा और हेलाकांडी, तीनों सीटें से कांग्रेस और एआईयूडीएफ़ के मुसलमान विधायक थे, अब हेलाकांडी सीट के हिंदू बहुल होने के बाद यहाँ भी चुनावी गणित बदल गया है.
यह बदला हुआ गणित नेताओं के बयानों में भी दिखाई देता है.
हाल ही में असम सरकार कैबिनेट मंत्री जयंता मल्लाह बरुआ ने एक बयान में कहा था, "पूरे असम में 22-23 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ हमारी मौजूदगी कम है क्योंकि 20-22 सीटें ऐसी हैं जिन्हें प्रवासी मतदाताओं ने घेर लिया है लेकिन बाक़ी सीटों पर तो हम लोग ही हैं."
पहचान का सवाल

भौगोलिक रूप से ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण में बँटा असम राजनीतिक रूप से अपर असम, मिडिल असम, लोअर असम और बराक घाटी में विभाजित है.
बराक घाटी के मुसलमान, असमिया मुसलमान और लोअर असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक पहचान अलग-अलग है.
प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं, "यहाँ मुसलमान एक समान यानी होमेजीनस श्रेणी नहीं हैं. अपर असम के स्वदेशी मुसलमान हैं, लोअर असम के बंगाली मुसलमान हैं, बराक घाटी के मुसलमान हैं और ब्रह्मपुत्र घाटी के मुसलमान हैं. मुसलमानों की इस अलग-अलग आबादी में अंतर है. जब राजनीतिक विमर्श चलता है, यहाँ तक कि बीजेपी सरकार के लिए भी, बीजेपी कहती है कि स्वदेशी मुसलमान हमारी संस्कृति के बहुत क़रीब हैं."
प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं कि बीजेपी मुसलमानों के जिस वर्ग पर निशाना साधती है या जिसे 'बाहरी' बताती है, वे बांग्लाभाषी मुसलमान हैं जो अधिकतर लोअर असम में रहते हैं.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल के महीनों में बांग्लाभाषी मुसलमानों को निशाना बनाते हुए कई बयान दिए हैं.
राजनीतिक रैलियों में वो बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए बांग्लादेशी शब्द इस्तेमाल करते हैं.
असम के मुसलमानों में आधी से अधिक आबादी बांग्लाभाषी मुसलमानों की है. कई दशकों से पत्रकारिता कर रहे शाहजहाँ तालुकदार मानते हैं कि यह राज्य का सबसे कमज़ोर वर्ग भी है.
शाहजहाँ तालुकदार कहते हैं, "बांग्लाभाषी मुसलमानों में पढ़े लिखे लोग बहुत कम हैं. मज़दूर वर्ग के लोग अधिक हैं. इन मुसलमानों के लिए विकास की कोई योजना नज़र नहीं आती है. अगले 10-20 साल में ये कहाँ होंगे, इनके हालात कैसे बेहतर होंगे इसे लेकर कोई मास्टर प्लान नज़र नहीं आता."
वो कहते हैं, "मुसलमानों के इस वर्ग को मियाँ कहकर संबोधित किया जाता है. राजनेता इस शब्द को मुसलमानों पर निशाना साधने के लिए इस्तेमाल करते हैं."
बांग्लाभाषी मुसलमानों के साथ पहचान का सवाल सबसे ज़्यादा जुड़ा नज़र आता है.
बरपेटा के एक ग्रामीण इलाक़े में एक मुस्लिम युवा का कहना है, "राजनीतिक बयानबाज़ी के बाद बांग्लाभाषी लोगों के लिए माहौल बदला है, हम पहले जिस तरह बेफ़िक्र होकर अपर असम में काम करने चले जाते थे, अब वैसा नहीं है."
1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन इसी पहचान के सवाल पर खड़ा था.
इसके बाद हुए असम समझौते में 1971 के बाद आए लोगों को विदेशी मानने का प्रावधान किया गया.
यानी नागरिकता का सवाल सिर्फ क़ानूनी नहीं रहा, यह असम की राजनीति की धुरी बन गया.
साहित्यकार और प्रोफ़ेसर हिरेन गोहाईं को लगता है कि असम में मुसलमानों की स्थिति में असम आंदोलन के बाद से ही बदलाव आया.
प्रोफ़ेसक हिरेन गोहाईं कहते हैं, "मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से घेरा गया है, संदेह, अविश्वास और पूर्वाग्रह की जो भावनाएँ दबी हुईं थीं, वे काफ़ी मज़बूत हो रही हैं."
हालाँकि प्रोफ़ेसर गोहाईं मानते हैं कि मुसलमान हमेशा इस हद तक हाशिए पर नहीं थे.
वह कहते हैं, "यह एक जानबूझकर बनाई गई नीति का परिणाम है जिसे अत्यंत निर्दयता से लागू किया गया है. मुझे याद है जब मैंने 1970 के दशक में गुवाहाटी विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया था, मेरी कक्षाओं में आप्रवासी मुस्लिम परिवारों के कई छात्र थे और मुझे नहीं याद है कि साथी छात्रों के मन में उनके प्रति कोई पूर्वाग्रह था. वे बिल्कुल अन्य छात्रों की तरह ही थे."
वो कहते हैं, "1978 के बाद से स्थिति नाटकीय रूप से बदल गई क्योंकि एक सांप्रदायिक समूह ने एक बहुत ही योजनाबद्ध, लक्षित और व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया."
प्रोफ़ेसर गोहाईं ज़ोर देकर यह कहते हैं कि असम आंदोलन के बाद से राज्य की बड़ी मुसलमान आबादी के साथ पहचान का सवाल जुड़ गया.
हालाँकि वो ये भी कहते हैं कि असम आंदोलन के समय मुसलमानों के सामने जैसे हालात थे, उनके मुक़ाबले आज राज्य के मुसलमान कुछ बेहतर स्थिति में हैं.
असम आंदोलन

असम आंदोलन प्रवासियों को बाहर धकेलने की मांग पर खड़ा था.
1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने आंदोलनकारी छात्र संगठनों के साथ समझौता किया, जिसमें 1971 के बाद से राज्य में आए बाहरी लोगों को वापस भेजने का प्रावधान किया गया.
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, 1985 के बाद से 30 हज़ार से अधिक लोगों को विदेशी घोषित कर वापस भेजा गया है. वहीं कई मामलों में अब भी क़ानूनी प्रक्रिया जारी है.
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले साल विधानसभा में बताया था कि राज्य में 2017 के बाद से 40 हज़ार से अधिक विदेशी नागरिकों की पहचान हुई है.
इसी पहचान के सवाल को सुलझाने के लिए असम में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई. लेकिन आज भी यह अधर में है.
कुछ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि बीजेपी एनआरसी को लागू करने में नाकाम रही है.
प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं, "समस्या यह हो रही है कि असम का नागरिकता का मुद्दा हल नहीं हुआ है और सरकार इसे बनाए हुए है. इस अनसुलझे मुद्दे को जारी रखा गया है. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी को इस समस्या का समाधान माना गया था. अब सरकार एनआरसी के अंतिम स्वरूप को प्रकाशित करने में बहुत ईमानदार नहीं है. इसलिए मुसलमानों, विशेष रूप से बंगाली मुसलमानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण नागरिकता का मुद्दा है."
हालांकि बीजेपी प्रवक्ता रूपम गोस्वामी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा है कि एनआरसी एक जटिल मुद्दा है जिसके समाधान में समय लगेगा.
बदरुद्दीन अजमल का उभार

होजाई शहर के फ़ॉर्महाउस जैसे विशाल घर में समर्थकों की भीड़ है. जैसे ही अजमल कमरे से बाहर निकलते हैं, मौजूद लोगों में उनके साथ तस्वीर लेने की होड़ मच जाती है.
दुनिया के शीर्ष इत्र कारोबारियों में शामिल बदरुद्दीन अजमल असम की राजनीति का चर्चित चेहरा हैं.
उनकी पार्टी एआईयूडीएफ़ असम में पहचान के संकट और नागरिकता पर उठ रहे सवालों के माहौल में पैदा हुई.
बदरुद्दीन अजमल ने साल 2005 में यूडीएफ़ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट पार्टी बनाई थी.
यह वो साल था, जब सुप्रीम कोर्ट ने आईएमडीटी एक्ट यानी इलीगल माइग्रेंट्स डिटरमिनेशन बाय ट्राइबुनल्स एक्ट को ख़त्म किया था.
ये क़ानून कथित अवैध प्रवासियों को कुछ हद तक सुरक्षा देता था.
बदरुद्दीन अजमल जब राजनीति में आए, तब राज्य और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी और बीजेपी पूर्वोत्तर में मज़बूत नहीं थी.
बदरुद्दीन राजनीति में आने के फ़ैसले के लिए कांग्रेस की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए बार-बार कहते हैं कि कांग्रेस ने 70 सालों तक मुसलमानों का उत्पीड़न किया और इसी वजह से उन्हें राजनीति में आना पड़ा.
कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ चुकी बदरुद्दीन अजमल की पार्टी इस बार अकेले मैदान में है और मुस्लिम बहुल कई सीटों पर कांग्रेस से उसका सीधा मुक़ाबला है.
धार्मिक पहचान की राजनीति के सवाल पर बदरुद्दीन अजमल आरोप लगाते हैं, "हमारे लोगों को योजनाबद्ध तरीक़े से हाशिए पर रखा गया. ज़मीन, शिक्षा और पहचान के सवाल पर. इसी लड़ाई के लिए हमने पार्टी बनाई."
एआईयूडीएफ़ ने राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं. पिछले चुनाव में पार्टी ने 15 विधानसभा सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 लोकसभा चुनावों में पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा.
धुबरी लोकसभा क्षेत्र से ख़ुद अजमल चुनाव हार गए.
विश्लेषक मानते हैं कि एआईयूडीएफ़ के मैदान में आने के बाद असम की राजनीति में एक नई धुरी बनी, जहाँ पहचान और धर्म के आधार पर लामबंदी तेज़ हुई.
कई विश्लेषकों को ये लगता है कि भले ही बदरुद्दीन मुसलमानों के मुद्दों की राजनीति करने का दावा करते हैं, लेकिन उनकी सांप्रदायिक राजनीति से राज्य के मुसलमानों को बहुत फ़ायदा नहीं हुआ है.
गुवाहाटी यूनिवर्सिटी से रिटायर्ड प्रोफ़ेसर अब्दुल मन्नान कहते हैं, "बदरुद्दीन अजमल ने मुसलमानों को अलग पहचान देने की कोशिश की और उनकी समस्याओं को अलग मुद्दा बनाया. इससे असम के हिंदू-मुस्लिम मेल-जोल की संस्कृति को नुक़सान पहुँचा."
विश्लेषक यह भी मानते हैं कि बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ़ के उभार ने समाज में दूसरी तरफ़ भी ध्रुवीकरण किया.
प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं, "प्रतिनिधित्व देने के बावजूद, एआईयूडीएफ़ ने समुदाय को फ़ायदा नहीं, बल्कि नुक़सान पहुँचाया और हिंदुत्व के लिए रैलिंग प्वाइंट (लामबंदी मुद्दा) बन गई."
कांग्रेस भी बदरुद्दीन अजमल पर बीजेपी की बी-टीम होने का आरोप लगाती रही है.
असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई से जब बीबीसी ने बदरुद्दीन अजमल के साथ चुनाव बाद गठबंधन की संभावना पर सवाल किया, तो उन्होंने सीधे तौर पर एआईयूडीएफ़ को बीजेपी की बी-टीम बता दिया.
अजमल इस आरोप को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहते हैं, "असम में बीजेपी के मज़बूत होने के लिए कांग्रेस ही ज़िम्मेदार है. हिमंता बिस्वा सरमा ख़ुद पुराने कांग्रेसी हैं."
अजमल कहते हैं, "कांग्रेस ने कभी राज्य के मुसलमानों के मुद्दों का समाधान नहीं किया और वो हम पर बीजेपी की बी टीम होने का इल्ज़ाम लगाते हैं."
राजनीति से नाउम्मीदी

बरपेटा हो या होजाई, आम मुसलमानों में राजनीति को लेकर एक नाउम्मीदी नज़र आती है.
एक चाय की दुकान पर बैठे रिटायर्ड फ़ौजी कहते हैं, "हमारे नेता आलू की तरह हैं, जब वो हमारी आवाज़ ही नहीं उठा सकते तो हमारे किस काम के?"
एक बांग्लाभाषी बुज़ुर्ग कहते हैं, "असम की राजनीति में सिर्फ़ हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद ही है. वे कहते हैं कि मुसलमानों को बांग्लादेश भेजो, पाकिस्तान भेजो, इसके अलावा हमें कुछ नहीं सुनाई देता."
यहीं मौजूद एक मुसलमान युवा का कहना था, "पहचान हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल है, मेरे पिता 30 साल सेना में रहे, अगर फिर भी हमें कोई बांग्लादेशी कहता है तो चोट लगती है."
राज्य की लाभकारी योजनाओं का फ़ायदा मुसलमान इलाक़ों तक भी पहुँचा है. एक नौजवान ने कहा, "अरुणोदय और अन्य योजनाओं का फ़ायदा मुसलमानों को मिल रहा है, लेकिन यह भी बहुत कम लोगों तक ही पहुँच रहा है."
बरपेटा में एक साफ़्टवेयर कंपनी चलाने वाले मैनुद्दीन कहते हैं, "राजनीति से नाउम्मीदी है, मुसलमानों को लगता है कि उन्हें जो करना है ख़ुद ही करना है, ऐसे में अब एजुकेशन को लेकर एक जागरूकता नज़र आती है."
बेदख़ली का मुद्दा

असम में सरकारी ज़मीनों से बेदख़ल किया जाना भी मुसमलानों के लिए एक बड़ा मुद्दा है. होजाई ज़िले में कई जगह बेदख़ली के निशान साफ़ नज़र आते हैं.
एक महीना पहले तोड़े गए एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को दिखाते हुए स्थानीय पत्रकार आमिर हुसैन कहते हैं, "सरकारी ज़मीनों से मुसलमानों को हटाया जा रहा है. बड़ी तादाद में लोग सड़क पर आ गए हैं."
होजाई ज़िले के ही पश्चिम जमुना गाँव में कुछ महीने पहले तक जहाँ क़रीब 1200 घर थे, अब वहाँ मैदान नज़र आता है. इन सभी को यहां से हटा दिया गया.
नज़मा बेग़म का घर जहाँ था, अब वहाँ मलबा भी नहीं है.
ख़ाली ज़मीन की तरफ़ इशारा करते हुए वो कहती हैं, "यहाँ मेरा घर था, अब मैं एक कैंप में किराए के कमरे में रहती हूँ और हज़ार रुपए महीना देती हूँ, मेरे पति की कुछ महीने पहले ही मौत हो गई. ना मेरे पास रहने के लिए जगह है ना बच्चों का पेट भरने के लिए पैसे."
यहाँ से क़रीब एक किलोमीटर सड़क किनारे कुछ कच्ची झुग्गियों में दर्जनभर से अधिक परिवार रह रहे हैं. इन्हें सरकारी ज़मीनों से हटाया गया है.
बाँस और तिरपाल से बनीं एक झुग्गी में अपने बच्चों के साथ रह रहे ज़मील अहमद कहते हैं, "हम 1200 परिवार थे, जंगल की ज़मीन पर बसे थे, हम सभी को हटा दिया गया. इतने विधायक हैं, मंत्री हैं, कोई हमारा हाल पूछने नहीं आया. हम राजनेताओं के दरवाज़ों पर जा-जाकर थक गए हैं."
हालाँकि, असम सरकार ये कहती रही है कि सिर्फ़ सरकारी ज़मीनों से अवैध प्रवासियों को हटाया जा रहा है.
बीजेपी प्रवक्ता रूपम गोस्वामी कहते हैं, "जो घुसपैठिए हैं, सिर्फ़ उन्हें ही हटाया जा रहा है. किसी को धर्म के आधार पर निशाना नहीं बनाया गया है."
बड़ी तादाद में बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा सवाल पहचान और बेदख़ली का ही है.
अब चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या असम के मुसलमान सियासत में अपनी जगह बचा पाएँगे या पहचान और प्रतिनिधित्व की यह लड़ाई और मुश्किल होने वाली है.
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